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Bihar Satellite Township : किसानों के विरोध के बाद सरकार का नया दांव! बिहार में जमीन लेने के लिए मिलेंगे 4 विकल्प

बिहार में 12 सेटेलाइट टाउनशिप के लिए किसानों की जमीन लेने पर विरोध के बीच सरकार ने नया फॉर्मूला तैयार किया है। किसानों को जमीन देने के लिए 4 विकल्प दिए जाएंगे और सहमति के आधार पर प्रक्रिया अपनाई जाएगी।

Bihar Satellite Township : किसानों के विरोध के बाद सरकार का नया दांव! बिहार में जमीन लेने के लिए मिलेंगे 4 विकल्प
Tejpratap
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7 मिनट

पटना :  बिहार में 12 नई सेटेलाइट टाउनशिप बसाने की महत्वाकांक्षी योजना अब जमीन के सवाल पर एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। सरकार आधुनिक शहरों का खाका तैयार कर रही है, विकास योजनाओं की सीमाएं तय हो चुकी हैं और पाटलिपुत्र टाउनशिप की विकास योजना का प्रारूप भी सामने आ चुका है, लेकिन जमीन मालिकों और किसानों की आपत्तियों ने सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

अब इस चुनौती से निपटने के लिए सम्राट चौधरी सरकार ने किसानों के लिए एक नया रास्ता तैयार किया है। नगर विकास एवं आवास विभाग जमीन लेने के लिए किसानों के सामने चार विकल्प रखेगा। अधिकारी गांवों और किसानों के बीच जाकर इन विकल्पों की जानकारी देंगे। खास बात यह होगी कि किसानों की सहमति के आधार पर जमीन लेने की प्रक्रिया तय की जाएगी।

सरकार का यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि 12 सेटेलाइट टाउनशिप के लिए जमीन देने को लेकर कई इलाकों में किसानों और जमीन मालिकों का विरोध सामने आने लगा है। ऐसे में सरकार अब सीधे संवाद के जरिए सहमति बनाने की कोशिश करेगी।

पहले बातचीत, फिर जमीन का फैसला

नगर विकास एवं आवास विभाग ने सभी 12 प्रस्तावित टाउनशिप की सीमा का निर्धारण कर दिया है। वहीं, पाटलिपुत्र टाउनशिप की विकास योजना का प्रारूप भी प्रकाशित हो चुका है। प्रस्तावित पाटलिपुत्र टाउनशिप को 30 सेक्टरों में विकसित करने की योजना है।

फिलहाल सामाजिक और आर्थिक प्रभाव का अध्ययन किया जा रहा है। इसके पूरा होने के बाद जमीन लेने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी और फिर विकास कार्य शुरू करने का रास्ता साफ होगा। लेकिन सरकार की औपचारिक जमीन प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही जमीन मालिकों की नाराजगी सामने आने लगी है।

यही कारण है कि विभाग ने पहले किसानों के साथ संवाद स्थापित करने की रणनीति बनाई है। अधिकारियों की टीम किसानों को समझाएगी कि जमीन देने पर उन्हें क्या लाभ मिल सकते हैं और उनके पास कौन-कौन से विकल्प मौजूद हैं।

पहला और सबसे बड़ा विकल्प- लैंड पुलिंग

सरकार सबसे पहले किसानों को लैंड पुलिंग मॉडल के लिए तैयार करने की कोशिश करेगी। इस मॉडल में किसी एक सेक्टर के विकास के लिए किसानों की जमीन सामूहिक रूप से ली जाएगी। जमीन मिलने के बाद सरकार वहां सड़क, नाला, पार्क, सीवरेज और अन्य आधारभूत संरचनाओं का निर्माण करेगी। इसके बाद विकसित जमीन का 55 प्रतिशत हिस्सा जमीन मालिकों को वापस किया जाएगा।

यानी किसानों की जमीन सिर्फ लेकर खत्म नहीं कर दी जाएगी, बल्कि विकास के बाद उन्हें विकसित क्षेत्र में जमीन वापस मिलने का प्रावधान होगा। किसानों को उनकी जमीन उसी जगह मिले, यह जरूरी नहीं है। उन्हें विकसित सेक्टर में किसी दूसरी उपयुक्त जगह पर भी जमीन दी जा सकती है। सरकार को उम्मीद है कि जमीन की कीमत बढ़ने और विकसित प्लॉट मिलने की संभावना किसानों को इस मॉडल के लिए तैयार कर सकती है।

