Anant Singh : बिहार की राजनीति में ‘छोटे सरकार’ यानी मोकामा के विधायक अनंत सिंह और जेडीयू नेता नीरज कुमार के बीच जुबानी जंग कोई नई बात नहीं है। दोनों के बीच राजनीतिक और व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला लंबे समय से चलता आ रहा है। लेकिन अब यह विवाद एक बार फिर उस पुराने मामले तक पहुंच गया है, जिसने साल 2019 में बिहार की राजनीति में भूचाल ला दिया था।
अनंत सिंह ने हालिया विवाद के बीच नीरज कुमार के नार्को टेस्ट की मांग तक कर दी है। इसके बाद नीरज कुमार का कहना है कि अनंत सिंह को अपने दावों पर भरोसा है तो उन्हें सबूत लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहिए। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वह कौन सा मामला है, जिसकी परछाईं करीब आठ साल बाद भी दोनों नेताओं के बीच दिखाई देती है? आइए पूरी कहानी सिलसिलेवार समझते हैं।
16 अगस्त 2019 की वह रात, जब नदावां में पड़ा था पुलिस का छापा
इस कहानी की शुरुआत होती है 16 अगस्त 2019 से। तारीख थी 16 अगस्त, समय करीब सुबह 3:15 बजे और जगह थी बाढ़ थाना क्षेत्र का नदावां गांव। बाढ़ थाने के तत्कालीन SHO संजीत कुमार को सूचना मिली कि मोकामा विधायक अनंत सिंह के पैतृक घर में अवैध हथियार और विस्फोटक छिपाकर रखे गए हैं। पुलिस को यह भी जानकारी मिली कि हथियारों को कहीं ले जाने की तैयारी है। सूचना के बाद पुलिस टीम तैयार की गई और करीब सुबह 4:30 बजे अनंत सिंह के पैतृक घर पर छापेमारी की गई।
पुलिस के अनुसार घर में लगा था ताला
पुलिस के मुताबिक जब टीम नदावां स्थित घर पहुंची तो वहां ताला लगा हुआ था। पूछताछ के बाद पुलिस को पता चला कि घर की देखरेख सुनील राम करता है और उसके पास घर की चाबी है। पुलिस ने सुनील राम को हिरासत में लिया और कथित तौर पर उसी के जरिए घर खुलवाया गया। इसके बाद पुलिस ने घर के एक कमरे में तलाशी ली।
अलमारी के पीछे मिला AK-47 और ग्रेनेड
FIR में दर्ज पुलिस के दावे के मुताबिक कमरे में एक लोहे की अलमारी थी। इसी अलमारी के पीछे पीले रंग का प्लास्टिक बैग रखा मिला। पुलिस के अनुसार इस बैग के अंदर से—AK-47 राइफल, AK-47 का मैगजीन, 26 जिंदा कारतूस, 7.62 एमएम के दो हैंड ग्रेनेड बरामद किए गए। FSL जांच में AK-47 को काम करने की स्थिति में बताया गया और बरामद कारतूसों को भी जिंदा पाया गया। इस मामले में खास बात यह भी थी कि FIR में दर्ज किया गया कि छापेमारी के समय अनंत सिंह न्यायिक हिरासत में थे।
FIR में UAPA की धारा भी लगी थी
मामला केवल आर्म्स एक्ट तक सीमित नहीं रहा। पुलिस ने इस केस में आर्म्स एक्ट और Explosive Substances Act की धाराओं के अलावा UAPA की धारा 13 भी लगाई थी। जांच की जिम्मेदारी ASP स्तर की अधिकारी लिपि सिंह को दी गई थी। लिपि सिंह वरिष्ठ नेता आरसीपी सिंह की बेटी हैं । हालांकि बाद में दाखिल चार्जशीट में FIR में लगाई गई UAPA की धारा का उल्लेख नहीं किया गया। यहीं से यह मामला राजनीतिक तौर पर भी बेहद संवेदनशील बन गया।
3 साल बाद ट्रायल कोर्ट ने सुनाई सजा
मामले की सुनवाई आगे बढ़ी और करीब तीन साल बाद ट्रायल कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। 14 जून 2022 को ट्रायल कोर्ट ने अनंत सिंह और सह-आरोपी सुनील राम को दोषी ठहराया। इसके बाद 21 जून 2022 को दोनों को सजा सुनाई गई। आर्म्स एक्ट और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम से जुड़ी धाराओं में दोनों को 10-10 साल की सजा दी गई। लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ।
हाईकोर्ट पहुंचा मामला, 2024 में बदल गई पूरी तस्वीर
ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ अनंत सिंह ने पटना हाईकोर्ट का रुख किया। 14 अगस्त 2024 को पटना हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए अनंत सिंह और सुनील राम दोनों को बरी कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा। कोर्ट ने जांच और अभियोजन की प्रक्रिया में कई महत्वपूर्ण कमियों की ओर भी इशारा किया।
हाईकोर्ट ने किन कमियों को माना अहम?
