1st Bihar Published by: First Bihar Updated Sat, 31 Jan 2026 10:05:13 AM IST
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Bihar CBI investigation : बिहार उन राज्यों में से एक है जहाँ समय‑समय पर यौन अपराध, विशेषकर बच्चों और महिलाओं के खिलाफ भारी आरोप दर्ज हुए हैं। इनमें कुछ मामलों की जांच सिर्फ पुलिस ने नहीं, बल्कि CBI को सौंपी गई, ताकि निष्पक्षता और गहरी जांच संभव हो सके। ये केस न सिर्फ बिहार की राजनीति‑न्याय व्यवस्था पर असर डालते हैं, बल्कि देश भर में कानून‑व्यवस्था, न्याय की उम्मीद और अनुसंधान एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठाते रहे हैं।
मुज़फ़्फ़रपुर शेल्टर‑होम रेप केस (2018‑2020)
यह बिहार का सबसे प्रसिद्ध और गंभीर मामला है, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया। यह कहानी 2018 में सामने आई जब तटी (TISS) यानी Tata Institute of Social Sciences ने बिहार सरकार को एक ऑडिट रिपोर्ट भेजी। रिपोर्ट में बिहार के कई सरकारी अनुदानित शेल्टर होम में लड़कियों के साथ यौन शोषण, मानसिक एवं शारीरिक हिंसा के संकेत मिले। खासकर मुज़फ़्फ़रपुर के बालिका गृह में 34 लड़कियों के साथ यौन शोषण और सम्भावित रेप की पुष्टि हुई। बिहार पुलिस ने 31 मई 2018 को FIR दर्ज की और स्थानीय स्तर पर जांच शुरू की, लेकिन बाद में राजनीतिक दबाव और जांच कमजोर पड़े इस बात के कारण मामले को 28 जुलाई 2018 को CBI के पास भेज दिया गया।
CBI ने इस प्रकरण में 21 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की, जिसमें NGO संचालक ब्रजेश ठाकुर और उसके सहयोगी शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट ने केस का ट्रायल पटना से दिल्ली के साकेत कोर्ट में स्थानांतरित किया। फरवरी 2020 में 19 आरोपियों को दोषी ठहराया गया, जिनमें कई को अपराधिक साजिश, बलात्कार, गँग रेप और पीड़ितों के खिलाफ गंभीर अपराध के लिए सज़ा मिली।
CBI की जांच पर विवाद भी उठे। एजेंसी ने कोर्ट को बताया कि जांच में जिन औरतों की मौत की सम्भावना थी, उनके बारे में सबूत नहीं मिले। CBI ने यह भी बताया कि 11 लड़कियों के शवों के अवशेष मिले हैं, लेकिन राजनीतिक व प्रशासनिक दखल‑अंदाज़ के आरोप भी लगे। यह मामला दिखाता है कि बिहार में जब राजनीतिक दबाव, प्रशासनिक स्तर की शिथिलता और संस्थागत विफलता एक साथ मिल जाते हैं, तब ही CBI जैसे केंद्रीय एजेंट की भूमिका बहुत गंभीर हो जाती है।
नवरुणा कांड- आज तक नहीं मिला न्याय ?
