पटना: पटना स्नातक सीट का चुनाव अब सिर्फ उम्मीदवारों के बीच मुकाबला नहीं रह गया है। चुनाव की तारीख नजदीक आते ही संगठन, बूथ मैनेजमेंट, एनडीए की एकजुटता और बड़े नेताओं की सक्रियता को लेकर भी सवाल तेज हो गए हैं। इसी बीच जेडीयू प्रत्याशी नीरज कुमार ने कुछ ऐसे बयान दिए हैं, जो चुनावी मैदान में नई बहस छेड़ते दिख रहे हैं। सबसे ज्यादा चर्चा उनके उस बयान की है, जिसमें उन्होंने साफ कहा कि पार्टी और एनडीए के बिना उनकी व्यक्तिगत हैसियत इतनी नहीं कि वह अकेले बूथों पर पोलिंग एजेंट तक बैठा सकें।
नीरज कुमार का यह बयान पहली नजर में भले ही विनम्र राजनीतिक स्वीकारोक्ति लगे, लेकिन इसके भीतर चुनावी राजनीति की एक बड़ी हकीकत छिपी है। दरअसल, स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव आम विधानसभा चुनाव से अलग होता है। यहां बूथ मैनेजमेंट और मतदाताओं से संपर्क के लिए संगठन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। नीरज ने भी अपनी व्यक्तिगत ताकत के बजाय जेडीयू, एनडीए और कार्यकर्ताओं को अपनी असली ताकत बताया।
उन्होंने कहा कि अगर पार्टी और एनडीए साथ नहीं हों तो वह अकेले पोलिंग एजेंट बहाल नहीं कर सकते। उनके मुताबिक उनकी ताकत यह है कि पार्टी के कार्यकर्ताओं ने 23 अक्टूबर के लिए खुद को ‘नीरज’ मानकर चुनावी जिम्मेदारी संभाल ली है। यानी नीरज का संदेश साफ है—यह लड़ाई अकेले नीरज की नहीं, बल्कि पूरे संगठन की है।
प्रशांत किशोर पर सीधा हमला नहीं, जन सुराज की संगठन क्षमता पर सवाल
चुनावी मैदान में जन सुराज की मौजूदगी और प्रशांत किशोर की सक्रियता को लेकर भी नीरज कुमार ने अपना रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि उनकी लड़ाई जन सुराज से है ही नहीं, बल्कि उनका मुख्य मुकाबला राजद से है। इसलिए प्रशांत किशोर के बयानों को वह तवज्जो नहीं देना चाहते।
लेकिन इसके साथ ही उन्होंने जन सुराज के बूथ स्तर के संगठन पर सवाल खड़ा कर दिया। नीरज ने पूछा कि क्या जन सुराज के पास ब्लॉक स्तर तक संगठन मौजूद है? अगर ब्लॉक स्तर पर संगठन नहीं है तो बूथों पर पोलिंग एजेंट कहां से बैठाए जाएंगे?
यही तंज उन्होंने अपनी स्थिति पर भी लगाया। नीरज ने कहा कि अगर वह खुद निर्दलीय हो जाएं तो पटना के बूथों पर पोलिंग एजेंट बैठाना उनके लिए भी आसान नहीं होगा। यानी उन्होंने चुनाव में व्यक्तिगत लोकप्रियता से ज्यादा संगठनात्मक ताकत को निर्णायक बताया।
पुस्तकालय विवाद पर नीरज की सफाई, ‘कमीशन नहीं लेता’
नीरज कुमार से उनके क्षेत्र में पुस्तकालय निर्माण को लेकर उठ रहे सवालों पर भी तीखे सवाल हुए। आरोपों को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि पुस्तकालय का निर्माण हुआ है और उनकी भूमिका केवल अनुशंसा करने तक सीमित है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वह किसी तरह का कमीशन नहीं लेते।
नीरज के मुताबिक मुख्यमंत्री क्षेत्र विकास योजना के तहत जनप्रतिनिधि को अनुशंसा का अधिकार होता है। इसके बाद निर्माण की प्रक्रिया संबंधित विभाग, इंजीनियर और अधिकारियों के स्तर पर आगे बढ़ती है। उन्होंने कहा कि जिला योजना पदाधिकारी और कार्यपालक अभियंता से पूरी जानकारी ली जा सकती है।
