Bihar Police News: अररिया में पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सवाल यह है कि जब किसी इलाके में स्मैक, गांजा, कोडीन और दूसरे नशीले पदार्थों का कारोबार बढ़ रहा हो, लगातार शिकायतें मिल रही हों और पुलिस को इसकी जानकारी भी हो, तो फिर कार्रवाई आखिर क्यों नहीं हुई? क्या तस्कर पुलिस की नजर से बच रहे थे या फिर उन पर किसी की ‘नजर-ए-करम’ थी?
इन्हीं सवालों के बीच पूर्णिया प्रक्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक विवेकानंद ने जोगबनी थानेदार सह पुलिस इंस्पेक्टर महादेव कामत को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। उन पर मादक पदार्थों के तस्करों को संरक्षण देने, प्रभावी कार्रवाई नहीं करने, वरीय अधिकारियों से गलत जानकारी देने और मालखाना का प्रभार नहीं लेने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
यह कार्रवाई अररिया के पुलिस अधीक्षक जितेंद्र कुमार की अनुशंसा के बाद की गई। यानी मामला इतना गंभीर था कि थानेदार की कुर्सी बचाने के बजाय सीधे निलंबन की कार्रवाई करनी पड़ी। अब सवाल यह है कि जिस थानेदार पर इलाके में नशीले पदार्थों के कारोबार पर लगाम लगाने की जिम्मेदारी थी, वही अगर कार्रवाई के घेरे में आ जाए तो आम लोगों का भरोसा पुलिस पर कैसे कायम रहेगा?
स्मैक का कारोबार बढ़ता रहा, पुलिस क्या करती रही?
पुलिस के मुताबिक जोगबनी इलाके में स्मैक समेत अन्य मादक पदार्थों के कारोबार को लेकर लगातार शिकायतें मिल रही थीं। इसके बावजूद कथित तौर पर तस्करों के ठिकानों पर प्रभावी छापेमारी नहीं की गई। एसपी जितेंद्र कुमार ने बताया कि महादेव कामत से इस संबंध में स्पष्टीकरण भी मांगा गया था। लेकिन उनका जवाब संतोषजनक नहीं पाया गया। इसके बाद घोर लापरवाही, अनुशासनहीनता और पुलिस की छवि धूमिल करने जैसे आरोपों में कार्रवाई की गई।अब सवाल सीधा है—जब शिकायतें लगातार आ रही थीं तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? अगर तस्करों के ठिकाने पुलिस को पता थे तो छापेमारी किसके इंतजार में रुकी रही?
पुराने थानेदार को बचाने का भी आरोप
महादेव कामत पर एक मुकदमे की केस डायरी से जुड़ा गंभीर आरोप भी लगाया गया है। पुलिस के अनुसार जोगबनी थाने के एक मामले में गिरफ्तार आरोपी घनश्याम यादव के स्वीकारोक्ति बयान का विस्तृत उल्लेख केस डायरी में नहीं किया गया।आरोप है कि ऐसा पूर्व थानेदार सह इंस्पेक्टर राजीव कुमार आजाद को बचाने की नीयत से किया गया। हालांकि इन आरोपों की अंतिम पुष्टि विभागीय जांच के बाद ही होगी। महादेव कामत के खिलाफ विभागीय जांच शुरू कर दी गई है। यानी अब केवल निलंबन ही नहीं, बल्कि विभागीय स्तर पर भी आरोपों की जांच होगी।
दो थानेदारों की तकनीकी ‘परीक्षा’ में फेल!
इधर अररिया पुलिस ने दो अन्य थानेदारों पर भी कार्रवाई की है। बरदाहा थानेदार पुलिस अवर निरीक्षक मिथिलेश कुमार सिंह और मदनपुर थानेदार पुलिस अवर निरीक्षक मो. शमसुद्दीन अंसारी को पद से हटाकर पुलिस लाइन भेज दिया गया है।इन दोनों पर तकनीकी जानकारी की कमी और असंतोषजनक कार्यप्रणाली का आरोप है। एसपी की रिपोर्ट के अनुसार दोनों अधिकारी क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम्स (CCTNS) और आधुनिक तकनीकी प्रणाली के संचालन में दक्ष नहीं पाए गए।पुलिस का तर्क है कि तकनीकी दक्षता की कमी का असर अपराध नियंत्रण और केस अनुसंधान पर पड़ रहा था। तो सवाल फिर वही—आज जब अपराधी तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं, क्या थानेदारों को तकनीकी रूप से अपडेट रखना पुलिस विभाग की जिम्मेदारी नहीं है? और अगर कोई अधिकारी तकनीकी रूप से कमजोर है तो उसे थानेदारी देने से पहले उसकी क्षमता की जांच क्यों नहीं हुई?
अब ‘टेक्निकल’ थानेदार ही संभालेंगे थाना?
आईजी ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि थानेदार की जिम्मेदारी ऐसे अधिकारियों को दी जाए, जो तकनीकी रूप से दक्ष होने के साथ-साथ अपराध नियंत्रण के प्रति संवेदनशील भी हों।दिलचस्प बात यह है कि दो दिन पहले ही अनुशासनहीनता और सर्विस कोड के गंभीर उल्लंघन के आरोप में कुआड़ी थानेदार राजू कुमार को एसपी जितेंद्र कुमार ने निलंबित किया था।
लगातार हो रही इन कार्रवाइयों ने अररिया पुलिस की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल सिर्फ तीन थानेदारों पर कार्रवाई का नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि क्या थानेदारों की नियुक्ति और उनकी निगरानी की व्यवस्था पहले से इतनी कमजोर थी कि शिकायतों और कार्रवाई के बाद ही कमियां सामने आ रही हैं?
फिलहाल जोगबनी थानेदार महादेव कामत का निलंबन और बरदाहा व मदनपुर थानेदारों को लाइन हाजिर किए जाने के बाद पुलिस महकमे में यह संदेश साफ है कि थानेदारी सिर्फ कुर्सी नहीं, बल्कि जवाबदेही भी है। अब देखना होगा कि विभागीय जांच में आरोप कितने सही साबित होते हैं और अररिया में नशे के कारोबार पर पुलिस की कार्रवाई वास्तव में कितनी तेज होती है।