बातचीत से बनेगी बात तो समझौते का रास्ता

यदि किसान लैंड पुलिंग के लिए तैयार नहीं होते हैं तो सरकार के पास दूसरा विकल्प निगोशिएटेड सेटलमेंट यानी आपसी समझौते का होगा। इसमें किसानों से बातचीत कर सहमति के आधार पर जमीन ली जाएगी। सरकार किसानों को सामान्य मुआवजे के अलावा कुछ अतिरिक्त लाभ देने पर भी विचार कर सकती है।

इस मॉडल में किसानों को अतिरिक्त एफएआर यानी फ्लोर एरिया रेशियो, टीडीआर यानी ट्रांसफरेबल डेवलपमेंट राइट्स और विकास शुल्क में छूट जैसे लाभ दिए जा सकते हैं। इसका उद्देश्य यह है कि जमीन मालिकों को केवल जमीन बेचने वाला व्यक्ति न मानकर विकास प्रक्रिया में भागीदार बनाया जाए।

जमीन खरीद और अधिग्रहण भी विकल्प

टाउनशिप के भीतर सड़क, नाला, पार्क, स्कूल, कॉलेज और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं के लिए जमीन की जरूरत होगी। ऐसी सार्वजनिक उपयोग वाली जमीन को किसानों को विकसित कर वापस देने का विकल्प संभव नहीं होगा।ऐसे मामलों में सरकार पहले किसानों से बातचीत कर जमीन खरीदने की कोशिश करेगी। यदि जमीन मालिक सहमत नहीं होते हैं तो नियमों के अनुसार भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। यानी सार्वजनिक सुविधाओं के लिए जरूरी जमीन के मामले में सरकार के पास अधिग्रहण का विकल्प भी खुला रहेगा।

आखिर में हाइब्रिड मॉडल, एक सेक्टर में अलग-अलग रास्ते

यदि किसी सेक्टर के किसान किसी एक मॉडल पर पूरी तरह सहमत नहीं होते हैं तो सरकार हाइब्रिड मॉडल अपनाएगी। इसे मिश्रित मॉडल भी कहा जा सकता है। इस व्यवस्था में एक ही सेक्टर में लैंड पुलिंग, आपसी समझौता, भूमि खरीद और भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया एक साथ अपनाई जा सकती है। जिस किसान या जमीन मालिक के लिए जो विकल्प स्वीकार्य होगा, उसी प्रक्रिया के तहत उसकी जमीन लेने पर विचार किया जाएगा। यह मॉडल इसलिए अहम है क्योंकि सरकार को उम्मीद है कि सभी किसानों को एक ही नीति पर राजी करना मुश्किल हो सकता है।

विकास की रफ्तार और किसानों की सहमति, दोनों चुनौती

बिहार की 12 सेटेलाइट टाउनशिप परियोजना को सरकार भविष्य के शहरी विकास की बड़ी योजना के रूप में देख रही है। लेकिन परियोजना की सफलता काफी हद तक जमीन उपलब्ध होने पर निर्भर करेगी। किसानों के विरोध को देखते हुए सरकार ने अब सीधे जमीन अधिग्रहण की बजाय पहले संवाद और विकल्पों की रणनीति अपनाई है। सवाल यह है कि क्या 55 प्रतिशत विकसित जमीन वापस मिलने का लैंड पुलिंग मॉडल किसानों को पसंद आएगा, क्या अतिरिक्त एफएआर और टीडीआर जैसे लाभ उन्हें समझौते के लिए तैयार करेंगे, या फिर जमीन का मुद्दा सरकार के लिए नई राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौती बन जाएगा?

फिलहाल इतना तय है कि बिहार की 12 नई टाउनशिप की राह अब सिर्फ नक्शे और विकास योजना से तय नहीं होगी। इस रास्ते का सबसे बड़ा फैसला किसानों की सहमति करेगी। सरकार ने चार विकल्पों की चाबी जरूर तैयार कर ली है, लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि किसान इनमें से किस विकल्प का दरवाजा खोलते हैं।