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Bihar Politics : रामविलास पासवान @80: एक फैसले ने बदल दी बिहार की राजनीति, कैसे 2005 में खत्म हुआ 15 साल का लालू-राबड़ी शासन?

आज रामविलास पासवान की 80वीं जयंती है। बिहार की राजनीति में उनका एक फैसला आज भी सबसे बड़े टर्निंग प्वाइंट के रूप में याद किया जाता है। 2005 में उन्होंने न राजद का साथ दिया और न भाजपा का। इसी निर्णय ने 15 साल पुराने लालू-राबड़ी शासन के अंत और बिहार में

Bihar Politics : रामविलास पासवान @80: एक फैसले ने बदल दी बिहार की राजनीति, कैसे 2005 में खत्म हुआ 15 साल का लालू-राबड़ी शासन?
Tejpratap
Tejpratap
7 मिनट

Bihar Politics : आज अगर रामविलास पासवान जीवित होते तो अपना 80वां जन्मदिन मना रहे होते। दलित राजनीति के सबसे बड़े चेहरों में गिने जाने वाले पासवान ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में कई बार सत्ता बनाई और बिगाड़ी, लेकिन उनके करियर का सबसे चर्चित फैसला 2005 में सामने आया। उस समय बिहार में कोई भी दल स्पष्ट बहुमत नहीं ला सका था और पासवान की पार्टी सत्ता की चाबी अपने हाथ में लिए खड़ी थी। सबकी निगाहें इस बात पर थीं कि वह किसका साथ देंगे, लेकिन उन्होंने न भाजपा का साथ चुना और न ही लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व वाले राजद का। 


उनके इसी एक फैसले ने बिहार की राजनीति की दिशा बदल दी। फरवरी 2005 का अधूरा जनादेश, राष्ट्रपति शासन और फिर नवंबर में नीतीश कुमार के नेतृत्व में सत्ता परिवर्तन—इन सबकी शुरुआत उसी निर्णय से हुई, जिसने 15 साल पुराने लालू-राबड़ी शासन के अंत की पटकथा लिख दी। आज उनकी 80वीं जयंती पर जानते हैं उस फैसले की कहानी, जिसने बिहार की राजनीति का इतिहास बदल दिया।


साल 2005... बिहार की राजनीति का वह साल, जिसने सिर्फ सरकार नहीं बदली, बल्कि राज्य की सियासत का पूरा समीकरण बदल दिया। यह बदलाव किसी एक चुनावी नतीजे से नहीं आया था, बल्कि कई राजनीतिक घटनाओं की ऐसी श्रृंखला से निकला जिसने 15 साल से सत्ता पर काबिज लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के शासन का अंत कर दिया। इस पूरी कहानी का सबसे अहम मोड़ बना फरवरी 2005 का अधूरा जनादेश और लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) प्रमुख रामविलास पासवान का एक ऐसा फैसला, जिसने बिहार के राजनीतिक इतिहास की धारा बदल दी।


1990 में लालू प्रसाद यादव पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। सामाजिक न्याय की राजनीति के दम पर उन्होंने पिछड़े, दलित और मुस्लिम समाज के बड़े वर्ग का मजबूत समर्थन हासिल किया। बाद में चारा घोटाला मामले के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद छोड़कर अपनी पत्नी राबड़ी देवी को सत्ता सौंप दी। 1990 से 2005 तक लगभग 15 वर्षों तक बिहार की सत्ता लालू परिवार के इर्द-गिर्द ही घूमती रही।


लेकिन समय के साथ राजनीतिक माहौल बदलने लगा। कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार, सड़क, शिक्षा और विकास जैसे मुद्दे जनता के बीच प्रमुख होने लगे। लोगों के एक बड़े वर्ग में बदलाव की इच्छा दिखाई देने लगी। इसी माहौल में 2005 का विधानसभा चुनाव हुआ।


फरवरी 2005 के चुनाव में उस समय यूपीए की सहयोगी पार्टियां अलग-अलग मैदान में उतरीं। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), कांग्रेस और रामविलास पासवान की एलजेपी ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। चुनाव परिणाम आए तो आरजेडी 75 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। कांग्रेस को 10 सीटें मिलीं। दूसरी ओर जनता दल (यूनाइटेड) और भाजपा के गठबंधन एनडीए को कुल 92 सीटें मिलीं। 243 सदस्यीय विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 122 सीटों की जरूरत थी। किसी भी दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला।