1. घर की चाबी और ताला जब्त नहीं किया गया
पुलिस का दावा था कि घर बंद था और सुनील राम के पास चाबी थी। उसी चाबी से घर खोला गया। लेकिन हाईकोर्ट ने गौर किया कि पुलिस ने न तो चाबी जब्त की और न ही ताला। कोर्ट ने इस कमी को महत्वपूर्ण माना। सवाल यह था कि यदि घर वास्तव में बंद था और चाबी बरामद हुई थी, तो उसकी जब्ती जांच का अहम हिस्सा क्यों नहीं बनी?
2. स्वतंत्र गवाहों को लेकर सवाल
पुलिस के अनुसार गांव के लोगों से स्वतंत्र गवाह बनने के लिए कहा गया, लेकिन वे तैयार नहीं हुए। इसके बाद रिजर्व पुलिस बल के दो कांस्टेबलों को गवाह बनाया गया। हाईकोर्ट ने माना कि ये दोनों बिहार पुलिस के रिजर्व फोर्स के कर्मचारी थे। इसलिए उन्हें स्वतंत्र गवाह नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि जांच के दौरान उनकी गवाही दर्ज नहीं की गई थी और वे ट्रायल के दौरान पहली बार गवाह के रूप में सामने आए।
3. क्या अनंत सिंह को हथियारों की जानकारी थी?
मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही था। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी ऐसे घर से हथियार बरामद होना, जिसे अनंत सिंह का पैतृक घर बताया गया, अपने आप में यह साबित नहीं करता कि अनंत सिंह को हथियारों के वहां रखे होने की जानकारी थी। आर्म्स एक्ट की धारा 35 के संदर्भ में कोर्ट ने माना कि अभियोजन को यह स्थापित करना जरूरी था कि आरोपी को हथियारों की मौजूदगी की जानकारी थी। हाईकोर्ट को इस संबंध में पर्याप्त सबूत नहीं मिले।
फिर आठ साल बाद भी क्यों लौट आया 2019 का मामला?
यही वह सवाल है जो मौजूदा राजनीतिक विवाद को खास बनाता है। 2019 में बरामदगी, 2022 में सजा और 2024 में हाईकोर्ट से बरी होने के बाद भी इस मामले की राजनीतिक गूंज पूरी तरह खत्म नहीं हुई। अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच राजनीतिक बयानबाजी के दौरान पुराने आरोप फिर सामने आते रहे हैं। अब जब अनंत सिंह की ओर से नीरज कुमार के नार्को टेस्ट की मांग की गई है, तो 2019 का यह पूरा घटनाक्रम एक बार फिर चर्चा में आ गया है। अनंत सिंह का कहना है कि नीरज कुमार ने ही उनके घर पर यह हथियार रखवाए थे।
इधर, नीरज कुमार का तर्क है कि यदि आरोपों को लेकर किसी के पास ठोस सबूत हैं तो मामला अदालत में ले जाया जाना चाहिए। दूसरी ओर, इस पूरे विवाद में 2019 के केस का न्यायिक इतिहास भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि ट्रायल कोर्ट की सजा के बाद पटना हाईकोर्ट ने अभियोजन की कमियों को आधार बनाते हुए दोनों आरोपियों को बरी कर दिया था।
अदावत की जड़ सिर्फ एक केस नहीं
अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच टकराव को केवल नदावां के AK-47 केस से जोड़कर देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। दोनों नेताओं के बीच लंबे समय से राजनीतिक बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप होते रहे हैं। यही वजह है कि जब भी दोनों आमने-सामने आते हैं, पुराने विवाद फिर चर्चा में आ जाते हैं।2019 का नदावां केस, 2022 की सजा और 2024 का हाईकोर्ट फैसला इस राजनीतिक टकराव की सबसे चर्चित कड़ियों में से एक है।
अब नार्को टेस्ट की मांग ने इस पुरानी कहानी को फिर सुर्खियों में ला दिया है। लेकिन इस पूरे मामले में सबसे अहम तथ्य यह है कि नदावां हथियार बरामदगी केस में पटना हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की सजा को रद्द करते हुए अनंत सिंह और सुनील राम को बरी कर दिया था।





