PATNA: पटना की मेयर सीता साहू ने निर्वाचन आयोग और SIR को लेकर जारी राजनीतिक विवाद पर कांग्रेस और विपक्ष पर सवाल उठाए। कहा कि संवैधानिक संस्थाओं पर गंभीर आरोप लगाने से पहले तथ्यों और आयोग के आधिकारिक पक्ष को सामने रखना जरूरी है। बता दें कि 26 सितंबर की बैठक के बाद निर्वाचन आयोग ने SIR से जुड़े फैसलों को लेकर स्पष्टीकरण जारी किया था।
पटना नगर निगम की श्रीमती सीता साहू ने मंगलवार को निर्वाचन आयोग के कामकाज और मुख्य निर्वाचन आयुक्त को लेकर सामने आई मीडिया रिपोर्ट तथा उसके बाद उत्पन्न राजनीतिक विवाद पर अपनी बात रखी। महापौर ने कहा कि यह विषय केवल किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति से जुड़ा हुआ नहीं है, बल्कि देश के लोकतांत्रिक ढांचे और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति जनता के विश्वास से जुड़ा है।
महापौर ने कहा कि द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद निर्वाचन आयोग के भीतर कथित मतभेद और SIR को लेकर विपक्ष ने गंभीर आरोप लगाए। लेकिन 26 सितंबर को मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों निर्वाचन आयुक्तों एस.एस. संधू एवं विवेक जोशी की बैठक के बाद आयोग ने स्पष्ट किया कि SIR सहित प्रमुख निर्णय पूर्ण आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए थे।
सर्वसम्मति से लिए गए निर्णयों को लेकर भ्रम की स्थिति क्यों?- महापौर
महापौर ने कहा कि निर्वाचन आयोग के संयुक्त स्पष्टीकरण में स्पष्ट किया गया है कि SIR सहित आयोग के प्रमुख निर्णय पूर्ण आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए। आयोग ने यह भी कहा कि विभिन्न स्तरों पर अधिकारियों और आयुक्तों द्वारा सुझाव, प्रश्न और टिप्पणियां किया जाना निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा है तथा अंतिम निर्णय आयोग द्वारा सामूहिक रूप से लिए जाते हैं। महापौर ने सवाल उठाया कि यदि आयोग स्वयं अंतिम निर्णयों को सर्वसम्मत बता रहा है, तो आयोग के भीतर कथित संस्थागत मतभेद को किस आधार पर अंतिम निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सवाल पूछना राजनीतिक दलों और नागरिकों का अधिकार है, लेकिन किसी संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता से जुड़े गंभीर दावों को सार्वजनिक करने से पहले उपलब्ध तथ्यों और संबंधित संस्था के पक्ष को भी सामने रखना आवश्यक है।
"कैबिनेट सेक्रेटरी को भेजे गए पत्र के बहाने आयोग की छवि धूमिल की गई"
महापौर ने कैबिनेट सेक्रेटरी को भेजे गए पत्र को लेकर उठे सवालों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग के अनुसार यह पत्र SIR अथवा किसी चुनावी नीति से संबंधित निर्णय का हिस्सा नहीं था, बल्कि प्रतिनियुक्ति पर आए एक अधिकारी की प्रशासनिक कार्यप्रणाली से जुड़े आंतरिक प्रशासनिक विषय से संबंधित था। इस संबंध में आयोग ने 26 सितंबर की बैठक के बाद अपनी स्थिति स्पष्ट की थी।
महापौर ने कहा कि यदि किसी प्रशासनिक विषय को चुनावी प्रक्रिया से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है, तो यह आवश्यक है कि उसके पीछे मौजूद दस्तावेजों और निर्वाचन आयोग के स्पष्टीकरण को भी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाया जाए।
उन्होंने कहा, “किसी समाचार रिपोर्ट में निर्वाचन आयोग के कामकाज को लेकर गंभीर दावे किए जाते हैं तो उन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना जरूरी है। और जब आयोग के तीनों सदस्य स्वयं सामने आकर अपना पक्ष स्पष्ट कर चुके हैं, तो उस पक्ष को भी जनता के सामने उसी गंभीरता से रखा जाना चाहिए।”
फॉर्म-6 और घोषणा पत्र को लेकर भी तथ्य सामने रखना जरूरी- महापौर
महापौर ने SIR के दौरान Form-6 और उससे संबंधित घोषणा पत्र को लेकर उठे विवाद का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा, “यह कहना कि चुनाव आयोग ने चुपचाप नियम बदल दिए या मतदाता अधिकारों को प्रभावित करने के लिए कोई मनमाना बदलाव किया गया, जैसे गंभीर दावों को तथ्यों और उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर ही देखा जाना चाहिए।”
हर पात्र नागरिक की लोकतांत्रिक भागीदारी सुनिश्चित करना जरूरी-महापौर
महापौर ने कहा कि किसी भी मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया का मूल उद्देश्य पात्र नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल करना और मतदाता सूची को अद्यतन एवं विश्वसनीय बनाना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग की ओर से SIR प्रक्रिया के दौरान छूटे हुए पात्र लोगों तक पहुंचने के लिए विशेष प्रयासों की जानकारी दी गई है। इनमें BLO के माध्यम से घर-घर संपर्क तथा पात्र नए मतदाताओं के लिए Form-6 उपलब्ध कराने जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। निर्वाचन आयोग के आधिकारिक दस्तावेजों में भी BLO द्वारा घर-घर जाकर फॉर्म उपलब्ध कराने और प्राप्त करने की व्यवस्था का उल्लेख है।
महापौर ने कांग्रेस और विपक्ष से पूछे सवाल
महापौर ने कहा, “राजनीतिक दलों को निर्वाचन आयोग से सवाल पूछने का पूरा अधिकार है। लेकिन किसी संवैधानिक संस्था पर गंभीर आरोप लगाने से पहले तथ्यों की पूरी जांच करना भी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।” उन्होंने कहा कि यदि प्रत्येक राजनीतिक विवाद के बाद संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए जाएंगे, तो इससे केवल राजनीतिक दलों के बीच विवाद नहीं बढ़ेगा, बल्कि आम नागरिक के संस्थाओं पर विश्वास पर भी प्रभाव पड़ सकता है।