यहीं से बिहार की राजनीति में रामविलास पासवान सबसे अहम किरदार बनकर उभरे। उनकी पार्टी एलजेपी ने 29 सीटें जीतकर खुद को 'किंगमेकर' की भूमिका में ला खड़ा किया। राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू हो गई कि पासवान जिस तरफ जाएंगे, सरकार उसी की बनेगी।


आरजेडी को उम्मीद थी कि एलजेपी उसका साथ देगी और लालू-राबड़ी सरकार एक बार फिर सत्ता में लौट आएगी। दूसरी ओर एनडीए भी पासवान को अपने साथ लाने की कोशिश में था। लेकिन यहीं वह फैसला हुआ जिसने पूरे खेल को बदल दिया।


रामविलास पासवान ने साफ घोषणा कर दी कि वे न भाजपा के साथ जाएंगे और न ही आरजेडी को समर्थन देंगे। उन्होंने भाजपा को सांप्रदायिक और आरजेडी को भ्रष्टाचार तथा जातिवादी राजनीति का प्रतीक बताते हुए दोनों से दूरी बना ली। इस एक फैसले ने बिहार की राजनीति को पूरी तरह त्रिशंकु स्थिति में पहुंचा दिया।


आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद बहुमत साबित नहीं कर सकी। एनडीए के पास भी सरकार बनाने लायक संख्या नहीं थी। जोड़तोड़ की कोशिशें हुईं, राजनीतिक बातचीत चली, लेकिन कोई भी पक्ष आवश्यक समर्थन नहीं जुटा पाया। अंततः सरकार नहीं बन सकी।


राजनीतिक गतिरोध बढ़ने के बाद तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह ने विधानसभा भंग करने की सिफारिश की और बिहार में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। यहीं से 15 साल से चली आ रही सत्ता की मजबूत पकड़ पहली बार कमजोर होती दिखाई दी।


फरवरी का अधूरा जनादेश केवल सरकार बनाने में असफलता नहीं था, बल्कि उसने जनता के बीच एक नया संदेश भी दिया। लोगों को महसूस होने लगा कि राज्य को स्थिर सरकार और नए नेतृत्व की जरूरत है। इसी दौरान नीतीश कुमार ने विकास, सुशासन और बेहतर कानून-व्यवस्था को अपना सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया। भाजपा के साथ उनका गठबंधन पहले से अधिक मजबूत होकर सामने आया।


उधर, एलजेपी के अलग चुनाव लड़ने और आरजेडी का साथ नहीं देने से सामाजिक समीकरण भी बदल गए। दलित वोटों का बड़ा हिस्सा आरजेडी से अलग हुआ। इससे लालू यादव का पारंपरिक सामाजिक गठबंधन पहले जैसा मजबूत नहीं रह सका।


राष्ट्रपति शासन के बाद अक्टूबर-नवंबर 2005 में दोबारा विधानसभा चुनाव हुए। इस बार बिहार की जनता ने स्पष्ट जनादेश दिया। जनता दल (यू) सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और भाजपा के साथ एनडीए ने बहुमत हासिल कर लिया। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और 1990 से लगातार चला आ रहा लालू-राबड़ी शासन समाप्त हो गया। आरजेडी 54 सीटों पर सिमट गई।


यही वह चुनाव था जिसने बिहार की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत की। सरकार ने सड़क, पुल, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता दी। "सुशासन" बिहार की राजनीति का नया राजनीतिक नारा बन गया और आने वाले वर्षों में यही मुद्दा राज्य की चुनावी राजनीति का केंद्र भी बना।


अगर 2005 की पूरी कहानी को एक बिंदु में समेटा जाए, तो फरवरी का अधूरा जनादेश और रामविलास पासवान का समर्थन से इनकार ही वह निर्णायक क्षण था जिसने सत्ता परिवर्तन की नींव रखी। यदि उस समय एलजेपी आरजेडी के साथ चली जाती और सरकार बन जाती, तो संभव है कि बिहार की राजनीतिक कहानी बिल्कुल अलग होती।


इसी वजह से 2005 को आज भी बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट माना जाता है। एक नेता का फैसला, एक अधूरा जनादेश और दोबारा हुए चुनाव ने न केवल 15 साल पुराने सत्ता संतुलन को बदल दिया, बल्कि आने वाले दो दशकों की राजनीति की दिशा भी तय कर दी। यही कारण है कि बिहार के राजनीतिक इतिहास में 2005 सिर्फ एक चुनावी साल नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन की सबसे महत्वपूर्ण पटकथा के रूप में याद किया जाता है।