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BIHAR NEWS : राबड़ी देवी के बंगले पर क्यों मचा बवाल? जानिए बिहार के पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास देने वाला पूरा कानून

राबड़ी देवी के सरकारी बंगले को लेकर विवाद के बीच बिहार में पूर्व मुख्यमंत्रियों को मिलने वाले सरकारी आवास और सुरक्षा की व्यवस्था फिर चर्चा में है। जानिए 2000 के विशेष सुरक्षा अधिनियम से लेकर नीतीश सरकार के संशोधन तक पूरे कानून और उसके राजनीतिक इतिहास

Bihar Former Chief Minister Bungalow,
Bihar Former Chief Minister Bungalow,
© ai photo
Tejpratap
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6 मिनट

पटना: बिहार में इन दिनों पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के सरकारी आवास को लेकर सियासत गर्म है। 10 सर्कुलर रोड स्थित सरकारी बंगला खाली होने के बाद अब यह सवाल उठने लगा है कि आखिर पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास और अन्य सुविधाएं किस आधार पर मिलती हैं। दिलचस्प बात यह है कि इसकी नींव आज नहीं, बल्कि करीब 19 साल पहले बने एक विशेष कानून से जुड़ी हुई है। बाद में मुख्यमंत्री रहते हुए नीतीश कुमार ने इस कानून में बड़ा संशोधन किया, जिससे लगभग सभी पूर्व मुख्यमंत्री इन सुविधाओं के दायरे में आ गए।


2000 में हुई थी कानून की शुरुआत

बिहार में पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास, सुरक्षा और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की व्यवस्था किसी सरकारी आदेश से नहीं बल्कि विशेष सुरक्षा अधिनियम, 2000 के तहत लागू की गई थी। यह कानून उस समय अस्तित्व में आया जब राज्य में राबड़ी देवी की सरकार थी।


वर्ष 2000 बिहार की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहा। उसी साल सात दिनों के भीतर राज्य को दो मुख्यमंत्री मिले। पहले नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन बहुमत साबित नहीं कर सके। इसके बाद राबड़ी देवी दोबारा मुख्यमंत्री बनीं। इसी कार्यकाल में पूर्व मुख्यमंत्रियों की सुरक्षा और सुविधाओं को लेकर यह विशेष अधिनियम बनाया गया।


शुरुआत में सिर्फ दो नेताओं को मिलता था लाभ

जब यह कानून लागू हुआ तो उसमें साफ प्रावधान था कि केवल वही पूर्व मुख्यमंत्री सरकारी आवास और सुरक्षा जैसी सुविधाओं के हकदार होंगे, जिन्होंने कम से कम पांच वर्ष का मुख्यमंत्री कार्यकाल पूरा किया हो। इस शर्त के कारण उस समय केवल लालू प्रसाद यादव ही इस सुविधा के पात्र थे। बाद में राबड़ी देवी ने भी पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया तो वे भी इसके दायरे में आ गईं। हालांकि, इस नियम के चलते कई पूर्व मुख्यमंत्री इन सुविधाओं से बाहर रह गए। इनमें तीन बार मुख्यमंत्री रहे डॉ. जगन्नाथ मिश्र, पूर्व मुख्यमंत्री रामसुंदर दास, सतीश प्रसाद सिंह और स्वयं नीतीश कुमार भी शामिल थे, क्योंकि किसी का भी लगातार पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा नहीं हुआ था।


राज्यपाल ने लौटा दिया था विधेयक

विशेष सुरक्षा अधिनियम को लेकर शुरुआत से ही विवाद हुआ था। तत्कालीन राज्यपाल विनोद चंद्र पांडेय ने इस विधेयक पर गंभीर आपत्ति जताते हुए इसे सरकार को वापस भेज दिया था। राज्यपाल की मुख्य आपत्ति सुरक्षा व्यवस्था को लेकर थी। मूल विधेयक में प्रावधान था कि यदि कोई पूर्व मुख्यमंत्री देश के किसी भी हिस्से में जाए तो उसकी सुरक्षा के लिए बिहार पुलिस साथ जाएगी। राज्यपाल का मानना था कि यह व्यवस्था पुलिस अधिनियम से टकराती है और व्यवहारिक भी नहीं है। इसके बाद सरकार ने इस प्रावधान को हटाया और संशोधित स्वरूप में विधेयक पारित कराया।


