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16-Jan-2026 08:03 AM
By First Bihar
Patna High Court : पटना हाई कोर्ट ने बिहार में लागू शराबबंदी कानून के तहत की गई एक कार्रवाई को अवैध करार देते हुए याचिकाकर्ता को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि किसी मकान से शराब की बरामदगी होती है तो कानून के अनुसार उसी समय या तत्काल प्रभाव से सीलिंग की कार्रवाई की जानी चाहिए। दो साल बाद की गई सीलिंग न सिर्फ कानून की भावना के खिलाफ है, बल्कि वैधानिक प्रावधानों का भी उल्लंघन है।
यह अहम फैसला न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा की एकलपीठ ने जहानाबाद जिले से जुड़े एक मामले में सुनाया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता नीलम देवी के आंशिक रूप से सील किए गए मकान को तत्काल खोलने का निर्देश दिया है। साथ ही, याचिकाकर्ता को अनावश्यक रूप से परेशान करने और कानून का गलत इस्तेमाल करने के लिए राज्य सरकार पर ₹50,000 का अर्थदंड भी लगाया है।
क्या है पूरा मामला
यह मामला वर्ष 2019 में दर्ज जहानाबाद थाना कांड संख्या 797/2019 से संबंधित है। इस कांड में नीलम देवी के पुत्र के खिलाफ बिहार मद्य निषेध एवं उत्पाद अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था। पुलिस द्वारा की गई छापेमारी के दौरान मकान से 8.25 लीटर विदेशी शराब बरामद होने का दावा किया गया था।
हालांकि, छापेमारी और बरामदगी के समय पुलिस ने मकान को सील नहीं किया। न तो तत्काल कोई सीलिंग आदेश जारी हुआ और न ही उस समय मकान के किसी हिस्से को बंद किया गया। इसके बावजूद, करीब दो वर्ष बाद 31 जनवरी 2022 को अचानक पुलिस ने मकान का एक हिस्सा सील कर दिया, जिससे याचिकाकर्ता और उनके परिवार को गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ा।
हाई कोर्ट में दी गई दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से हाई कोर्ट में दलील दी गई कि बिहार मद्य निषेध एवं उत्पाद अधिनियम की धारा 62 के तहत किसी भवन या परिसर को तभी सील किया जा सकता है, जब शराब की बरामदगी के तुरंत बाद ऐसी कार्रवाई की जाए। दो साल बाद की गई सीलिंग पूरी तरह मनमानी और कानून के विपरीत है।
वहीं राज्य सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि कोविड-19 महामारी के कारण कार्रवाई में देरी हुई। सरकार ने यह भी कहा कि शराबबंदी कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए प्रशासन को व्यापक अधिकार दिए गए हैं।
कोर्ट ने क्यों खारिज की सरकार की दलील
हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की कोविड महामारी से जुड़ी दलील को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यदि वर्ष 2019 में शराब की बरामदगी हुई थी और उस समय सीलिंग जरूरी समझी जाती, तो तत्काल कार्रवाई की जानी चाहिए थी। 2019 से 2022 तक की देरी के लिए सरकार कोई ठोस, कानूनी और तार्किक कारण प्रस्तुत करने में विफल रही।
न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा ने अपने आदेश में कहा कि धारा 62 का उद्देश्य यह है कि अवैध शराब से जुड़े साक्ष्यों को सुरक्षित रखा जाए और आगे किसी प्रकार की अवैध गतिविधि रोकी जा सके। जब दो वर्षों तक मकान खुला रहा और कोई कार्रवाई नहीं की गई, तो बाद में सीलिंग का कोई औचित्य नहीं बचता।
नागरिक अधिकारों पर अहम टिप्पणी
कोर्ट ने यह भी कहा कि शराबबंदी कानून के नाम पर आम नागरिकों को परेशान करना स्वीकार्य नहीं है। कानून का पालन जरूरी है, लेकिन उसका दुरुपयोग करके लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता। बिना वैध कारण के किसी का मकान सील करना संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत संपत्ति के अधिकार का उल्लंघन है। इन्हीं आधारों पर कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए मकान को तत्काल अनसील करने का आदेश दिया और राज्य सरकार पर ₹50,000 का जुर्माना लगाया।
भविष्य के मामलों पर असर
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला शराबबंदी कानून के तहत चल रही कई पुरानी और विवादित कार्रवाइयों पर असर डाल सकता है। खासकर वे मामले, जिनमें बरामदगी के काफी समय बाद मकान या संपत्ति सील की गई है, अब न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकते हैं। यह निर्णय न सिर्फ प्रशासन के लिए एक कड़ा संदेश है, बल्कि आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।