बिहार विधान परिषद की तिरहुत स्नातक सीट पर चुनाव हारने के बाद जेडीयू उम्मीदवार अभिषेक झा ने अपनी चुप्पी तोड़ी है। चुनाव परिणाम आने के कई दिनों बाद उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए अपनी बात रखी और समर्थकों के प्रति आभार जताया। हालांकि, उनके इस संदेश में हार का दर्द भी साफ झलका। अभिषेक झा ने अपने ही राजनीतिक परिवार यानी एनडीए के भीतर अपने खिलाफ चक्रव्यूह रचे जाने की आशंका जताकर बिहार की सियासत में नई चर्चा छेड़ दी है। उन्होंने खुद की तुलना महाभारत के अभिमन्यु से करते हुए कहा कि क्या वह अपने ही राजनीतिक परिवार के भीतर रचे गए चक्रव्यूह में अकेले पड़ गए थे?
अभिषेक झा ने तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं, समर्थकों और शुभचिंतकों को संबोधित करते हुए कहा कि चुनाव के नतीजे भले ही उनके पक्ष में नहीं आए, लेकिन लोगों ने उन्हें जो स्नेह, विश्वास और अपनापन दिया, वह किसी ऐतिहासिक जीत से कम नहीं है। लेकिन, अभिषेक झा के बयान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह रहा कि उन्होंने अपने पोस्ट में एनडीए के भीतर राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि कभी-कभी उनके मन में यह सवाल उठता है कि क्या वह अपने ही राजनीतिक परिवार के भीतर रचे गए चक्रव्यूह में अभिमन्यु की तरह अकेले पड़ गए थे? हालांकि, उन्होंने किसी नेता या दल का नाम लेकर सीधा आरोप नहीं लगाया। उनका कहना है कि यह उनकी व्यक्तिगत पीड़ा और आत्ममंथन का विषय है। वह किसी के प्रति कटुता या द्वेष रखकर आगे नहीं बढ़ना चाहते। समय और सत्य खुद अपनी कहानी कहेंगे।
अभिषेक ने कहा किकरीब 4700 वोटों को लेकर किया गया दावा है। उन्होंने कहा कि लगभग 4700 मतपत्रों में उनके नाम के सामने टिक (✓) का निशान होने के कारण वोट निरस्त कर दिए गए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या यह सामान्य बात है कि जागरूक मतदाता उनके नाम के सामने इस तरह का निशान लगाएंगे? अभिषेक झा ने इस मामले को लोकतंत्र की पवित्रता से जोड़ते हुए कहा कि एक-एक वोट की अहमियत होती है। अगर इतने वोट निरस्त नहीं हुए होते तो चुनाव का परिणाम उनके पक्ष में आ सकता था। हालांकि, उनके इस दावे को लेकर उन्होंने कोई विस्तृत चुनावी दस्तावेज या आधिकारिक प्रमाण सार्वजनिक नहीं किया है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि चुनाव में भले ही एक प्रत्याशी की हार हुई है, लेकिन मतदाताओं के साथ उनका रिश्ता खत्म नहीं हुआ है। उनका कहना है कि वह पहले भी लोगों के बीच थे, आज भी हैं और आगे भी उनके साथ बने रहेंगे। उन्होंने अपने समर्थकों को भरोसा दिलाया कि उनका रिश्ता किसी पद, चुनाव या राजनीतिक गणित पर निर्भर नहीं है। अगर भविष्य में किसी साथी को राजनीतिक कारणों से प्रताड़ित करने की कोशिश की गई तो वह उसके साथ खड़े रहेंगे। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर एक आवाज देने भर से वह अपने साथियों की मुश्किलों में ढाल बनकर खड़े मिलेंगे।
इस दौरान अभिषेक झा ने चुनाव में जीत हासिल करने वाले बंशीधर ब्रजवासी को भी शुभकामनाएं दीं। उन्होंने उम्मीद जताई कि ब्रजवासी शिक्षकों की समस्याओं और तिरहुत के विकास को प्राथमिकता देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि स्नातकों और समाज के हित में उठाए जाने वाले उनके हर सकारात्मक कदम में उनका सहयोग रहेगा।
खास बात यह रही कि अभिषेक झा ने अपनी आलोचना करने वालों के प्रति भी नरम रुख दिखाया। उन्होंने कहा कि बंशीधर ब्रजवासी ने उनकी आलोचना की, अपशब्द कहे या श्राप दिया, वह सब सहर्ष स्वीकार करते हैं। ऐसा करने का गुण उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से सीखा है। चुनाव के दौरान उनका विरोध करने वाले लोगों को भी उन्होंने लोकतंत्र का हिस्सा बताते हुए धन्यवाद दिया। अभिषेक झा ने अपने समर्थकों और विरोधियों से चुनाव के दौरान किसी भी शब्द या व्यवहार से ठेस पहुंचने पर माफी भी मांगी। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विचारों का मतभेद हो सकता है, लेकिन मनभेद नहीं होना चाहिए।
कुल मिलाकर, अभिषेक झा का यह बयान केवल चुनावी हार के बाद समर्थकों को धन्यवाद देने तक सीमित नहीं है। करीब 4700 वोटों के निरस्त होने का दावा और एनडीए के भीतर चक्रव्यूह रचे जाने की आशंका जताकर उन्होंने अपनी हार के पीछे की परिस्थितियों पर सवाल खड़े किए हैं। अब देखना होगा कि उनके इस बयान पर एनडीए के नेताओं और जेडीयू की ओर से क्या प्रतिक्रिया सामने आती है।





