पटना: बिहार विधान परिषद की पटना स्नातक सीट पर चुनावी मुकाबला दिलचस्प होने के साथ-साथ जेडीयू के भीतर की सियासत भी लगातार सुर्खियों में है। पार्टी ने चौथी बार नीरज कुमार पर भरोसा जताया है, लेकिन उनके चुनाव प्रचार की सूची से केंद्रीय मंत्री और मुंगेर सांसद ललन सिंह का नाम गायब होने पर सवाल उठने लगे हैं। जब इस पर नीरज कुमार से जवाब मांगा गया तो उन्होंने साफ कहा कि प्रचार की सूची उन्होंने नहीं बनाई है, बल्कि जेडीयू कार्यालय की ओर से तैयार की गई है। उनका यह जवाब ऐसे समय आया है, जब पार्टी पहले से ही नीरज कुमार और मोकामा विधायक अनंत सिंह के बीच विवाद को लेकर चर्चा में है।
ललन सिंह का नाम प्रचार सूची में नहीं होना इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि पटना स्नातक सीट के चुनाव में पार्टी के बड़े नेताओं की भूमिका और क्षेत्रीय समीकरण पर नजर है। ललन सिंह को अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच विवाद सुलझाने की जिम्मेदारी भी दी गई थी। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस नेता को पार्टी ने अंदरूनी विवाद सुलझाने की जिम्मेदारी दी, वह नीरज के प्रचार कार्यक्रम में क्यों नहीं दिख रहे हैं?
सवाल ललन सिंह पर, जवाब में नीरज ने लिया विधायक का नाम
नीरज कुमार से जब पूछा गया कि उनकी चुनाव प्रचार सूची में ललन सिंह का नाम क्यों नहीं है, तो उन्होंने कहा कि सूची जेडीयू कार्यालय ने बनाई है। इसके बाद पत्रकारों ने सवाल को और स्पष्ट किया कि ललन सिंह उसी इलाके के सांसद हैं, जहां नीरज कुमार को वोट मांगना है। इसके बावजूद उनका नाम सूची में नहीं होना आखिर किस बात का संकेत है?
इस सवाल के जवाब में नीरज कुमार ने बाढ़ के विधायक डॉ. सियाराम सिंह का नाम सामने रख दिया। उन्होंने कहा कि उस इलाके में विधायक भी हैं। जब पत्रकारों ने स्पष्ट किया कि सवाल ललन सिंह को लेकर है और केंद्रीय मंत्री का राजनीतिक कद विधायक से अलग है, तो नीरज ने कहा कि हर जनप्रतिनिधि का अपना अधिकार क्षेत्र होता है। कार्यक्रम किस नेता का लगेगा, यह उसकी व्यस्तता पर भी निर्भर करता है।
हालांकि, इस सफाई से प्रचार सूची में ललन सिंह का नाम नहीं होने का सवाल पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। नीरज ने न तो किसी विवाद की पुष्टि की और न ही किसी राजनीतिक नाराजगी की बात कही। उन्होंने जिम्मेदारी जेडीयू कार्यालय की सूची और नेताओं की व्यस्तता पर छोड़ दी।
अनंत सिंह से विवाद के बीच ललन की भूमिका पर नजर
नीरज कुमार और अनंत सिंह के बीच विवाद कोई नया नहीं है। पटना स्नातक सीट पर नीरज की उम्मीदवारी के बाद यह टकराव खुलकर सामने आया। अनंत सिंह ने जन सुराज के प्रत्याशी डॉ. अनुज सिंह का समर्थन किया और नीरज कुमार को हराने की बात कही। इससे जेडीयू के भीतर असहज स्थिति पैदा हुई, क्योंकि पार्टी का एक विधायक अपने ही दल के आधिकारिक प्रत्याशी के खिलाफ दूसरे उम्मीदवार के पक्ष में खड़ा नजर आया।
इस विवाद को सुलझाने के लिए जेडीयू नेतृत्व ने ललन सिंह को जिम्मेदारी सौंपी थी। पांच अक्टूबर को ललन सिंह ने कहा था कि अनंत सिंह नीरज कुमार के खिलाफ सार्वजनिक बयान नहीं देने पर सहमत हुए हैं, लेकिन वह उनके लिए प्रचार नहीं करेंगे। यानी विवाद पर बयानबाजी रोकने की कोशिश हुई, मगर नीरज को अनंत का चुनावी समर्थन मिलने का रास्ता साफ नहीं हुआ।
इसी पृष्ठभूमि में अब नीरज की प्रचार सूची से ललन सिंह का नाम गायब होना नई चर्चा को जन्म दे रहा है। सवाल यह है कि क्या यह केवल कार्यक्रम और व्यस्तता का मामला है या पार्टी के भीतर चुनावी तालमेल को लेकर अब भी कुछ पेच बाकी हैं? फिलहाल नीरज कुमार की सफाई से किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
एनडीए में घमासान से इनकार, लेकिन सवाल बरकरार
नीरज कुमार ने एनडीए में घमासान की बात को भी खारिज किया है। उनका कहना है कि जब एनडीए के नेता उनके प्रचार में जा रहे हैं तो इसे विवाद कैसे कहा जा सकता है? उन्होंने अपनी ताकत पार्टी और गठबंधन के कार्यकर्ताओं को बताया। यहां तक कहा कि पार्टी और एनडीए के बिना वह अकेले बूथों पर पोलिंग एजेंट तक नहीं बैठा सकते।
उनका यह बयान चुनाव में संगठन की अहमियत तो बताता है, लेकिन साथ ही यह भी रेखांकित करता है कि इस मुकाबले में पार्टी का साथ कितना जरूरी है। ऐसे में प्रचार सूची में बड़े नेताओं के नाम और उनकी वास्तविक सक्रियता पर नजर रहना स्वाभाविक है।
23 अक्टूबर को मतदान, उससे पहले एकजुटता की परीक्षा
पटना स्नातक सीट पर 23 अक्टूबर को मतदान होना है। नीरज कुमार अपनी जीत को लेकर आश्वस्त हैं और दावा कर रहे हैं कि समाज के सभी तबकों का आशीर्वाद उनके साथ है। दूसरी ओर, अनंत सिंह के खुले विरोध और जन सुराज के प्रत्याशी को समर्थन देने से चुनावी मुकाबले में अतिरिक्त राजनीतिक पेच जुड़ गया है।
अब देखना होगा कि प्रचार के अंतिम दौर में ललन सिंह नीरज कुमार के समर्थन में मैदान में उतरते हैं या नहीं। फिलहाल नीरज की सफाई ने सवालों को शांत करने के बजाय नई चर्चा जरूर शुरू कर दी है। चुनाव में असली परीक्षा केवल वोट हासिल करने की नहीं, बल्कि पार्टी के संगठन और नेताओं के बीच तालमेल दिखाने की भी होगी।




