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Bihar MLC Election : ललन-अनंत के गढ़ में उतरेंगे निशांत, नीरज की राह आसान करने की कोशिश; क्या बिदके ‘लव-कुश’ को साथ ला पाएंगे?

पटना स्नातक MLC चुनाव में सियासी घमासान तेज है। नीरज कुमार की राह आसान करने के लिए निशांत कुमार ललन-अनंत के प्रभाव वाले इलाकों में उतरेंगे। सवाल है कि क्या बिदके ‘लव-कुश’ समीकरण को NDA फिर अपने साथ ला पाएगा?

Bihar MLC Election
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Tejpratap
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9 मिनट

Bihar MLC Election  : पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव अब सिर्फ एक सीट जीतने की लड़ाई नहीं रह गया है। 23 अक्टूबर को होने वाले मतदान से पहले जिस तरह राजनीतिक दांव-पेच तेज हुए हैं, उससे साफ है कि मुकाबला वोटों के साथ-साथ संगठन, व्यक्तिगत प्रभाव और नेताओं के बीच बनते-बिगड़ते रिश्तों का भी है। एनडीए के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने ही खेमे में पैदा हुई असहजता को संभालने की है। खासकर तब, जब जेडीयू के कद्दावर नेता अनंत सिंह खुलकर अपने पसंदीदा उम्मीदवार के समर्थन में मैदान में उतर चुके हैं।

पटना स्नातक सीट से जेडीयू ने मौजूदा विधान पार्षद नीरज कुमार को फिर मैदान में उतारा है। नीरज लगातार तीन बार जीत चुके हैं और चौथी जीत के लिए मैदान में हैं। दूसरी तरफ आरजेडी और जन सुराज ने भी मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। लेकिन इन सबसे ज्यादा चर्चा उस राजनीतिक समीकरण की है, जिसमें एक तरफ अनंत सिंह हैं तो दूसरी तरफ पार्टी नेतृत्व के सामने उन्हें साधने की चुनौती। अब इसी बीच निशांत कुमार के चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी ने मुकाबले को एक और परत दे दी है।

ललन सिंह के प्रभाव वाले इलाके में अनंत की सक्रियता

पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का भूगोल सिर्फ पटना शहर तक सीमित नहीं है। इसमें पटना के साथ नालंदा और नवादा भी आते हैं। यही वह इलाका है जहां जेडीयू के पुराने संगठनात्मक प्रभाव के साथ कई बड़े नेताओं की व्यक्तिगत पकड़ भी रही है।

मुंगेर के सांसद और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह का प्रभाव भी इस पूरे राजनीतिक समीकरण में महत्वपूर्ण माना जाता है। वहीं मोकामा विधायक अनंत सिंह का अपना अलग जनाधार है। अनंत ने इस चुनाव में पार्टी लाइन से अलग जाकर जन सुराज समर्थित डॉ. अनुज सिंह के पक्ष में समर्थन का ऐलान किया है।

अनंत का तर्क भी सीधा है। उनका कहना है कि नीरज कुमार ने कई मौकों पर उनका विरोध किया और पार्टी ने उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया। इसी नाराजगी ने अब चुनावी गणित को मुश्किल बना दिया है। यानी लड़ाई सिर्फ नीरज बनाम विपक्ष नहीं है। असली सवाल यह भी है कि जेडीयू अपने ही प्रभावशाली नेताओं और समर्थकों को कितनी मजबूती से एक उम्मीदवार के पीछे खड़ा कर पाती है।

निशांत की एंट्री क्यों अहम?

यहीं से निशांत कुमार की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को पार्टी ने स्वास्थ्य मंत्री और विधान परिषद सदस्य के तौर पर राजनीतिक जिम्मेदारी दी है। अब उनका चुनाव प्रचार में उतरना महज एक सामान्य कार्यक्रम नहीं माना जा रहा।

नीरज कुमार के पक्ष में निशांत का उतरना कई संदेश देता है। पहला संदेश संगठन को है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अपने उम्मीदवार के पीछे मजबूती से खड़ा है। दूसरा संदेश उन कार्यकर्ताओं को है जो अनंत सिंह के रुख के कारण असमंजस में हैं। और तीसरा संदेश उन वोटरों को है, जिनके सामने इस चुनाव में व्यक्तिगत बनाम पार्टी के प्रभाव का सवाल खड़ा हो रहा है। निशांत की सभाओं और जनसंपर्क कार्यक्रमों का फोकस अगर नालंदा और नवादा के साथ पटना ग्रामीण इलाके तक बढ़ता है, तो यह सीधे-सीधे नीरज कुमार के पक्ष में माहौल मजबूत करने की कोशिश मानी जाएगी।

‘लव-कुश’ की परीक्षा भी!

पटना स्नातक सीट के चुनाव में एक और राजनीतिक चर्चा लगातार चल रही है—‘लव-कुश’ समीकरण की। बिहार की राजनीति में कुर्मी और कोयरी समुदाय से जुड़े इस सामाजिक समीकरण को एनडीए के लिए लंबे समय से महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। जेडीयू और बीजेपी की चुनावी राजनीति में भी यह समीकरण कई बार निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। लेकिन इस बार सवाल यह है कि क्या अनंत सिंह की नाराजगी और उम्मीदवार को लेकर पैदा हुई खींचतान के बावजूद यह वोट बैंक पूरी तरह एनडीए के पक्ष में एकजुट रहेगा?