नवरुणा कांड, जो 18 सितंबर 2012 को बिहार के मुजफ्फरपुर में घटित हुआ था, एक बेहद दर्दनाक और अनसुलझा मामला है। इसमें 9वीं की छात्रा नवरुणा चक्रवर्ती का अपहरण और कथित हत्या शामिल थी। घटना ने पूरे जिले और राज्य को हिला कर रख दिया था, क्योंकि यह न केवल एक छोटे बच्चे के खिलाफ अपराध था, बल्कि सुरक्षा और कानून व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर गया था। घटना के दिन, नवरुणा अपने पैतृक घर से अचानक गायब हो गई। परिवार और पड़ोसियों ने खोजबीन की, लेकिन उसका कोई पता नहीं चला। कुछ दिनों बाद, उसके घर के पास स्थित नाले में एक नर कंकाल पाया गया। प्रारंभिक जांच में यह माना गया कि यह कंकाल नवरुणा का ही हो सकता है। यह दृश्य स्थानीय लोगों और पुलिस दोनों के लिए सदमे का कारण बन गया।
मुजफ्फरपुर पुलिस ने प्रारंभ में मामले की जांच शुरू की, लेकिन मामले की गंभीरता और जटिलता के कारण बाद में यह सीबीआई (केंद्रीय जांच ब्यूरो) को सौंपा गया। सीबीआई ने घटनास्थल, नाले के आसपास और नवरुणा के संबंधियों से साक्ष्य इकट्ठा करने का काम शुरू किया। आरोपियों के संभावित लिंक, मोबाइल लोकेशन, स्कूल और पड़ोसियों से जानकारी जुटाई गई, लेकिन हर पहलू पर जांच के बावजूद कोई ठोस सुराग नहीं मिल पाया। सीबीआई ने कई सालों तक मामले की गहन जांच की। साक्ष्यों की कमी और समय के साथ महत्वपूर्ण सुरागों के नष्ट होने के कारण जांच को सही दिशा देना बेहद कठिन साबित हुआ। इसके बावजूद एजेंसी ने सभी संभावित स्रोतों से जानकारी जुटाई, लेकिन हत्यारों की पहचान करना संभव नहीं हो सका।
आखिरकार, 2020 में सीबीआई ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी, जिसमें कहा गया कि उपलब्ध साक्ष्यों और जांच के आधार पर अपराधियों तक पहुँच पाना असंभव था। रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया कि मामला अब अनसुलझा रह गया है। नवरुणा कांड ने न केवल पीड़ित परिवार को गहरा दुख दिया, बल्कि बिहार में बाल सुरक्षा और कानून व्यवस्था पर सवाल उठाए।
शिल्पी जैन‑गौतम मामला (1999‑2003)
यह मामला 1999 का है जब पटना में शिल्पी जैन और उसके साथी गौतम सिंह की मौत के सिलसिले में मामला दर्ज हुआ। शवों का पोस्ट‑मॉर्टेम बताया कि दोनों को संभावित तौर पर यौन शोषण और हत्या के बाद शवों को वहीं छोड़ा गया। इस मामले में पलायन, राजनैतिक दबाव और स्थानीय पुलिस की कार्यवाही कमजोर होने की वजह से मामला 9 जुलाई 1999 को CBI को सौंप दिया गया।
CBI ने जांच की लेकिन DNA के लिए जरूरी नमूने नहीं मिल पाए और कुछ उच्च‑स्तरीय संदिग्धों के नमूने भी नहीं मिले। अंततः 2003 में CBI ने इसे “आत्महत्या” करार देते हुए केस बंद कर दिया। शिल्पी के परिवार ने CBI की रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया और न्याय के लिए लगातार याचिकाएँ दायर कीं, लेकिन मामला स्थिर नहीं हो पाया।यह केस बिहार में यौन अपराध अपराध और सत्ता दखल के बीच के जटिल रिश्तों को उजागर करता है।
बॉबी कांड — ‘जंगलराज’ का दर्दनाक उदाहरण
बॉबी कांड 1983 में बिहार की राजधानी पटना में सामने आया एक विवादित और रहस्यमयी केस है। उस समय बिहार विधानसभा के सचिवालय में काम करने वाली श्वेता निशा त्रिवेदी (Bobby) नाम की महिला की अचानक मौत की खबर दो प्रमुख अखबारों के पहले पन्ने पर 11 मई 1983 को छपी और राज्य में हड़कंप मचा दिया।
