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104 फीट ऊंचा केसरिया स्तूप आज भी रहस्य, 28 साल बाद भी नहीं खुला राज; जमीन के नीचे छिपा है हजारों साल पुराना इतिहास

Kesariya Buddhist Stupa: बिहार का केसरिया बौद्ध स्तूप अपनी भव्यता और प्राचीन इतिहास के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। 104 फीट ऊंचे इस ऐतिहासिक स्तूप का उत्खनन दशकों से जारी है, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा और कई रहस्य आज भी जमीन के नीचे छिपे हुए...

104 फीट ऊंचा केसरिया स्तूप आज भी रहस्य, 28 साल बाद भी नहीं खुला राज; जमीन के नीचे छिपा है हजारों साल पुराना इतिहास
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Ramakant kumar
6 मिनट

Kesariya Buddhist Stupa History: पूर्वी चंपारण का केसरिया बौद्ध स्तूप आज बिहार ही नहीं, बल्कि दुनिया के प्रमुख बौद्ध स्थलों में अपनी पहचान बना चुका है. 104 फीट ऊंचे इस ऐतिहासिक स्तूप को देखने के लिए देश-विदेश से हर साल बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं. पर्यटन विभाग की ओर से यहां सुविधाओं का विस्तार भी किया जा रहा है, लेकिन स्तूप से जुड़ा इतिहास अब भी पूरी तरह सामने नहीं आया है. वर्ष 1998 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआइ ने यहां उत्खनन और संरक्षण का काम शुरू किया था, लेकिन करीब 28 साल बाद भी स्तूप के लगभग 60 प्रतिशत हिस्से का ही उत्खनन हो सका है.


स्तूप के आसपास के क्षेत्र में अब भी कई ऐसे हिस्से हैं, जो जमीन के नीचे दबे हुए हैं. यही वजह है कि केसरिया स्तूप से जुड़े इतिहास और इसकी वास्तविक संरचना को लेकर पुरातत्वविदों के सामने कई सवाल अब भी कायम हैं. संरक्षण का काम भी उत्खनन की तुलना में काफी कम हिस्से में हो सका है.


पर्यटकों के लिए बढ़ाई जा रही सुविधाएं

केसरिया स्तूप की बढ़ती पहचान को देखते हुए बिहार सरकार का पर्यटन विभाग यहां पर्यटकों की सुविधाओं का विस्तार कर रहा है. करीब पांच एकड़ क्षेत्र में आवासीय सुविधा के साथ कैफेटेरिया तैयार किया गया है. इसके अलावा लगभग 20 करोड़ रुपये की लागत से पर्यटक सुविधा केंद्र का निर्माण कराया जा रहा है.


खास बात यह है कि पर्यटक सुविधा केंद्र को केसरिया स्तूप की प्रतिकृति के रूप में तैयार किया जा रहा है. इसके आसपास बिहार के प्रमुख बौद्ध स्थलों की प्रतिकृतियां भी प्रदर्शित की जा रही हैं. स्तूप के आसपास मौजूद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों की पहचान कर उनके उत्खनन और विकास की भी योजना पर काम किया जा रहा है.


उत्खनन से सामने आया बौद्ध स्तूप

उत्खनन शुरू होने से पहले स्थानीय लोग इस स्थान को ‘देउर’ के नाम से जानते थे. स्थानीय मान्यताओं में इसका संबंध पौराणिक काल के राजा वेणु से बताया जाता था. लेकिन पुरातात्विक उत्खनन के बाद यहां मौजूद विशाल संरचना की पहचान बौद्ध स्तूप के रूप में हुई.


104 फीट की वर्तमान ऊंचाई वाला केसरिया स्तूप अपनी विशाल संरचना के कारण खास महत्व रखता है. माना जाता है कि वर्ष 1934 में आए विनाशकारी भूकंप से पहले इसकी ऊंचाई करीब 150 फीट तक रही होगी. भूकंप के दौरान स्तूप को भारी नुकसान पहुंचा था. इसके बाद इसका बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त होकर जमीन के नीचे दब गया.


ब्रिटिश काल में भी हुई थी उत्खनन की कोशिश

केसरिया स्तूप की ऐतिहासिक संरचना को समझने की कोशिश नई नहीं है. ब्रिटिश शासन के दौरान भी यहां उत्खनन के प्रयास किए गए थे. वर्ष 1814 में मैकेंजी और वर्ष 1861 में एलेक्जेंडर कनिंघम के प्रयासों से जुड़े प्रमाण उपलब्ध हैं. हालांकि उस समय विभिन्न कारणों से उत्खनन का काम आगे नहीं बढ़ सका.


इस ऐतिहासिक स्थल का उल्लेख चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांत में भी मिलता है. वर्तमान में स्तूप की संरचना में छह तल और एक गुंबद दिखाई देता है. उत्खनन के दौरान यहां बने कोष्ठकों से भगवान बुद्ध की क्षतिग्रस्त प्रतिमाएं भी मिली हैं.


भगवान बुद्ध से जुड़ी हैं कई मान्यताएं

केसरिया स्तूप को भगवान बुद्ध के जीवन से भी जोड़कर देखा जाता है. बौद्ध परंपराओं से जुड़े जानकारों के अनुसार गृह त्याग के बाद राजकुमार सिद्धार्थ ने इसी क्षेत्र में राजसी वस्त्रों का त्याग किया था और संन्यासी का वस्त्र धारण कर आगे की यात्रा शुरू की थी.


बौद्ध ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि महापरिनिर्वाण के लिए कुशीनगर की ओर जाते समय भगवान बुद्ध ने इस क्षेत्र में एक रात बिताई थी. उनके साथ उनके कई शिष्य भी थे. मान्यता के अनुसार भगवान बुद्ध ने अपने शिष्य आनंद को अपना भिक्षा पात्र स्मृति चिन्ह के रूप में दिया और शिष्यों को वैशाली लौट जाने के लिए कहा. इसके बाद वे कुशीनगर की ओर आगे बढ़ गए.


भगवान बुद्ध से जुड़ी इन स्मृतियों को ध्यान में रखते हुए तत्कालीन शासकों ने यहां स्तूप का निर्माण कराया. इसके निर्माण और विकास में शुंग, कुषाण तथा गुप्त काल से जुड़े प्रमाण भी मिलने की बात सामने आई है.


जमीन के नीचे अब भी छिपा है इतिहास

केसरिया स्तूप का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा ही अब तक सामने आ पाया है. स्तूप और उसके आसपास का बड़ा क्षेत्र अभी भी पुरातात्विक जांच और उत्खनन की प्रतीक्षा में है. यही जमीन के नीचे छिपा हिस्सा इस ऐतिहासिक स्थल के कई अनसुलझे सवालों का जवाब दे सकता है.


पूर्वी चंपारण में स्थित यह विशाल बौद्ध स्तूप आज पर्यटन और इतिहास दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है. एक ओर यहां पर्यटकों के लिए सुविधाएं बढ़ाई जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर करीब तीन दशक से चल रहे उत्खनन के बावजूद इस स्थल का पूरा इतिहास अब तक सामने नहीं आ सका है.