PATNA: मुस्लिम कर्मचारी की मौत के बाद अब उनकी दूसरी पत्नी को भी फैमिली पेंशन का अधिकार मिलेगा। पटना हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह कहा है कि जब तक देश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू नहीं होती, तब तक मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध रूप से दूसरी शादी करने वाली पत्नी को फैमिली पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता।
पटना हाईकोर्ट ने लखीसराय निवासी नजमा खातून की याचिका स्वीकार करते हुए बिहार सरकार और संबंधित अधिकारियों को दो सप्ताह के भीतर फैमिली पेंशन स्वीकृत करने की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया।
अनुच्छेद 44 का हवाला, लेकिन पर्सनल लॉ रहेगा लागू
न्यायमूर्ति पूर्णेंदु सिंह की एकलपीठ ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता लागू करने की परिकल्पना करता है। हालांकि, जब तक इस संबंध में कोई कानून नहीं बनाया जाता, तब तक मुस्लिम समुदाय के विवाह और पारिवारिक संबंधों पर मुस्लिम पर्सनल लॉ ही लागू रहेगा।
पति की मृत्यु के बाद मांगी थी फैमिली पेंशन
याचिकाकर्ता नजमा खातून ने अदालत को बताया कि उनके पति, सरकारी कर्मचारी स्वर्गीय मोहम्मद उस्मान, का 14 अक्टूबर 2024 को निधन हो गया था। उन्होंने दूसरी पत्नी होने के नाते फैमिली पेंशन और बकाया राशि के भुगतान की मांग की थी। राज्य सरकार ने अदालत में दलील दी कि दूसरी शादी के लिए विभागीय अनुमति का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। वहीं, महालेखाकार कार्यालय ने कहा कि वह केवल सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति के आधार पर ही पेंशन जारी कर सकता है।
2011 की अधिसूचना का हवाला
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि बिहार सरकार के वित्त विभाग की 27 जून 2011 की स्पष्टीकरणात्मक अधिसूचना के अनुसार, मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध विवाह करने वाली जीवित विधवाएं फैमिली पेंशन की हकदार हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह अधिसूचना अब भी प्रभावी है और इसे वापस नहीं लिया गया है। इसलिए याचिकाकर्ता को फैमिली पेंशन का लाभ देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
दो सप्ताह में कार्रवाई का निर्देश
हाई कोर्ट ने सिविल सर्जन, लखीसराय को निर्देश दिया कि वे तत्काल आवश्यक कार्रवाई कर फैमिली पेंशन की स्वीकृति सुनिश्चित करें। साथ ही कोर्ट ने कहा कि यदि दो सप्ताह के भीतर बिना वैधानिक कारण के पेंशन स्वीकृत नहीं की जाती, तो याचिकाकर्ता संबंधित अधिकारी के विरुद्ध विधिक कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होंगी। इस फैसले को मुस्लिम पर्सनल लॉ और फैमिली पेंशन से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय माना जा रहा है।





