पटना: बिहार में उच्च शिक्षा का सपना देखने वाले लाखों छात्रों के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। राज्य सरकार ने बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना में बदलाव करते हुए शिक्षा ऋण की अधिकतम सीमा 4 लाख रुपये से घटाकर 2 लाख रुपये कर दी है। सरकार इसे नई व्यवस्था और केंद्र की योजनाओं से बेहतर समन्वय के तौर पर पेश कर सकती है, लेकिन छात्रों के सामने बड़ा सवाल यह है कि जब उच्च शिक्षा का खर्च लगातार बढ़ रहा है, तब शिक्षा ऋण की सीमा आधी करना आखिर किस समस्या का समाधान है?
बिहार जैसे राज्य में बड़ी संख्या में छात्र आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यमवर्गीय परिवारों से आते हैं। उनके लिए कॉलेज की फीस ही एकमात्र खर्च नहीं होती। हॉस्टल, किताबें, लैपटॉप, कोचिंग, परीक्षा शुल्क, यात्रा और अन्य शैक्षणिक खर्च भी पढ़ाई को महंगा बनाते हैं। ऐसे में पहले जहां छात्र 4 लाख रुपये तक के स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड पर भरोसा कर सकते थे, अब उन्हें केवल 2 लाख रुपये तक की सहायता मिलेगी। यहीं से छात्रों की चिंता शुरू होती है।
पढ़ाई महंगी, लेकिन लोन की सीमा आधी
सरकार ने योजना को वित्तीय वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक अगले पांच वर्षों के लिए जारी रखने का फैसला किया है। यह निश्चित रूप से अच्छी बात है कि योजना बंद नहीं की गई, लेकिन असली सवाल राशि को लेकर है। उच्च शिक्षा के बढ़ते खर्च के दौर में लोन की अधिकतम सीमा बढ़ाने के बजाय 4 लाख से घटाकर 2 लाख रुपये कर देना छात्रों के लिए राहत से ज्यादा चिंता पैदा करता है।आखिर जिस छात्र को तीन, चार या उससे अधिक लाख रुपये की जरूरत होगी, वह क्या करेगा?
सरकार का जवाब है कि अतिरिक्त राशि के लिए छात्र केंद्र सरकार के पीएम-विद्यालक्ष्मी पोर्टल के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं। लेकिन छात्रों का सवाल भी उतना ही सीधा है—अगर आखिरकार अलग पोर्टल, अलग प्रक्रिया और अलग संस्थान की पात्रता देखनी है, तो बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना की वह सरलता कहां गई, जिसके लिए इसे शुरू किया गया था?
अब छात्र पढ़ाई से ज्यादा पोर्टल और पात्रता समझेगा?
नई व्यवस्था के तहत 2 लाख रुपये से अधिक का शिक्षा ऋण लेने के लिए छात्र को पीएम-विद्यालक्ष्मी पोर्टल का सहारा लेना होगा। इसके लिए संबंधित शिक्षण संस्थान का उस पोर्टल पर पंजीकृत या एनरोल होना भी जरूरी होगा। यानी अब छात्र को एडमिशन लेने से पहले सिर्फ यह नहीं देखना होगा कि कॉलेज अच्छा है या नहीं, बल्कि यह भी जांचना होगा कि कॉलेज किस पोर्टल पर उपलब्ध है और वहां से लोन मिल पाएगा या नहीं।
सवाल यह है कि क्या किसी छात्र की उच्च शिक्षा का भविष्य उसके संस्थान की पोर्टल पर मौजूदगी से तय होना चाहिए? अगर किसी प्रतिभाशाली छात्र को ऐसे संस्थान में प्रवेश मिल जाता है, जो संबंधित पोर्टल की पात्रता में नहीं आता, तो क्या वह सिर्फ आर्थिक कारणों से अपनी सीट छोड़ देगा? सरकार को इस सवाल का स्पष्ट जवाब देना होगा।
DRCC मदद करेगा, लेकिन क्या समस्या सच में खत्म होगी?
