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Bihar Politics : दीपक प्रकाश का मंत्री पद बच गया, लेकिन 2027 में फिर क्यों आ सकता है संकट? देवेश कुमार के इस्तीफे के पीछे का पूरा राजनीतिक गणित जानिए

भाजपा MLC देवेश कुमार के इस्तीफे से पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश का तत्काल राजनीतिक संकट टल गया है। अब उन्हें विधान परिषद भेजने की तैयारी है, लेकिन मार्च 2027 के बाद मंत्री पद पर फिर संकट आ सकता है। जानिए पूरा संवैधानिक और राजनीतिक गणित।

Deepak Prakash
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Tejpratap
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6 मिनट

पटना: बिहार की राजनीति में भाजपा विधान परिषद सदस्य (MLC) देवेश कुमार के इस्तीफे ने एक बड़ा राजनीतिक संकट फिलहाल टाल दिया है। पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश का मंत्री पद तत्काल सुरक्षित होता दिख रहा है, क्योंकि अब उन्हें विधान परिषद भेजने की तैयारी है। हालांकि बड़ा सवाल अभी भी बरकरार है कि क्या वह 2030 तक बिना किसी रुकावट के मंत्री बने रहेंगे? इसका जवाब मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था और विधान परिषद के कार्यकाल को देखते हुए आसान नहीं है।

दरअसल, यह मामला केवल एक मंत्री की कुर्सी का नहीं, बल्कि संविधान, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, विधान परिषद की सदस्यता और एनडीए की राजनीतिक रणनीति से जुड़ा हुआ है। यही वजह है कि देवेश कुमार के इस्तीफे के बाद भी यह विवाद पूरी तरह खत्म नहीं माना जा रहा।

क्यों आया था मंत्री पद पर संकट?

दीपक प्रकाश को बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री बनाया गया था, लेकिन वह न तो विधानसभा के सदस्य थे और न ही विधान परिषद के। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(4) के अनुसार कोई भी व्यक्ति मंत्री तो बन सकता है, लेकिन उसे निर्धारित समय सीमा के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना अनिवार्य होता है। ऐसा नहीं होने पर मंत्री पद छोड़ना पड़ता है। इसी मुद्दे को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां सरकार से यह पूछा गया कि बिना किसी सदन की सदस्यता के दीपक प्रकाश कितने समय तक मंत्री बने रह सकते हैं। इसके बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई।

देवेश कुमार के इस्तीफे से कैसे निकला रास्ता?

संकट बढ़ने के बीच भाजपा ने बड़ा राजनीतिक फैसला लेते हुए अपने विधान परिषद सदस्य देवेश कुमार से इस्तीफा दिलवा दिया। अब इस खाली हुई सीट पर दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजने की तैयारी है। यदि वह एमएलसी बन जाते हैं तो तत्काल प्रभाव से उनका मंत्री पद संवैधानिक रूप से सुरक्षित हो जाएगा और फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में उठे सवाल का भी समाधान हो जाएगा।

क्या 2030 तक मंत्री बने रहेंगे?

यहीं सबसे बड़ा सवाल है। मौजूदा परिस्थितियों के अनुसार इसका जवाब फिलहाल 'नहीं' माना जा रहा है। देवेश कुमार राज्यपाल मनोनीत कोटे से 17 मार्च 2021 को विधान परिषद पहुंचे थे और उनका कार्यकाल मार्च 2027 तक ही था। यदि दीपक प्रकाश इसी सीट पर एमएलसी बनते हैं तो उन्हें नया छह साल का कार्यकाल नहीं मिलेगा। वह केवल देवेश कुमार के शेष कार्यकाल तक ही सदस्य रहेंगे।

इसका मतलब यह है कि मार्च 2027 में यह सीट फिर खाली हो जाएगी। उस समय दीपक प्रकाश को दोबारा विधानसभा या विधान परिषद की सदस्यता हासिल करनी होगी। यदि ऐसा नहीं हुआ तो उनका मंत्री पद एक बार फिर संकट में आ सकता है। इसलिए वर्तमान समाधान को स्थायी नहीं बल्कि अस्थायी व्यवस्था माना जा रहा है।

भाजपा ने क्यों लिया इतना बड़ा फैसला?

राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा लगातार यह संदेश देते रहे कि दीपक प्रकाश केवल कुछ महीनों के लिए नहीं बल्कि पूरे कार्यकाल के लिए मंत्री बनाए गए हैं। उन्होंने सार्वजनिक रूप से भी कहा कि यह फैसला केवल उनकी पार्टी का नहीं बल्कि पूरे एनडीए नेतृत्व का है।

जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो राजनीतिक दबाव और बढ़ गया। सूत्रों के अनुसार दिल्ली नेतृत्व के संकेत के बाद भाजपा ने देवेश कुमार का इस्तीफा कराने का फैसला लिया ताकि सहयोगी दल की नाराजगी दूर हो सके और सरकार पर संवैधानिक संकट न आए।

उपेंद्र कुशवाहा क्यों बने अहम?

2025 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय लोक मोर्चा के चार विधायक जीतकर आए थे। इनमें उपेंद्र कुशवाहा की पत्नी स्नेहलता कुशवाहा भी शामिल हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा फिलहाल अपने सहयोगी दल को नाराज करने का जोखिम नहीं लेना चाहती।

कुशवाहा समाज का बिहार की कई विधानसभा और लोकसभा सीटों पर प्रभाव माना जाता है। ऐसे में एनडीए के लिए उपेंद्र कुशवाहा केवल सहयोगी दल के नेता नहीं बल्कि महत्वपूर्ण सामाजिक आधार वाले नेता हैं। यही वजह रही कि भाजपा ने पहले उन्हें राज्यसभा भेजा और अब दीपक प्रकाश के मामले में भी सकारात्मक रुख अपनाया।

देवेश कुमार की अगली भूमिका क्या होगी?

इस्तीफा देने के बाद देवेश कुमार ने कहा कि वह पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता हैं और संगठन जो जिम्मेदारी देगा, उसे स्वीकार करेंगे। भाजपा के अंदर चर्चा है कि उन्हें संगठन में कोई अहम जिम्मेदारी मिल सकती है, हालांकि अभी तक इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

आगे क्या होगा?

अब सबकी नजर विधान परिषद की खाली सीट पर होने वाली प्रक्रिया पर है। यदि दीपक प्रकाश एमएलसी बन जाते हैं तो उनका मंत्री पद तत्काल सुरक्षित हो जाएगा। लेकिन मार्च 2027 के बाद उन्हें दोबारा किसी सदन की सदस्यता हासिल करनी होगी। तभी वह आगे भी मंत्री पद पर बने रह सकेंगे।

फिलहाल इतना तय है कि देवेश कुमार के इस्तीफे ने दीपक प्रकाश के सामने खड़ा तत्काल संवैधानिक संकट जरूर टाल दिया है, लेकिन 2030 तक मंत्री बने रहने की राह अभी भी पूरी तरह साफ नहीं हुई है। बिहार की राजनीति में यह मुद्दा आने वाले महीनों में भी चर्चा का केंद्र बना रह सकता है।