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बिहार में पहली बार IVF तकनीक से साहीवाल बछिया का जन्म, पूसा कृषि विश्वविद्यालय की ऐतिहासिक उपलब्धि

Bihar News: पूसा कृषि विश्वविद्यालय ने आईवीएफ तकनीक से साहीवाल बछिया का जन्म कर पूर्वी भारत में इतिहास रच दिया है. देसी नस्लों से दुग्ध उत्पादन बढ़ाने की दिशा में इसे बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है.

Bihar News
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Mukesh Srivastava
3 मिनट

Bihar News: डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा ने पूर्वी भारत में पहली बार आईवीएफ तकनीक के जरिए साहीवाल नस्ल की बछिया पैदा कर एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। यह उपलब्धि भारत की दुग्ध उत्पादन रणनीति में बड़ा बदलाव मानी जा रही है, जिसमें अब जलवायु के अनुकूल स्वदेशी नस्लों को बढ़ावा दिया जा रहा है।


विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इस तकनीक से कुल चार बछड़ों का जन्म कराया है। इनमें से तीन बछड़े पिपराकोठी स्थित देशी नस्ल संवर्धन उत्कृष्टता केंद्र में और एक बछड़ा मोतिहारी के चकिया गौशाला में जन्मा है। इस तकनीक से देसी नस्लों के विकास में तेजी आने की उम्मीद है।


कुलपति डॉ. पी. एस. पांडेय ने बताया कि लंबे समय से किसान दूध उत्पादन के लिए विदेशी नस्लों पर निर्भर रहे हैं, लेकिन अब उनमें कई तरह की समस्याएं सामने आ रही हैं। होलस्टीन फ्रीजियन (HF) और जर्सी जैसी नस्लें भारतीय जलवायु में अधिक बीमार पड़ती हैं और उनके प्रजनन में भी कठिनाई होती है। इसके विपरीत, देशी नस्लें जलवायु के अनुकूल होने के साथ-साथ बेहतर उत्पादन क्षमता भी रखती हैं।


उन्होंने कहा कि OPU-IVF तकनीक के माध्यम से किसानों को “क्लाइमेट-स्मार्ट” गाय उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। इससे न केवल दूध उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि पशु कम बीमार होंगे और गर्मी को भी बेहतर तरीके से सहन कर सकेंगे। देसी नस्लों का दूध A2 श्रेणी का होता है, जो पोषण और औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है।


डेयरी वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार ने बताया कि A2 दूध पाचन में आसान होता है और इसमें प्रोलाइन अमीनो एसिड होता है, जो हानिकारक BCM-7 पेप्टाइड के निर्माण को रोकता है। साथ ही इसमें कैल्शियम, विटामिन D और ओमेगा-3 फैटी एसिड भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हैं।


वहीं, डॉ. कृष्ण मोहन कुमार ने बताया कि आईवीएफ तकनीक किसानों के लिए आर्थिक रूप से भी फायदेमंद है। इससे एक ही पीढ़ी में उच्च गुणवत्ता वाली साहीवाल नस्ल तैयार की जा सकती है, जिसमें शुद्ध आनुवंशिक गुण मौजूद होते हैं, भले ही उसकी माता विदेशी नस्ल की हो।


इस परियोजना को सफल बनाने में डॉ. प्रमोद कुमार, डॉ. कृष्ण मोहन कुमार और डॉ. आर. के. अस्थाना की टीम का अहम योगदान रहा है। विश्वविद्यालय अब इस तकनीक को किसानों तक पहुंचाने की दिशा में काम कर रहा है, जिससे बिहार के दुग्ध उद्योग में नई क्रांति आने की उम्मीद है।

रिपोर्ट- सोहराब आलम, मोतिहारी

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