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अब कम कागजी प्रक्रिया में होगा प्रोजेक्ट रजिस्ट्रेशन, बिहार रेरा की नई व्यवस्था लागू

Bihar RERA: रियल एस्टेट क्षेत्र में कारोबारी सुगमता बढ़ाने के लिए रेरा ने परियोजनाओं के निबंधन की प्रक्रिया को सरल कर दिया है। नई फिल्टर प्रणाली के तहत आवेदन में गलतियों की पहचान पहले ही हो सकेगी और अनावश्यक दस्तावेजों की अनिवार्यता खत्म की गई है।

Bihar RERA
प्रतिकात्मक तस्वीर
© Google
Mukesh Srivastava
5 मिनट

Bihar RERA: राज्य के रियल एस्टेट क्षेत्र में कारोबारी सुगमता (ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस) को बढ़ावा देने की दिशा में कदम उठाते हुए भू-संपदा विनियामक प्राधिकरण (रेरा), बिहार ने रियल एस्टेट परियोजनाओं के निबंधन की प्रक्रिया को सरल बना दिया है। प्रक्रिया को सरल बनाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि निबंधन प्रदान करने से पूर्व दस्तावेज़ों की प्रामाणिकता की जाँच से कोई समझौता हो।



प्राधिकरण ने एक नई उन्नत फिल्टर प्रणाली आरंभ की है, जो आवेदन दाखिल करने के हर चरण पर आवेदक प्रमोटरों का मार्गदर्शन करती है। उदाहरण के लिए, प्रक्रिया के आरंभ में ही एक सूचना-संदेश (प्रॉम्प्ट) प्रदर्शित होता है, जो आवेदक को बताता है कि आवेदन भरते समय कौन-कौन से दस्तावेज़ तैयार रखने हैं। यह संदेश एक प्रारंभिक मार्गदर्शिका के रूप में कार्य करता है और आवेदक को आवेदन दाखिल करने से पहले ही संबंधित दस्तावेज़ जुटाने में सहायता करता है।



फिल्टर प्रणाली में अंतर्निहित जाँच की व्यवस्था है, जो आवेदन में कोई विरोधाभासी सूचना भरे जाने पर आवेदक को सचेत कर देती है। उदाहरण के लिए, यदि किसी परियोजना के लिए अपेक्षित भूमि 100 डिसमिल है और भूमि दस्तावेज़ों में क्षेत्रफल इससे कम दर्ज है, तो प्रणाली आवेदक को इस विसंगति की जानकारी दे देती है। इस प्रकार आवेदक गलत सूचना भरने से बच जाता है, जो अन्यथा आवेदन की अस्वीकृति का कारण बन सकती है।



नई प्रणाली में ऐसी अनेक अनावश्यक सूचनाओं को भी हटा दिया गया है, जो अब तक रियल एस्टेट परियोजना के निबंधन हेतु आवेदन करते समय देनी पड़ती थीं। भूमि संबंधी जानकारी के लिए प्रमोटरों को अब केवल जमाबंदी, अद्यतन लगान रसीद और भार-मुक्त प्रमाण-पत्र (नॉन-इनकम्ब्रेंस सर्टिफिकेट) की प्रतियाँ देनी होंगी। पहले इनके साथ दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) संबंधी दस्तावेज़ तथा भू-धारण प्रमाण-पत्र (एलपीसी) भी जमा करना पड़ता था।



इसी प्रकार, तीन वर्ष से कम पुरानी कंपनियों के लिए अंकेक्षित लेखा (ऑडिटेड एकाउंट्स) संबंधी दस्तावेज़ जमा करने की अनिवार्यता अब समाप्त कर दी गई है। ऐसी कंपनियों को अब कंपनी के सभी निदेशकों के विगत तीन वित्तीय वर्षों के आयकर रिटर्न दाखिल करने होंगे।



प्रमोटरों को अब आवेदन पत्र के साथ अपनी परियोजना की विवरणिका (ब्रोशर) का प्रारूप भी जमा नहीं करना होगा। साथ ही, कंपनी एवं उसके निदेशकों की अचल संपत्तियों का ब्योरा माँगने वाले प्रपत्र को सरल बनाकर आवेदन के साथ ही अपलोड कर दिया गया है। प्रमोटर अब ऐसे विवरण पहले की अनेक शपथ-पत्रों वाली व्यवस्था के स्थान पर केवल एक शपथ-पत्र में दे सकेंगे।



आवेदन प्राप्ति के पश्चात कोई कमि रहने पर आवेदक से पृच्छा की जाती है। इन पृच्छाओं में एकरूपता रखने हेतु एवं सहज रूप से बोधगम्य बनाए रखने के उद्देश्य से एक पृच्छा-सूची (क्वेरी कैटलॉग) तैयार की गई है और परियोजनाओं के निबंधन हेतु प्राप्त आवेदनों की संवीक्षा करने वाले पदाधिकारी अब इसी सूची में से पूर्व-निर्धारित प्रारूप वाले पृच्छा ही भेजेंगे। इससे व्यवस्था में एकरूपता एवं वस्तुनिष्ठता आएगी।



प्रमोटरों को अब विगत पाँच वर्षों के वादों (मुकदमों) का विवरण भी नहीं देना होगा। यह कार्य अब प्राधिकरण के स्तर पर किया जाएगा, जहाँ ऐसे सभी अभिलेख डिजिटल स्वरूप में संधारित हैं।



नई प्रणाली लागू करने के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए रेरा बिहार के अध्यक्ष श्री विवेक कुमार सिंह ने कहा कि प्राधिकरण कारोबारी सुगमता से जुड़े इस अत्यंत महत्वपूर्ण विषय के प्रति सदैव संवेदनशील रहा है। उन्होंने बताया कि नई प्रणाली हितधारकों से प्राप्त सुझावों (फीडबैक) तथा उन संचिकाओं के विश्लेषण के आधार पर विकसित की गई है, जिनमें अपेक्षित दस्तावेज़ों के अभाव में आवेदन अस्वीकृत कर दिए गए थे।



उन्होंने कहा कि ये कदम राज्य के रियल एस्टेट क्षेत्र को पारदर्शी एवं दक्ष बनाने के निरंतर प्रयासों का हिस्सा हैं और इनमें उन गृह-क्रेताओं के हितों से कोई समझौता नहीं किया गया है, जो अपनी गाढ़ी कमाई से घर खरीदते हैं।

रिपोर्टिंग
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रिपोर्टर

FIRST BIHAR

FirstBihar संवाददाता