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चिराग जी अपनी किताब खोलिए..! HAM ने दिया करारा जवाब- जिन्होंने महादलितों के नाम पर सिर्फ राजनीति की, वो काम करने वाले से हिसाब मांग रहे

बिहार में ‘कोटे में कोटा’ को लेकर NDA के भीतर सियासी बहस तेज हो गई है। चिराग पासवान के रुख के बीच संतोष सुमन ने पलटवार करते हुए कहा- हमारी किताब खुली है, अब अपनी किताब खोलिए और काम का हिसाब दीजिए।

चिराग जी अपनी किताब खोलिए..! HAM ने दिया करारा जवाब- जिन्होंने महादलितों के नाम पर सिर्फ राजनीति की, वो काम करने वाले से हिसाब मांग रहे
Tejpratap
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8 मिनट

पटना: बिहार की राजनीति में दलित आरक्षण को लेकर बहस अब और तेज होती दिख रही है। केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के बीच ‘कोटे के अंदर कोटा’ और एससी आरक्षण में क्रीमी लेयर के मुद्दे पर सामने आए मतभेद के बाद अब बिहार के लघु जल संसाधन मंत्री डॉ. संतोष कुमार सुमन ने तीखा पलटवार किया है। संतोष सुमन ने कहा कि जो लोग दशकों तक सत्ता में रहे, उन्हें पहले अपना राजनीतिक हिसाब जनता के सामने रखना चाहिए और उसके बाद दूसरों से सवाल पूछना चाहिए।

संतोष सुमन ने अपने बयान में कहा, “हमारी किताब खुली है, अब अपनी किताब भी जनता के सामने खोलिए।” उन्होंने कहा कि महादलितों के विकास के लिए उनकी सरकार और उनके नेता जीतन राम मांझी को जब भी काम करने का अवसर मिला, उन्होंने योजनाओं को जमीन पर उतारने का प्रयास किया।

‘60 साल सत्ता में रहे, अब हमसे हिसाब मांग रहे’

संतोष सुमन ने कहा कि आजकल कुछ लोगों को दूसरों से हिसाब मांगने का शौक चढ़ गया है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि जो लोग करीब छह दशक तक सत्ता के केंद्र में रहे और सत्ता के फैसलों में भागीदार रहे, वे अब उनसे हिसाब क्यों मांग रहे हैं।

उन्होंने कहा कि पहले अपना राजनीतिक हिसाब-किताब सामने रखा जाए और बताया जाए कि इतने वर्षों में दलितों और महादलितों के लिए क्या किया गया। संतोष सुमन के मुताबिक, मुख्यधारा की सत्ता में उनके समाज को लंबे समय तक काम करने का अवसर नहीं मिला, लेकिन जितना अवसर मिला, उसमें महादलितों के लिए योजनाएं लागू करने की कोशिश की गई। उन्होंने कहा कि सत्ता उनके लिए सिर्फ पद हासिल करने का माध्यम नहीं है, बल्कि समाज के सबसे कमजोर और वंचित व्यक्ति के जीवन में बदलाव लाने का जरिया है।

महादलितों के लिए जमीन से लेकर कौशल प्रशिक्षण तक का दावा

संतोष सुमन ने महादलित विकास से जुड़ी कई योजनाओं और उनके आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि भूमिहीन महादलित परिवारों के लिए आवासीय जमीन उपलब्ध कराने की योजना शुरू की गई थी। सरकारी रिकॉर्ड का हवाला देते हुए उन्होंने करीब 1.95 लाख महादलित परिवारों को आवासीय प्लॉट उपलब्ध कराने और 5,717 एकड़ से अधिक भूमि वितरण का उल्लेख किया। उन्होंने महादलित आवास योजना, शौचालय निर्माण, बच्चों को पोशाक, कौशल प्रशिक्षण, विकास मित्र और सामुदायिक भवन-सह-वर्कशेड जैसी योजनाओं का भी जिक्र किया।

संतोष सुमन के अनुसार, मुख्यमंत्री महादलित पोशाक योजना के तहत करीब 14.71 लाख बच्चों को लाभ दिया गया। वहीं दशरथ मांझी कौशल विकास योजना के तहत 2.19 लाख से अधिक महादलित परिवारों के व्यक्तियों को अलग-अलग ट्रेड में प्रशिक्षण दिए जाने का दावा किया गया।

‘विकास मित्र’ और ‘विकास रजिस्टर’ का भी किया जिक्र

संतोष सुमन ने कहा कि सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तव में जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचे, इसके लिए विकास मित्र की व्यवस्था की गई। उनके मुताबिक, 9,875 विकास मित्र पद निर्धारित किए गए थे। इनका उद्देश्य महादलित परिवारों और सरकार के बीच संपर्क स्थापित करना था।

