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Bihar Election 2025: कौन नेता बना सकता है सबसे अधिक बार विधानसभा चुनाव जीतने का रिकॉर्ड? जान लें...

Bihar Election 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कई वरिष्ठ नेता रिकॉर्ड बनाने की ओर हैं। हरिनारायण सिंह इस बार दसवीं बार जीतकर बिहार की राजनीति में नया इतिहास रच सकते हैं।

08-Oct-2025 11:27 AM

By First Bihar

Bihar Election 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तारीखों का ऐलान हो चुका है। जैसे-जैसे नामांकन और उम्मीदवारों की चर्चा तेज हो रही है, वैसे-वैसे कई दिग्गज नेताओं पर भी निगाहें टिकी हैं, जो इस बार रिकॉर्ड बनाने की ओर अग्रसर हैं। खासकर, ऐसे कुछ वरिष्ठ विधायक हैं जो नौ बार विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं और इस बार दसवीं बार जीत का परचम लहराने की दहलीज पर हैं।


जनता दल (यूनाइटेड) के वरिष्ठ नेता हरिनारायण सिंह बिहार की राजनीति में एक अलग पहचान रखते हैं। वे हरनौत विधानसभा सीट से नौ बार विधायक चुने जा चुके हैं और सक्रिय राजनीति में अब भी मौजूद हैं। वे पहली बार 1977 में विधायक बने थे और उसके बाद से उन्होंने 1983, 1990, 2000, 2005 (फरवरी), 2005 (अक्टूबर), 2010, 2015 और 2020 में चुनाव जीता।


अगर 2025 के चुनाव में जदयू उन्हें टिकट देती है और वे जीत दर्ज करते हैं, तो वे दसवीं बार विधानसभा पहुंचने वाले पहले विधायक बन जाएंगे। अब तक बिहार में कोई भी नेता दस बार विधानसभा का चुनाव नहीं जीत पाया है। हालांकि उम्र और स्वास्थ्य को लेकर संशय है, लेकिन सूत्रों के अनुसार वे इस बार भी मैदान में उतर सकते हैं।


हरिनारायण सिंह के अलावा, दो और नेताओं ने अब तक नौ बार विधानसभा चुनाव जीता है सदानंद सिंह (कहलगांव) और रमई राम (बोचहां)। दोनों अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके राजनीतिक करियर की उपलब्धियां बिहार की राजनीति में एक मिसाल हैं।


सदानंद सिंह ने पहली बार 1969 में कहलगांव से जीत दर्ज की थी। इसके बाद 1972, 1977, 1980, 1985, 2000, 2005 (फरवरी), 2010 और 2015 में भी विजयी रहे। वहीं रमई राम ने 1972 में पहली बार बोचहां से जीत हासिल की और 1980, 1985, 1990, 1995, 2000, 2005 (फरवरी), 2005 (अक्टूबर), 2010 में भी लगातार जीत का परचम फहराया। इन दोनों नेताओं की जीत की निरंतरता ने उन्हें बिहार की राजनीतिक विरासत का अहम हिस्सा बना दिया।


वर्तमान में दो वरिष्ठ मंत्री ऊर्जा एवं योजना विकास मंत्री बिजेन्द्र प्रसाद यादव और सहकारिता मंत्री प्रेम कुमार नौवीं जीत की दहलीज पर खड़े हैं। दोनों आठ बार विधायक बन चुके हैं और 2025 के चुनाव में फिर से मैदान में उतरने की संभावना है।


बिजेन्द्र प्रसाद यादव सुपौल से और प्रेम कुमार गया से लगातार चुनाव जीतते रहे हैं। दोनों ने अब तक 1990, 1995, 2000, 2005 (फरवरी), 2005 (अक्टूबर), 2010, 2015 और 2020 में जीत दर्ज की है। अगर वे इस बार भी जीतते हैं, तो वे “नौ बार जीतने वाले क्लब” में शामिल हो जाएंगे। पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी भी अब तक आठ बार विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं। उन्होंने 1980, 1985, 1996, 2000, 2005 (अक्टूबर), 2010, 2015 और 2020 में जीत दर्ज की। 2024 में वे लोकसभा चुनाव जीतकर केंद्र में मंत्री बने।


इसी तरह सुरेंद्र प्रसाद यादव ने भी आठ बार विधानसभा में जीत हासिल की है, हालांकि फिलहाल वे सांसद हैं और इस बार विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। आठ से कम लेकिन प्रभावशाली नेताओं की फेहरिस्त में भाजपा के नंद किशोर यादव, राजद के अब्दुल बारी सिद्दिकी और जदयू के श्रवण कुमार शामिल हैं ये सभी सात-सात बार विधायक बन चुके हैं।


नंद किशोर यादव  पहली बार 1995 में पटना सिटी से चुने गए थे और तब से लगातार 2000, 2005 (फरवरी), 2005 (अक्टूबर), 2010, 2015 और 2020 में जीतते रहे हैं। अब्दुल बारी सिद्दिकी  ने 1977 में पहली बार चुनाव जीता, फिर 2000, 2005 (फरवरी), 2005 (अक्टूबर), 2010 और 2015 में भी जीत हासिल की। श्रवण कुमार ने 1995 में पहली बार जीत दर्ज की और इसके बाद से लगातार विधानसभा पहुंचते रहे हैं।


संसदीय कार्य मंत्री विजय कुमार चौधरी ने 1982, 1985, 1990, 2010, 2015 और 2020 में जीत दर्ज की है। वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विजय शंकर दूबे (1980, 1985, 1990, 2000, 2015, 2020) और अवधेश कुमार सिंह भी छह बार विधानसभा में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं।


बिहार विधानसभा चुनाव 2025 न केवल नए चेहरों का मुकाबला होगा, बल्कि यह कई पुराने अनुभवी नेताओं की राजनीतिक विरासत और रिकॉर्ड की लड़ाई भी बनता जा रहा है। जहां हरिनारायण सिंह दसवीं बार जीत का इतिहास रच सकते हैं, वहीं बिजेन्द्र यादव और प्रेम कुमार जैसे दिग्गज “नौ बार जीतने वाले” नेताओं की सूची में जुड़ सकते हैं।


राज्य की राजनीति में इन नेताओं की लम्बी यात्रा इस बात का प्रमाण है कि बिहार की जनता ने लगातार अपने अनुभवी प्रतिनिधियों पर भरोसा जताया है। आने वाले चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कोई नया रिकॉर्ड बनता है या राजनीतिक इतिहास की किताब में फिर से कोई नया नाम जुड़ता है।