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Bihar Panchayat Transfer List : मौत के बाद भी हुआ ट्रांसफर! बिहार में पंचायत सचिवों की लिस्ट ने मचाया हड़कंप, निलंबित कर्मचारी भी भेजा गया नालंदा

बिहार पंचायती राज विभाग की पंचायत सचिव तबादला सूची में मृतक, इस्तीफा दे चुके और निलंबित कर्मचारियों के नाम सामने आने से सवाल उठे हैं। 2248 में 1645 तबादले किए गए।

Bihar Panchayat Transfer List
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Tejpratap
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पटना: बिहार के पंचायती राज विभाग ने पंचायत सचिवों की तबादला सूची क्या जारी की, विभागीय व्यवस्था पर ही सवालों की पूरी फाइल खुल गई। सूची देखकर ऐसा लग रहा है कि तबादला करने से पहले कर्मचारियों की सेवा स्थिति जांचने की जरूरत शायद महसूस ही नहीं की गई। तभी तो जिनका इस दुनिया से ही ट्रांसफर हो चुका है, उनका विभाग ने जिला बदल दिया। जिन्होंने नौकरी छोड़ दी, उन्हें भी ड्यूटी पर मान लिया गया और जो पहले से निलंबित हैं, उन्हें भी नए जिले में भेजने का आदेश जारी कर दिया गया। यानी विभाग की तबादला सूची में ‘कर्मचारी जिंदा है या नहीं’ से लेकर ‘नौकरी में है या नहीं’ तक की जानकारी मानो बाद के लिए बचाकर रखी गई थी।

स्वर्गीय फूलचंद कुमार भी चले गए नवादा!

तबादला सूची का सबसे चौंकाने वाला मामला स्वर्गीय फूलचंद कुमार का है। बताया जा रहा है कि पंचायत सचिव फूलचंद कुमार का निधन हो चुका है। लेकिन विभाग की सूची में उनका नाम बाकायदा मौजूद है और उन्हें नवादा स्थानांतरित कर दिया गया।अब सवाल यह है कि विभाग ने उनका तबादला किससे कराया? और नवादा में योगदान लेने के लिए किसका इंतजार किया जा रहा है? अगर रिकॉर्ड अपडेट नहीं हुआ था तो सवाल यह भी है कि तबादला सूची तैयार करने से पहले कर्मचारियों के रिकॉर्ड की जांच किसने की? मामला सिर्फ एक नाम की गलती नहीं है, क्योंकि सूची में इसके अलावा भी कई ऐसे नाम बताए जा रहे हैं, जिनकी सेवा स्थिति पर सवाल उठ रहे हैं।

नौकरी छोड़ी, फिर भी तबादला जारी

विभाग की ‘तेज रफ्तार’ तबादला प्रक्रिया में नौकरी छोड़ चुके कर्मचारी भी पीछे नहीं रहे। आनंद प्रकाश पांडे ने नौकरी छोड़ दी है, लेकिन विभाग ने उनका तबादला पूर्वी चंपारण कर दिया। इसी तरह अमित राज का नाम भी सूची में शामिल है, जबकि उनके बारे में भी नौकरी छोड़ने की बात सामने आई है। विभाग ने उनका तबादला जहानाबाद कर दिया। यानी कर्मचारी ने नौकरी छोड़ी, लेकिन विभाग ने उन्हें छोड़ा नहीं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इन कर्मचारियों के नाम किस रिकॉर्ड के आधार पर सूची में शामिल किए गए और तबादले के बाद उनसे योगदान लेने की प्रक्रिया किस तरह पूरी की जाएगी।

निलंबन भी तबादले के रास्ते में नहीं आया!

मामले में एक और दिलचस्प नाम सुबोध कुमार का है। बताया जा रहा है कि सुबोध कुमार पहले से निलंबित हैं। इसके बावजूद विभाग ने उनका भी तबादला कर दिया और उन्हें नालंदा भेज दिया। अब सवाल यह है कि निलंबित कर्मचारी के लिए तबादला आदेश क्यों जरूरी था? क्या पहले निलंबन हटेगा, फिर तबादला प्रभावी होगा या विभाग ने दोनों आदेशों को एक साथ चलाने का कोई नया प्रशासनिक मॉडल तैयार कर लिया है? इन मामलों ने पंचायत सचिवों के बीच चर्चा जरूर तेज कर दी है कि आखिर तबादला सूची बनाने में किस स्तर की जांच हुई थी।

50 दिन हड़ताल, समझौता हुआ... फिर शर्तें कहां गईं?