बॉबी कांग्रेस पार्टी की वरिष्ठ नेता और बिहार विधान परिषद की सभापति राजेश्वरी सरोज दास की गोद ली हुई बेटी थी और विधानसभा सचिवालय में नौकरी करती थी। मौत के बाद उसके शव को बिना किसी जांच के जल्दबाजी में दफना दिया गया, जिससे कई लोगों को शक हुआ।
पटना के तत्कालीन एसएसपी किशोर कुणाल ने मामले की जांच शुरू की। शुरुआती पोस्टमॉर्टम रिपोर्टों में उसके मौत के कारण अलग-अलग लिखे गए — एक में इंटरनल ब्लीडिंग, दूसरे में हार्ट अटैक — जिससे मामला और जटिल हो गया। बाद में जब बॉबी की लाश को निकालकर विसरा (organs) की जांच की गई, तो उसमें ‘मेलेथियन’ जहर मिला, जिससे शक और पुख्ता हुआ कि यह एक हत्या है, न कि सामान्य मौत।
जांच में पता चला कि बॉबी के कई रसूखदार नेताओं से संबंध थे और उसी वजह से मामला जल्द ही राजनीतिक गलियारों तक फैल गया। कुछ आरोपों में बड़े नेताओं और उनके परिवार के सदस्यों के नाम भी उभरने लगे, जिससे सरकार पर दबाव बढ़ा। बाद में घटना सीबीआई को सौंपी गई, लेकिन सीबीआई ने इसे आत्महत्या की रिपोर्ट तैयार कर केस बंद कर दिया, यह दावा करते हुए कि बॉबी प्रेम संबंध के दबाव में थी। हालांकि पटना फोरेंसिक लैब ने इस निष्कर्ष पर सवाल उठाए। इस तरह बॉबी कांड बिहार की राजनीति और न्याय व्यवस्था में सत्ता के प्रभाव का एक परिचायक बन गया, जिसमें हत्या के आरोप, जांच में राजनीतिक दखल और जांच एजेंसियों के बीच मतभेद की कहानी शामिल है।
चंपा विश्वास कांड — ‘जंगलराज’ का दर्दनाक उदाहरण
चंपा विश्वास कांड बिहार के कथित ‘जंगलराज’ के दौर (1990 के दशक) का एक दिल दहलाने वाला मामला है। इसमें आईएएस अधिकारी डी.डी. विश्वास की पत्नी चंपा विश्वास के साथ कथित तौर पर लगातार लगभग 2 साल तक बलात्कार हुआ। आरोप है कि समाज कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष राजद विधायक हेमलता यादव के बेटे मृत्युंजय यादव तथा उसके साथियों ने चंपा को 1995 से 1997 तक लगातार प्रताड़ित किया।
यह मामला उस समय मीडिया और राजनीति में सुर्खियों में रहा, क्योंकि पीड़ित एक शक्तिशाली अधिकारी की पत्नी थी और आरोपियों का राजनीतिक संरक्षण था। आरोप यह भी था कि बलात्कार के दौरान चंपा का जबरन गर्भपात करवाया गया और बाद में नसबंदी तक करवा दी गई ताकि कोई साक्ष्य न बचे। पुलिस में शिकायत के बावजूद उन्हें न्याय मिलने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
चंपा विश्वास कांड का राजनीतिक संदर्भ भी बेहद महत्वपूर्ण है। इसे बिहार में निर्वाहहीन कानून व्यवस्था और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त अपराधियों की गतिविधियों का उदाहरण बताया गया, जहां सत्ताधारी नेताओं की उपस्थिति में कानून और व्यवस्था अक्सर प्रभावित होती थी। वर्तमान राजनीतिक बहसों में भी यह कांड उभरकर सामने आता है — खासकर चुनावों के समय विपक्ष द्वारा इसे सत्ता पक्ष पर आरोप के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
अन्य मामलों में CBI जांच की मांग और सिफारिशें
बिहार में हर रेप या यौन अपराध केस की CBI जांच नहीं होती। फिर भी कुछ मामलों में उच्च न्यायालय, सुप्रीम कोर्ट या राज्य सरकार ने CBI जांच की मांग की, खासकर जब स्थानीय पुलिस की निष्पक्षता पर प्रश्न उठे हैं। राज किशोर केस: 2011 में पूर्व विधायक राज किशोर केस में CBI जांच की मांग हुई थी, जहां महिला ने विधायक पर यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए थे। मुख्यमंत्री ने इस मामले की CBI जांच की सिफारिश की थी।