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17-Jan-2026 10:11 AM
By First Bihar
Bihar Film Policy : बिहार अब सिर्फ भोजपुरी या क्षेत्रीय सिनेमा तक सीमित नहीं रह गया है। राज्य की बिहार फिल्म प्रोत्साहन नीति ने इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फिल्म मानचित्र पर एक नई पहचान दी है। इस नीति के तहत अब तक लगभग 40 फिल्मों को शूटिंग की अनुमति दी जा चुकी है, जिनमें से 33 फिल्मों का निर्माण कार्य सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है। यह आंकड़ा साफ तौर पर यह दिखाता है कि फिल्म निर्माताओं का भरोसा बिहार पर लगातार बढ़ रहा है और राज्य अब फिल्म निर्माताओं के लिए एक फिल्म फ्रेंडली डेस्टिनेशन बन चुका है।
पटना से लेकर राजगीर तक बिहार के शहर अब फिल्मों की शूटिंग के लिए नई पहचान बना रहे हैं। राजगीर की पहाड़ियां, नालंदा का ऐतिहासिक गौरव, गया के धार्मिक स्थल, भागलपुर की प्राकृतिक खूबसूरती और मोतिहारी की साहित्यिक विरासत फिल्मकारों को अपनी ओर आकर्षित कर रही हैं। इन लोकेशनों ने न केवल फिल्मों को एक अलग विजुअल सीन दिया है, बल्कि बिहार की छवि को देश-दुनिया में नई ऊंचाई दी है।
राज्य में अब केवल भोजपुरी और मगही फिल्मों की शूटिंग नहीं हो रही, बल्कि हिंदी और अंग्रेजी फिल्मों के प्रोजेक्ट्स भी तेजी से बढ़ रहे हैं। यह बदलाव यह साबित करता है कि बिहार का सिनेमा अब क्षेत्रीय सीमाओं को तोड़कर राष्ट्रीय और वैश्विक मंच की ओर बढ़ चुका है। बिहार फिल्म प्रोत्साहन नीति ने फिल्म निर्माताओं के लिए परमिट प्रक्रिया को आसान बनाकर एक भरोसेमंद और सहज माहौल तैयार किया है।
फिल्म शूटिंग से राज्य के स्थानीय कारोबार को भी नया जीवन मिल रहा है। होटल, कैटरिंग, ट्रांसपोर्ट, लाइटिंग, सेट डिजाइन और लोकल टेक्नीशियन जैसे क्षेत्रों को फिल्म शूटिंग से बड़ा लाभ मिल रहा है। शूटिंग के दौरान बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों को काम मिल रहा है, जिससे रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं। इस तरह सिनेमा अब सिर्फ कला का माध्यम नहीं रह गया, बल्कि बिहार के लिए आर्थिक विकास का एक मजबूत इंजन बनता जा रहा है।
राज्य सरकार ने फिल्म उद्योग में तकनीकी कौशल विकास पर भी जोर दिया है। बिहार राज्य फिल्म विकास निगम द्वारा आयोजित वर्कशॉप और मास्टर क्लासेस के माध्यम से युवाओं को कैमरा ऑपरेशन, साउंड रिकॉर्डिंग, एडिटिंग और फिल्म प्रोडक्शन की बारीकियां सिखाई जा रही हैं। इसका उद्देश्य यह है कि स्थानीय युवा बाहर जाने की बजाय अपने ही राज्य में रोजगार के अवसर प्राप्त कर सकें। इससे बिहार में फिल्म उद्योग के लिए स्थायी और कुशल कार्यबल तैयार होगा।
कला एवं संस्कृति विभाग के मंत्री अरुण शंकर प्रसाद ने बिहार को उभरता हुआ फिल्म हब बताते हुए मार्च-अप्रैल में मुंबई में बड़े फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों के साथ विशेष बैठक आयोजित करने का निर्देश दिया है। इसका मकसद बिहार को एक मजबूत फिल्म डेस्टिनेशन के रूप में स्थापित करना और अधिक से अधिक प्रोजेक्ट्स को राज्य में आकर्षित करना है।
बिहार अब सिर्फ इतिहास, शिक्षा और धार्मिक स्थलों के लिए नहीं, बल्कि सिनेमा की नई प्रयोगशाला के रूप में भी उभर रहा है। कैमरे की रौशनी में चमकता यह नया बिहार आने वाले समय में भारतीय फिल्म उद्योग का एक बड़ा चेहरा बन सकता है। राज्य सरकार की योजनाओं और फिल्म निर्माताओं के बढ़ते भरोसे के कारण बिहार में फिल्म उद्योग का भविष्य उज्ज्वल नजर आ रहा है।
राज्य के शहर और कस्बे अब फिल्मों की शूटिंग के लिए आकर्षक बनते जा रहे हैं। नालंदा की प्राचीन बौद्ध नगरी, राजगीर की हरियाली से ढकी पहाड़ियां और गया के धार्मिक स्थल अब फिल्मों में अपनी अलग पहचान बना रहे हैं। यह लोकेशन न सिर्फ दृश्य सौंदर्य प्रदान करते हैं, बल्कि फिल्म निर्माताओं को नई कहानियां और सेटिंग्स भी उपलब्ध कराते हैं।
इस नीति के लागू होने से बिहार में फिल्म उद्योग के आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभाव दोनों बढ़ रहे हैं। स्थानीय लोग, युवा कलाकार और तकनीशियन इस बदलाव का सीधा लाभ उठा रहे हैं। साथ ही, यह नीति बिहार को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फिल्म निर्माताओं के लिए पहली पसंद बनाती जा रही है। इस प्रकार, बिहार अब केवल क्षेत्रीय फिल्म उद्योग तक सीमित नहीं है। यह राज्य भारतीय सिनेमा में अपनी नई पहचान बना रहा है, और आने वाले समय में फिल्म निर्माताओं के लिए एक प्रधान हब के रूप में उभरने की पूरी संभावना रखता है।