उन्होंने विकास रजिस्टर की व्यवस्था का भी उल्लेख किया। इसके जरिए यह जानकारी जुटाने का प्रयास किया गया कि महादलित परिवारों को बिजली, पानी, आवास, शौचालय, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसी सुविधाओं का लाभ मिला या नहीं। उन्होंने सामुदायिक भवन-सह-वर्कशेड, रेडियो वितरण, आंगनबाड़ी, क्रेच, मोबाइल चिकित्सा और महिलाओं के लिए नारी ज्योति कार्यक्रम जैसी योजनाओं को भी महादलित विकास मॉडल का हिस्सा बताया।

‘कोटे में कोटा किसी का हक छीनना नहीं’

संतोष सुमन ने साफ किया कि महादलित अवधारणा को सरकारी नौकरियों में एससी आरक्षण के भीतर अलग कोटा के तौर पर लागू नहीं किया गया था। उनके अनुसार, उस समय महादलित मॉडल का मुख्य आधार लक्षित कल्याणकारी विकास था।

हालांकि अब एससी आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण यानी ‘कोटे में कोटा’ की मांग एक अलग संवैधानिक और नीतिगत विषय है। संतोष सुमन का कहना है कि इसका मकसद किसी वर्ग का अधिकार छीनना नहीं, बल्कि उन समुदायों तक आरक्षण का लाभ पहुंचाना है जो लंबे समय से सबसे पीछे रह गए हैं। उन्होंने कहा कि सवाल यह होना चाहिए कि आरक्षण का लाभ किन वर्गों तक पहुंचा और कौन से वर्ग आज भी पीछे हैं। इसी आधार पर आरक्षण नीति की समीक्षा की मांग भी सामने रखी गई है।

चिराग पासवान के बयान से बढ़ी बहस

दरअसल, इस पूरे विवाद के बीच चिराग पासवान ने एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर का प्रावधान लागू करने की मांग पर आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि आरक्षण की व्यवस्था आर्थिक आधार पर नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव, बहिष्करण और छुआछूत जैसी समस्याओं को दूर करने के उद्देश्य से की गई थी।

चिराग पासवान ने यह भी कहा कि जो लोग एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने की वकालत कर रहे हैं, उन्हें पहले इस्तीफा देना चाहिए। उनके इस रुख ने आरक्षण के मुद्दे पर एनडीए के भीतर वैचारिक मतभेद की चर्चा को और हवा दे दी है।

वहीं, जीतन राम मांझी लंबे समय से एससी समुदायों के भीतर सबसे अधिक वंचित वर्गों को अलग से लाभ पहुंचाने की बात उठाते रहे हैं। ऐसे में ‘कोटे में कोटा’ बनाम मौजूदा आरक्षण व्यवस्था को लेकर दलित राजनीति के दो प्रमुख चेहरों के बीच बहस महत्वपूर्ण हो गई है।

‘हमारा संघर्ष किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं’

संतोष सुमन ने कहा कि उनका संघर्ष किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं है। उन्होंने बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों का हवाला देते हुए कहा कि राजनीति का उद्देश्य सिर्फ सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन व्यक्तिगत तिरस्कार और द्वेष की राजनीति उचित नहीं है। उनका दावा है कि उनका संघर्ष उस असमानता के खिलाफ है, जिसने समाज के एक बड़े हिस्से को लंबे समय तक पीछे रखा।

‘हमने अपना हिसाब दे दिया, अब आपकी बारी’

अपने बयान के अंत में संतोष सुमन ने विरोधियों से कई सवाल किए। उन्होंने पूछा कि पिछले दशकों में दलितों के लिए कितने भूमिहीन परिवारों को जमीन दी गई, कितनों को आवास मिला, कितने बच्चों को शिक्षा और पोशाक मिली, कितने युवाओं को कौशल प्रशिक्षण और रोजगार से जोड़ा गया और कितनी दलित बस्तियों में बुनियादी सुविधाएं पहुंचीं।

उन्होंने कहा कि महादलितों के विकास से जुड़े आंकड़े सरकारी दस्तावेजों और योजनाओं में दर्ज हैं। इसलिए केवल राजनीतिक बयानबाजी से काम नहीं चलेगा। संतोष सुमन ने दो टूक कहा, “हमने अपना हिसाब सामने रख दिया है। अब आपकी बारी है। भाषण का नहीं—काम का हिसाब दीजिए।”आरक्षण और सामाजिक न्याय के मुद्दे पर मांझी-सुमन और चिराग पासवान की यह बहस आने वाले दिनों में बिहार ही नहीं, बल्कि एनडीए की राजनीति में भी नया राजनीतिक विमर्श खड़ा कर सकती है।