Bihar Jail Manual : पटना हाई कोर्ट का बड़ा आदेश, बिहार जेल मैनुअल में करना होगा संशोधन; डेडलाइन भी हुआ तय

पटना हाई कोर्ट ने बिहार जेल मैनुअल 2012 में संशोधन की प्रक्रिया नौ माह में पूरी करने का निर्देश दिया है। यह आदेश मॉडल प्रिजन मैनुअल 2016 को लागू करने से जुड़ा है।

1st Bihar Published by: First Bihar Updated Thu, 08 Jan 2026 08:20:42 AM IST

Bihar Jail Manual : पटना हाई कोर्ट का बड़ा आदेश, बिहार जेल मैनुअल में करना होगा संशोधन; डेडलाइन भी हुआ तय

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Bihar Jail Manual : पटना हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को बिहार जेल मैनुअल, 2012 में आवश्यक संशोधन की प्रक्रिया को नौ माह के भीतर पूरा करने का स्पष्ट निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति सुधीर सिंह और न्यायमूर्ति राजेश कुमार वर्मा की खंडपीठ ने अधिवक्ता अभिनव शांडिल्य द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया। अदालत का यह फैसला राज्य की जेल व्यवस्था में सुधार और देशभर में जेल नियमों में एकरूपता लाने की दिशा में अहम माना जा रहा है।


दरअसल, याचिका में भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा तैयार मॉडल प्रिजन मैनुअल, 2016 को बिहार में लागू करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि यह मैनुअल आधुनिक जेल सुधारों, बंदियों के मानवाधिकारों की सुरक्षा और सुधारात्मक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। इसके बावजूद बिहार में इसे अब तक पूरी तरह लागू नहीं किया गया है, जबकि देश के अधिकांश राज्यों ने इसे अपनाकर अपनी जेल व्यवस्था में व्यापक सुधार किए हैं।


अधिवक्ता अभिनव शांडिल्य ने अदालत को बताया कि मॉडल प्रिजन मैनुअल, 2016 को लागू करने का उद्देश्य जेलों को केवल दंडात्मक संस्थान न मानकर सुधारात्मक और पुनर्वास केंद्र के रूप में विकसित करना है। इसमें बंदियों के अधिकार, स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास, महिला और किशोर कैदियों की विशेष जरूरतों, पैरोल और फर्लो जैसी व्यवस्थाओं को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है। उन्होंने कहा कि बिहार में नौ वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बावजूद यह मैनुअल सिर्फ कागजों तक सीमित है, जो राज्य सरकार की उदासीनता को दर्शाता है।


याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि वर्ष 2023 में राज्य सरकार ने जेल मैनुअल में आंशिक संशोधन जरूर किया था, लेकिन वह संशोधन व्यापक सुधार के बजाय एक विशेष परिस्थिति तक सीमित था। अधिवक्ता शांडिल्य ने अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया कि उसी आंशिक संशोधन के आधार पर पूर्व सांसद आनंद मोहन की रिहाई संभव हो सकी। हालांकि, इसके बावजूद संपूर्ण मॉडल प्रिजन मैनुअल को लागू करने से राज्य सरकार अब भी बचती रही है, जो नीति और नीयत दोनों पर सवाल खड़े करता है।


राज्य सरकार की ओर से अदालत में दाखिल शपथपत्र में कहा गया कि जेल मैनुअल में संशोधन की प्रक्रिया चल रही है। शपथपत्र के अनुसार, बिहार इंस्टीट्यूट ऑफ करेक्शनल एडमिनिस्ट्रेशन (BICA) द्वारा सुझाए गए प्रस्तावों को शामिल करने के लिए मुख्यालय स्तर पर एक समिति का गठन किया गया है। इस समिति में जेल प्रशासन और संबंधित विभागों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं। सरकार ने यह भी बताया कि समिति के एक सदस्य के सेवानिवृत्त होने के कारण इसका पुनर्गठन किया गया, जिसके बाद कई बैठकों का आयोजन किया जा चुका है। फिलहाल यह मामला विचाराधीन बताया गया।


हालांकि, हाई कोर्ट इस प्रक्रिया में हो रही देरी से संतुष्ट नहीं दिखा। अदालत ने उपलब्ध तथ्यों, याचिकाकर्ता की दलीलों और राज्य सरकार के शपथपत्र पर विचार करने के बाद स्पष्ट निर्देश दिया कि बिहार जेल मैनुअल, 2012 में आवश्यक संशोधन की पूरी प्रक्रिया आदेश की प्रति प्राप्त होने की तिथि से नौ माह के भीतर हर हाल में पूरी की जाए। अदालत ने संकेत दिया कि इस समयसीमा का पालन न होना गंभीरता से लिया जाएगा।


कानूनी जानकारों का मानना है कि हाई कोर्ट का यह आदेश बिहार की जेल व्यवस्था में बड़े बदलाव का रास्ता खोल सकता है। यदि मॉडल प्रिजन मैनुअल, 2016 को सही मायनों में लागू किया जाता है, तो इससे न केवल जेलों की स्थिति में सुधार होगा, बल्कि बंदियों के पुनर्वास और समाज में उनकी दोबारा भागीदारी को भी मजबूती मिलेगी। अब सबकी नजर राज्य सरकार पर टिकी है कि वह अदालत के निर्देशों का कितनी गंभीरता से पालन करती है।