पुस्तकालय के निर्माण के बाद उसके संचालन को लेकर भी उन्होंने प्रक्रिया का हवाला दिया। उनका कहना है कि पहले आधारभूत संरचना तैयार होती है, फिर उसका निबंधन होता है और उसके बाद किताबें व दूसरी सामग्री आती है। पुस्तकालय को जनसहयोग से चलाया जा सकता है, लेकिन उसका काम आधारभूत संरचना उपलब्ध कराना है। निर्माण के खंडहर होने के आरोप पर भी नीरज ने पलटवार किया। उन्होंने कहा कि जमीन का एनओसी प्राप्त है और किसी के आरोप लगाने भर से वह अपनी बात नहीं बदल देंगे। उन्होंने निर्माण स्थल पर जाकर स्थिति देखने की चुनौती भी दी।
जीत को लेकर दावा- ‘नीरज कुमार जीतेगा, कोई नहीं रोक सकता’
तमाम सवालों और चुनावी चुनौतियों के बीच नीरज कुमार अपनी जीत को लेकर बेहद आत्मविश्वास में नजर आए। उन्होंने दावा किया कि समाज के सभी तबकों का आशीर्वाद उनके साथ है और उनकी जीत को कोई नहीं रोक सकता। उनका यह आत्मविश्वास ऐसे समय में सामने आया है, जब पटना स्नातक सीट पर मुकाबला कई स्तरों पर दिलचस्प हो चुका है। एक तरफ एनडीए का संगठन है, तो दूसरी ओर विपक्षी दलों और नए राजनीतिक विकल्पों की अपनी रणनीति है। ऐसे में नीरज का यह दावा आने वाले दिनों में और चर्चा में आ सकता है।
एनडीए में घमासान के सवाल पर बोले- ‘कहीं कोई खटपट नहीं’
पटना स्नातक चुनाव को लेकर एनडीए के भीतर मतभेद और नेताओं की सक्रियता पर लगातार चर्चा हो रही है। हालांकि नीरज कुमार ने एनडीए में किसी भी तरह के घमासान से इनकार किया। उन्होंने कहा कि अगर घमासान होता तो खटपट दिखाई देती। उनके मुताबिक एनडीए के नेता उनके प्रचार में जा रहे हैं, इसलिए इसे घमासान नहीं कहा जा सकता। यानी नीरज ने पार्टी के भीतर किसी भी असंतोष की संभावना को खारिज करने की कोशिश की।
प्रचार सूची से ललन सिंह गायब, सवाल पर नीरज ने साधा किनारा
सबसे दिलचस्प सवाल उस वक्त उठा, जब नीरज कुमार के चुनाव प्रचार की सूची में केंद्रीय मंत्री और मुंगेर सांसद ललन सिंह का नाम नहीं होने को लेकर सवाल किया गया। ललन सिंह का राजनीतिक प्रभाव और इलाके से जुड़ाव देखते हुए इस सवाल ने चुनावी चर्चा को और धार दे दी।
नीरज ने कहा कि प्रचार की सूची उन्होंने नहीं बनाई है। यह सूची जेडीयू कार्यालय की ओर से तैयार की गई है। जब उनसे पूछा गया कि ललन सिंह उसी इलाके के सांसद हैं, जहां से उन्हें वोट लेना है, फिर भी उनका नाम क्यों नहीं है, तो नीरज ने जवाब में बाढ़ के विधायक डॉ. सियाराम सिंह का नाम सामने रख दिया।
पत्रकार ने सवाल को और धार देते हुए कहा कि बात ललन सिंह की हो रही है और उनकी तुलना विधायक से नहीं की जा सकती। इसके बावजूद नीरज ने कहा कि हर जनप्रतिनिधि का अपना अधिकार क्षेत्र होता है। कार्यक्रम किस नेता का लगेगा, यह उसकी व्यस्तता पर भी निर्भर करता है। जिन नेताओं की व्यस्तता होगी, उनका कार्यक्रम नहीं दिया गया होगा। यानी ललन सिंह का नाम प्रचार सूची से गायब होने के सवाल पर नीरज ने कोई सीधा राजनीतिक कारण बताने के बजाय इसे संगठन और नेताओं की व्यस्तता से जोड़ दिया।
अब पटना स्नातक सीट पर असली परीक्षा 23 अक्टूबर को होगी। उससे पहले नीरज कुमार के ये बयान कई सवाल छोड़ गए हैं—क्या एनडीए का संगठन उनकी सबसे बड़ी ताकत बनेगा, क्या बूथ मैनेजमेंट विपक्ष को चुनौती देगा और क्या बड़े नेताओं की सक्रियता चुनावी समीकरण बदल सकती है? इन सवालों का जवाब मतदान के दिन मिलेगा, लेकिन इतना साफ है कि पटना स्नातक का चुनाव अब बयानबाजी से भी गरम होता जा रहा है।




