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Bihar Panchayat Election : बिहार पंचायत चुनाव में बड़ा पेंच! पुरानी पंचायत सीमा से चुनाव कराने की उठी मांग, सरकार के सामने बढ़ी चुनौती

बिहार में पंचायत चुनाव 2026 को लेकर हलचल तेज हो गई है। चुनाव समय पर कराने की मांग के साथ परिसीमन पर भी बड़ा सवाल खड़ा हुआ है। समिति चाहती है कि 2026 में मौजूदा सीमा पर चुनाव हो और नई जनगणना के बाद परिसीमन किया जाए।

Bihar Panchayat Election
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Tejpratap
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6 मिनट

पटना: बिहार में प्रस्तावित त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव 2026 को लेकर सियासी और प्रशासनिक हलचल तेज होती दिख रही है। पंचायत चुनाव की तैयारी के बीच अब चुनाव के समय और पंचायतों के परिसीमन को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव संघर्ष समिति ने राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग से संवैधानिक प्रावधानों के तहत समय पर पंचायत चुनाव कराने की मांग की है।

समिति के अध्यक्ष जगन्नाथ चौपाल के नेतृत्व में पटना के आईएमए हॉल में हुई बैठक में पंचायत चुनाव से जुड़े कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। बैठक में सबसे बड़ा सवाल यही रहा कि आखिर 2026 में मौजूदा पंचायत व्यवस्था के आधार पर चुनाव कराया जाए या नई जनगणना के आंकड़ों का इंतजार किया जाए?

पांच साल का कार्यकाल, फिर चुनाव में देरी क्यों?

समिति का कहना है कि पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल संविधान के मुताबिक पांच वर्ष का होता है। इसलिए संविधान के अनुच्छेद 243 के प्रावधानों के अनुसार पंचायत चुनाव समय पर कराया जाना चाहिए।समिति ने स्पष्ट किया कि पंचायत संस्थाओं का कार्यकाल पूरा होने के बाद चुनाव में अनावश्यक देरी संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं होगी। ऐसे में सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को चुनाव की प्रक्रिया को समयसीमा के भीतर पूरा करने की दिशा में कदम उठाना चाहिए।यानी पंचायत चुनाव को लेकर अब गेंद सरकार और निर्वाचन आयोग के पाले में है। चुनाव कब और किस परिसीमन के आधार पर होगा, इस पर आने वाले दिनों में तस्वीर और साफ हो सकती है।

2011 की जनगणना पर परिसीमन का पेच

पंचायत चुनाव से ज्यादा दिलचस्प मामला परिसीमन को लेकर सामने आया है। समिति ने 2011 की जनगणना के आधार पर पंचायतों के मौजूदा परिसीमन पर सवाल उठाया है।समिति का तर्क है कि देश में 2026-27 की जनगणना की प्रक्रिया चल रही है। ऐसे में आने वाले समय में आबादी से जुड़े नए आंकड़े सामने आएंगे। समिति के मुताबिक सरकार के गजट में 31 मार्च 2027 तक परिसीमन नहीं करने का प्रावधान बताया गया है।इसी आधार पर समिति ने मांग की है कि फिलहाल चल रही परिसीमन प्रक्रिया को रोक दिया जाए और नई जनगणना के आंकड़े आने के बाद वैज्ञानिक तरीके से पंचायतों की सीमाओं का निर्धारण किया जाए।

समिति का कहना है कि अगर पुराने आंकड़ों के आधार पर अभी पंचायतों की सीमाएं बदल दी जाती हैं और बाद में नई जनगणना के आंकड़े आते हैं, तो दोबारा परिसीमन की जरूरत पड़ सकती है। इससे प्रशासनिक प्रक्रिया और खर्च दोनों बढ़ सकते हैं।

नई पंचायतें बनीं तो बढ़ेगा सरकार का खर्च?

बैठक में एक और अहम मुद्दा सामने आया—अगर परिसीमन के बाद बड़ी संख्या में नई पंचायतों का गठन होता है तो सरकार के सामने अतिरिक्त वित्तीय और प्रशासनिक बोझ खड़ा हो सकता है।समिति के मुताबिक नई पंचायत बनने का मतलब सिर्फ नक्शे पर सीमा बदलना नहीं है। इसके साथ पंचायत भवन, स्कूल, पंचायत सचिव, कर्मचारी, कार्यपालक सहायक, जूनियर इंजीनियर और सफाईकर्मियों समेत कई स्तरों पर संसाधनों की जरूरत पड़ेगी।यही वजह है कि समिति चाहती है कि सरकार नई पंचायतों के गठन से पहले ही बजट, जमीन, भवन और मानव संसाधन को लेकर स्पष्ट रोडमैप तैयार करे।अगर नई पंचायतें बनती हैं तो कितने नए भवन चाहिए होंगे? कितने कर्मचारियों की नियुक्ति करनी होगी? कितना अतिरिक्त बजट लगेगा? इन तमाम सवालों का जवाब पहले से तैयार होना चाहिए।

समिति का फॉर्मूला क्या है?

त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव संघर्ष समिति ने सरकार के सामने एक स्पष्ट रास्ता भी रखा है। समिति की प्रमुख मांग है कि 2026 में मौजूदा पंचायत सीमाओं के आधार पर चुनाव कराया जाए।इसके बाद जब 2026-27 की जनगणना के आंकड़े उपलब्ध हो जाएं तो नए आंकड़ों के आधार पर पंचायतों का वैज्ञानिक परिसीमन कराया जाए।समिति का मानना है कि इससे एक तरफ समय पर पंचायत चुनाव हो जाएगा, वहीं दूसरी तरफ सरकार को भविष्य में बनने वाली नई पंचायतों की संभावित संख्या का आकलन करने का पर्याप्त समय मिल जाएगा। इसके आधार पर पंचायत भवन से लेकर बजट और कर्मचारियों तक की व्यवस्था व्यवस्थित तरीके से की जा सकेगी।

अब सरकार के फैसले पर नजर

बिहार में पंचायत चुनाव सिर्फ ग्रामीण स्तर की प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर गांवों की स्थानीय राजनीति पर भी पड़ता है। मुखिया, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्य, सरपंच और वार्ड सदस्य समेत हजारों पदों के लिए चुनाव में बड़ी संख्या में प्रत्याशी मैदान में उतरते हैं।ऐसे में चुनाव की तारीख, पंचायतों की सीमा और संभावित नए परिसीमन को लेकर ग्रामीण इलाकों में पहले से ही उत्सुकता बनी हुई है।अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार मौजूदा पंचायत सीमाओं के आधार पर समय पर चुनाव कराने की मांग मानती है या फिर परिसीमन और नए आंकड़ों को लेकर कोई अलग रास्ता अपनाती है?

फिलहाल समिति ने सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग से संवैधानिक समयसीमा के भीतर चुनाव कराने और परिसीमन को लेकर स्पष्ट नीति बनाने की अपील की है। आने वाले दिनों में सरकार और निर्वाचन आयोग का रुख ही तय करेगा कि बिहार में पंचायत चुनाव 2026 का रास्ता पुराने परिसीमन से खुलेगा या नए आंकड़ों के इंतजार में तस्वीर बदलेगी।