सरकार ने कहा है कि जिला निबंधन एवं परामर्श केंद्र यानी DRCC पर पीएम-विद्यालक्ष्मी पोर्टल के लिए मुफ्त आवेदन की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। यह सुविधा निश्चित तौर पर छात्रों के लिए मददगार हो सकती है। लेकिन असली परेशानी केवल फॉर्म भरने की नहीं है। छात्रों को सबसे अधिक चिंता इस बात की है कि क्या अतिरिक्त लोन आसानी से मंजूर होगा? कितना समय लगेगा? सभी संस्थान पात्र होंगे या नहीं? क्या बैंक से अलग दस्तावेज मांगे जाएंगे? अगर आवेदन किसी कारण से अस्वीकार हो गया तो छात्र की पढ़ाई का क्या होगा? यानी सरकार ने आवेदन की सुविधा तो देने की बात कही है, लेकिन छात्रों के सामने अब भी कई सवाल खड़े हैं।
पहले से मंजूर छात्रों को राहत, नए छात्रों की बढ़ी चिंता
नई व्यवस्था में एक राहत यह है कि पहले से स्वीकृत स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड ऋण पर नए नियम का असर नहीं पड़ेगा। जिन छात्रों का लोन पहले ही मंजूर हो चुका है, उनकी स्वीकृत राशि सुरक्षित रहेगी। लेकिन नए छात्रों के लिए स्थिति अलग है।अब जो छात्र कॉलेज में प्रवेश लेने जा रहे हैं, उन्हें पहले ही अपने पूरे कोर्स का खर्च जोड़ना होगा। अगर खर्च 2 लाख रुपये से ज्यादा है, तो उन्हें राज्य की योजना के साथ केंद्र के पोर्टल और अन्य शिक्षा ऋण विकल्पों की जानकारी भी रखनी होगी।गरीब परिवार का छात्र पढ़ाई की तैयारी करे या लोन की व्यवस्था?
GER बढ़ाने का लक्ष्य, लेकिन आर्थिक सहायता में कमी क्यों?
सरकार ने चालू वित्तीय वर्ष के लिए योजना पर 950 करोड़ रुपये के खर्च को मंजूरी दी है। साथ ही उच्च शिक्षा के सकल नामांकन अनुपात यानी GER को 28.4 प्रतिशत से बढ़ाकर 30 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया है।लेकिन यहां सरकार के सामने एक बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है।
अगर लक्ष्य ज्यादा से ज्यादा युवाओं को उच्च शिक्षा से जोड़ने का है, तो आर्थिक सहायता की सीमा कम करना उस लक्ष्य के विपरीत नहीं है? बिहार में बड़ी संख्या में छात्र ऐसे परिवारों से आते हैं, जहां 2 लाख रुपये से अधिक की अतिरिक्त व्यवस्था करना आसान नहीं है।अगर लोन की राशि कम होगी और बाकी पैसे के लिए दूसरी प्रक्रिया अपनानी पड़ेगी, तो क्या कुछ छात्र पढ़ाई बीच में छोड़ने या कम खर्च वाले विकल्प चुनने को मजबूर नहीं होंगे?
सरकार के फैसले पर सबसे बड़ा सवाल
बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना की शुरुआत 2 अक्टूबर 2016 को सात निश्चय कार्यक्रम के तहत इस उद्देश्य से की गई थी कि आर्थिक तंगी किसी छात्र की उच्च शिक्षा के रास्ते में बाधा न बने।आज सवाल यह है कि क्या 4 लाख से 2 लाख रुपये करने के बाद यह योजना उसी उद्देश्य को उतनी ही मजबूती से पूरा कर पाएगी? सरकार का तर्क हो सकता है कि केंद्र की पीएम-विद्यालक्ष्मी योजना के साथ समन्वय कर छात्रों को अतिरिक्त विकल्प दिए जा रहे हैं। लेकिन छात्र विकल्प नहीं, एक आसान और भरोसेमंद व्यवस्था चाहते हैं।
छात्रों की सबसे बड़ी मांग साफ है—अगर पढ़ाई का खर्च बढ़ रहा है, तो सहायता कम करने के बजाय उसे आसान, तेज और पर्याप्त बनाया जाए। वरना कहीं ऐसा न हो कि स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना में बदलाव के बाद बिहार का छात्र डिग्री से पहले लोन की शर्तों और पोर्टल की पात्रता समझने में ही उलझ जाए।