नक्सली और आतंकी खतरे को देखते हुए बना था कानून

उस दौर में बिहार के कई जिले नक्सली हिंसा से प्रभावित थे। इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर पर आतंकवादी गतिविधियों का खतरा भी बढ़ रहा था। इसी पृष्ठभूमि में पूर्व मुख्यमंत्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से यह विशेष कानून बनाया गया था। सरकार का तर्क था कि पूर्व मुख्यमंत्री संवेदनशील राजनीतिक व्यक्तित्व होते हैं और उनके ऊपर सुरक्षा संबंधी खतरा बना रह सकता है। इसलिए उन्हें विशेष सुरक्षा और सरकारी सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए।


2010 में नीतीश सरकार ने बदले नियम

करीब दस वर्ष बाद, अप्रैल 2010 में मुख्यमंत्री रहते हुए नीतीश कुमार ने इस कानून में महत्वपूर्ण संशोधन कराया। सबसे बड़ा बदलाव यह था कि पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा करने की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई। इस संशोधन के बाद बिहार के सभी पूर्व मुख्यमंत्री सरकारी आवास और अन्य सुविधाओं के पात्र हो गए। इसका सीधा लाभ डॉ. जगन्नाथ मिश्र, सतीश प्रसाद सिंह सहित उन सभी नेताओं को मिला, जो पहले केवल पांच वर्ष की शर्त के कारण बाहर थे।


एक परिवार को मिलेगा केवल एक सरकारी आवास

2010 के संशोधन में एक और महत्वपूर्ण प्रावधान जोड़ा गया। इसमें कहा गया कि यदि एक ही परिवार के दो सदस्य पूर्व मुख्यमंत्री हों, तो उन्हें अलग-अलग सरकारी आवास नहीं दिए जाएंगे। यही नियम बाद में लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी पर लागू हुआ। दोनों पूर्व मुख्यमंत्री होने के बावजूद उन्हें केवल एक सरकारी आवास की सुविधा मिली और वे लंबे समय तक एक ही सरकारी बंगले में रहते रहे।


अब फिर चर्चा में आया सरकारी बंगला

हाल के दिनों में बिहार सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी को आवंटित सरकारी आवास को लेकर नई कार्रवाई शुरू की है। सरकार ने उन्हें वैकल्पिक आवास आवंटित करते हुए पुराने बंगले को खाली करने का निर्देश दिया है। इसके बाद दो दिन पहले राबड़ी देवी ने बंगला खाली कर दिया। अब भवन निर्माण विभाग ने आवास का निरीक्षण भी शुरू कर दिया है। इसी घटनाक्रम के चलते एक बार फिर पूर्व मुख्यमंत्रियों को मिलने वाली सरकारी सुविधाएं, विशेष सुरक्षा अधिनियम और उससे जुड़े संशोधन राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गए हैं।


बिहार में पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास और सुरक्षा देने की व्यवस्था कोई नई नहीं है। इसकी शुरुआत वर्ष 2000 में राबड़ी देवी सरकार द्वारा बनाए गए विशेष सुरक्षा अधिनियम से हुई थी। बाद में 2010 में नीतीश कुमार सरकार ने इसमें संशोधन कर पात्रता का दायरा बढ़ा दिया। आज जब सरकारी बंगले को लेकर फिर विवाद खड़ा हुआ है, तब यह पूरा कानून और उसका राजनीतिक इतिहास एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है।