पटना : बिहार की अदालतों में जमानत के लिए महीनों इंतजार करने वाले आरोपियों और उनके परिवारों के लिए बड़ी खबर है। अब आपराधिक मामलों में दाखिल जमानत याचिका और अग्रिम जमानत अर्जी को अनिश्चित समय तक लंबित नहीं रखा जा सकेगा। पटना हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद बिहार की सभी जिला अदालतों के लिए जमानत अर्जियों के त्वरित निष्पादन को लेकर 11 बिंदुओं वाली एसओपी (Standard Operating Procedure) जारी की है।
नई व्यवस्था के तहत सामान्य तौर पर जमानत या अग्रिम जमानत की अर्जी दाखिल होने के दो महीने के भीतर उसका निष्पादन करना होगा। यानी अदालत को इस अवधि के अंदर जमानत देने या खारिज करने पर फैसला करना होगा। यदि किसी विशेष परिस्थिति में दो महीने के भीतर फैसला नहीं हो पाता है तो संबंधित न्यायाधीश को देरी का उचित कारण बताना होगा।
जमानत किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से सीधे जुड़ा विषय है। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह की अर्जियों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाने की जरूरत बताई थी। अब इसी निर्देश को बिहार में प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए पटना हाईकोर्ट ने जिला अदालतों को विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। यह कदम खास तौर पर उन मामलों में अहम माना जा रहा है, जहां आरोपी की गिरफ्तारी के बाद जमानत की अर्जी अदालत में दाखिल होती है, लेकिन सुनवाई और आदेश की प्रक्रिया में लंबा समय लग जाता है। इससे आरोपी के साथ-साथ उसके परिवार और अधिवक्ताओं को भी लगातार अदालत का चक्कर लगाना पड़ता है।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2025 में अन्ना वामन भालेराव बनाम महाराष्ट्र सरकार मामले की सुनवाई के दौरान जमानत से जुड़े मामलों को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया था कि जमानत और अग्रिम जमानत की याचिकाएं व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ी होती हैं। इसलिए इनके निपटारे में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए।सुप्रीम कोर्ट के इसी निर्देश के बाद अब पटना हाईकोर्ट ने बिहार के सभी सिविल कोर्ट के लिए एसओपी जारी की है। इसका उद्देश्य जमानत अर्जियों की सुनवाई को ज्यादा व्यवस्थित, समयबद्ध और प्रभावी बनाना है। पटना हाईकोर्ट की एसओपी केवल अदालतों तक सीमित नहीं है।
इसमें जमानत प्रक्रिया से जुड़े कई विभागों और अधिकारियों के लिए भी दिशा-निर्देश दिए गए हैं। इसमें प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, लोक अभियोजक, अपर लोक अभियोजक, जिला अभियोजन पदाधिकारी, पुलिस अधीक्षक (SP), जिलाधिकारी (DM) और स्वास्थ्य विभाग से जुड़े अधिकारियों को भी जिम्मेदारियां दी गई हैं। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि जमानत की अर्जी दाखिल होने के बाद उससे संबंधित रिपोर्ट, केस रिकॉर्ड, अभियोजन पक्ष की जानकारी और अन्य जरूरी दस्तावेज समय पर अदालत तक पहुंचें। किसी स्तर पर अनावश्यक देरी होने से जमानत की सुनवाई प्रभावित न हो, इसके लिए संबंधित अधिकारियों की भूमिका भी तय की गई है।
जब किसी व्यक्ति को गैर-जमानती धाराओं में गिरफ्तार किया जाता है तो वह कानून के अनुसार जमानत के लिए अदालत का रुख कर सकता है। मामले की प्रकृति और कानूनी प्रावधानों के अनुसार जमानत की अर्जी मजिस्ट्रेट, सेशन कोर्ट या हाईकोर्ट में दाखिल की जा सकती है।वहीं, अगर किसी व्यक्ति को आशंका है कि उसे किसी आपराधिक मामले में गिरफ्तार किया जा सकता है तो वह कानून के तहत अग्रिम जमानत के लिए अदालत से राहत मांग सकता है। अब इन अर्जियों के निपटारे को लेकर समयसीमा तय होने से प्रक्रिया में तेजी आने की उम्मीद है। नई व्यवस्था की सबसे अहम बात यह है कि अगर किसी जमानत या अग्रिम जमानत की अर्जी पर दो महीने के भीतर फैसला नहीं हो पाता है तो देरी को लेकर उचित कारण दर्ज करना होगा। यानी बेल की अर्जी लंबे समय तक लंबित रहने की स्थिति को सामान्य प्रक्रिया नहीं माना जाएगा।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर आरोपी को दो महीने के अंदर जमानत मिल जाएगी। समयसीमा का उद्देश्य जमानत की अर्जी पर फैसला कराना है, जमानत देना नहीं। अदालत मामले के तथ्य, आरोपों की गंभीरता, जांच की स्थिति और कानून के अनुसार जमानत मंजूर या खारिज करने का फैसला करेगी।अक्सर जमानत की सुनवाई टलने या आदेश में देरी होने के कारण आरोपी के परिवार को बार-बार अदालत का चक्कर लगाना पड़ता है। वकीलों को भी अगली तारीख का इंतजार करना पड़ता है। खासकर जेल में बंद आरोपियों के मामलों में हर तारीख का अलग महत्व होता है।
पटना हाईकोर्ट की यह पहल ऐसे मामलों में प्रक्रिया को ज्यादा समयबद्ध बनाने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है। अब जिला अदालतों को जमानत और अग्रिम जमानत की अर्जियों पर प्राथमिकता के साथ कार्रवाई करनी होगी।कुल मिलाकर बिहार की अदालतों में बेल की प्रक्रिया को लेकर बड़ा बदलाव सामने आया है। अब जमानत की अर्जी दाखिल होने के बाद अनिश्चित इंतजार की स्थिति को खत्म करने की कोशिश की गई है। दो महीने की समयसीमा और देरी होने पर कारण बताने की व्यवस्था से जमानत मामलों की सुनवाई में तेजी आने की उम्मीद है।