यही वजह है कि नीरज कुमार की राह आसान करने के लिए पार्टी नेतृत्व सिर्फ नेताओं की सभाओं पर निर्भर नहीं रहना चाहता। बूथ स्तर तक संपर्क, पुराने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना और अलग-अलग सामाजिक समूहों को साधना भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है।

अनंत को मनाने की कोशिश कितनी सफल?

अनंत सिंह को लेकर जेडीयू के भीतर भी स्थिति आसान नहीं रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें समझाने की कोशिश की। ललन सिंह को भी इस मामले में बातचीत की जिम्मेदारी दिए जाने की चर्चा सामने आई। लेकिन अनंत अपने रुख से पीछे हटते नजर नहीं आए। उन्होंने साफ संकेत दिया कि वह अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं को सिर्फ पार्टी के आदेश के आधार पर बदलने के लिए तैयार नहीं हैं। यही वह बिंदु है जहां पटना स्नातक चुनाव दिलचस्प हो जाता है।

अगर अनंत सिंह अपने समर्थकों को पूरी ताकत से डॉ. अनुज सिंह के पक्ष में उतारते हैं, तो इससे जेडीयू के वोट में सेंध लग सकती है। लेकिन अगर मतदान के अंतिम चरण में पार्टी नेतृत्व उन्हें पूरी तरह साथ लाने में सफल होता है, तो नीरज कुमार को इसका सीधा लाभ मिल सकता है।

मुख्यमंत्री की बैठक और बदले संकेत

9 अक्टूबर को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के आवास पर हुई एनडीए विधायक दल की बैठक में अनंत सिंह की मौजूदगी ने भी राजनीतिक हलकों में चर्चा बढ़ा दी। बैठक का मकसद भी ऐसे नेताओं और संभावित वोट विभाजन से जुड़े समीकरणों पर चर्चा करना माना गया। अनंत बैठक में पहुंचे, लेकिन मीडिया से बातचीत नहीं की। वह सीधे मुख्यमंत्री आवास के अंदर चले गए। हालाँकि बैठक में जाने से पहले उन्होंने हिंट दिया की वह एनडीए के साथ हैं लेकिन बैठक से बाहर आने के बाद उन्होंने साफ़ किया की वह एमएलसी चुनाव में किसी भी हाल में नीरज के लिए वोट अपील नहीं करेंगे बल्कि वह खुद के कैंडिडेट के लिए वोट अपील करेंगे और वह इसी काम में लगे हुए हैं।


इधर, नीरज कुमार के पास अनुभव है। वह लगातार तीन बार पटना स्नातक सीट जीत चुके हैं। लेकिन इस बार चौथी जीत का रास्ता पहले जैसा आसान नहीं दिख रहा। एक तरफ आरजेडी का उम्मीदवार है। दूसरी तरफ जन सुराज ने डॉ. अनुज सिंह को मजबूत तरीके से मैदान में उतारा है। ऊपर से अनंत सिंह का समर्थन डॉ. अनुज के साथ है। ऐसे में नीरज की सबसे बड़ी जरूरत है—अपना पारंपरिक वोट सुरक्षित रखना और विपक्षी वोटों के बिखराव का लाभ उठाना।

अगर अनंत का प्रभाव सीमित रहता है और जेडीयू का संगठन एकजुट होकर वोट ट्रांसफर कराने में सफल रहता है, तो नीरज मजबूत स्थिति में रह सकते हैं। लेकिन अगर अनंत का प्रभाव पटना ग्रामीण के साथ दूसरे इलाकों में भी वोट में बदलता है, तो मुकाबला बेहद कांटे का हो सकता है।

असली लड़ाई आखिरी 10 दिन की

पटना स्नातक सीट पर अब चुनावी तस्वीर तेजी से बदल सकती है। निशांत का मैदान में उतरना इसी बदलाव का संकेत है। निशांत जहां नीरज के लिए पार्टी और नीतीश कुमार के समर्थन का संदेश लेकर जाएंगे, वहीं अनंत सिंह पहले ही अपने प्रभाव वाले इलाकों में डॉ. अनुज के लिए वोट मांग रहे हैं। अब देखना यह है कि व्यक्तिगत नाराजगी बड़ी होती है या पार्टी की अपील। क्या निशांत अपने दौरे से बिखरते समीकरण को संभाल पाएंगे? क्या ललन सिंह और अनंत सिंह के प्रभाव वाले इलाके में जेडीयू अपना पुराना नेटवर्क फिर सक्रिय कर पाएगी? क्या ‘लव-कुश’ समीकरण इस बार भी एनडीए के पक्ष में एकजुट रहेगा? और सबसे बड़ा सवाल—क्या अनंत सिंह मतदान से पहले नीरज कुमार के खिलाफ अपने तेवर नरम करेंगे? पटना स्नातक सीट का परिणाम सिर्फ एक एमएलसी तय नहीं करेगा। यह चुनाव यह भी बताएगा कि जेडीयू के भीतर नेतृत्व की अपील और स्थानीय नेताओं की व्यक्तिगत पकड़ में इस समय किसका पलड़ा भारी है।23 अक्टूबर का मतदान इन तमाम सवालों का जवाब देगा, लेकिन उससे पहले पटना स्नातक सीट बिहार की सियासत का सबसे दिलचस्प टेस्ट बन चुकी है।