पंचायत सचिवों का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ये कर्मचारी हाल ही में अपनी मांगों को लेकर करीब 50 दिनों तक राज्यव्यापी हड़ताल पर रहे थे। सरकार और पंचायत सचिव संघ के बीच बातचीत के बाद समझौता हुआ और इसके बाद हड़ताल खत्म हुई। समझौते में तबादले को लेकर भी महत्वपूर्ण बात तय होने की बात कही गई थी। इसके तहत पंचायत सचिवों का तबादला उनके गृह जिले या उसके आसपास के दो जिलों में किए जाने की बात थी। लेकिन नई सूची आने के बाद कर्मचारियों का कहना है कि समझौते की यह शर्त कागज पर तो ठीक थी, जमीन पर उसकी हालत कुछ और दिखाई दे रही है।

सुरुचि कुमारी को उनके घर से काफी दूर भेजे जाने का मामला सामने आया है। वहीं मुकेश कुमार को कटिहार और रोशन कुमार को अररिया भेजा गया है। कर्मचारियों का आरोप है कि दूरी, बीमारी, पारिवारिक जरूरत और महिला कर्मचारियों की परिस्थितियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।

2248 का वादा, 1645 की सूची

तबादले की पूरी प्रक्रिया में एक और सवाल आंकड़ों को लेकर है। समझौते के तहत 2248 पंचायत सचिवों का तबादला किया जाना था, लेकिन विभाग ने अभी 1645 कर्मचारियों की सूची जारी की है। इस हिसाब से करीब 603 पंचायत सचिव अभी भी तबादले का इंतजार कर रहे हैं। इनमें एससी-एसटी वर्ग के करीब 200 कर्मचारी शामिल बताए जा रहे हैं। कर्मचारियों का सवाल सीधा है—जब तबादले की प्रक्रिया तय हुई थी तो सभी कर्मचारियों की सूची एक साथ क्यों नहीं जारी की गई? और अगर कुछ कर्मचारियों का तबादला बाद में होना है, तो उसके लिए स्पष्ट नियम क्या हैं?

संघ बोला- वरिष्ठता गई तेल लेने!

पंचायत सचिव संघ के अध्यक्ष वीरेंद्र कुमार ने विभाग पर मनमानी का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि तबादले में न तो वरिष्ठता का ठीक से ध्यान रखा गया और न ही दूरी, बीमारी या जरूरतमंद महिला कर्मचारियों को प्राथमिकता मिली। संघ का कहना है कि कर्मचारियों ने 50 दिन तक आंदोलन किया, सरकार से समझौता हुआ और उसी समझौते के भरोसे हड़ताल खत्म की गई। अब अगर तबादले में वही शर्तें नजर नहीं आतीं, तो स्वाभाविक रूप से कर्मचारियों में नाराजगी बढ़ेगी।

मंत्री बोले- मामला संज्ञान में नहीं, शिकायत मिली तो होगी जांच

मामले पर पंचायती राज विभाग के मंत्री दीपक प्रकाश ने कहा कि स्वर्गीय और इस्तीफा दे चुके कर्मचारियों के तबादले का मामला उनके संज्ञान में नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर ऐसी शिकायत मिलती है तो जांच कराकर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। मंत्री ने यह भी कहा कि तबादले रिक्त पदों के आधार पर किए गए हैं।

अब असली सवाल यही है कि अगर तबादले रिक्त पदों के आधार पर हुए हैं, तो मृत कर्मचारी के लिए रिक्त पद किसने भरा? इस्तीफा दे चुके कर्मचारी को पद पर किसने माना और निलंबित कर्मचारी को नए जिले में भेजने का आधार क्या था?

फिलहाल पंचायत सचिवों की नजर विभाग की अगली सूची पर है। उम्मीद यही होगी कि अगली सूची जारी होने से पहले कम से कम यह जांच जरूर हो जाए कि कर्मचारी सेवा में है, निलंबित है, इस्तीफा दे चुका है या फिर स्वर्ग सिधार चुका है। आखिर तबादला सूची है, ‘कर्मचारी खोज अभियान’ नहीं।