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23-Feb-2026 09:41 AM
By First Bihar
Patna News : चिंताहरण सोशल डेवलपमेंट ट्रस्ट की ओर से बहुउद्देशीय सांस्कृतिक परिसर (भारतीय नृत्य कला मंदिर) में आयोजित चिंताहरण स्मृति व्याख्यान में ‘स्वामी सहजानंद सरस्वती के किसान आंदोलन में हिंदी साहित्यकारों की भूमिका’ विषय पर महत्वपूर्ण चर्चा हुई। कार्यक्रम में साहित्य, संस्कृति और सामाजिक संगठनों से जुड़े अनेक लोग उपस्थित थे। संचालन युवा संस्कृतिकर्मी जयप्रकाश ने किया।
मुख्य वक्ता के रूप में वेस्लेयन यूनिवर्सिटी में भारतीय इतिहास के प्रोफेसर William R. Pinch ने कहा कि Swami Sahajanand Saraswati के किसान आंदोलन में साहित्यकारों की भूमिका प्रत्यक्ष और प्रभावी थी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि Nagarjun और Rahul Sankrityayan न केवल वैचारिक रूप से, बल्कि जमीन पर आंदोलन में सक्रिय भागीदार थे। सारण और चंपारण में दोनों ने किसानों के बीच संगठनात्मक काम किया और अमवारी में गिरफ्तारी भी झेली।
पिंच ने बताया कि स्वामी सहजानंद पर सबसे महत्वपूर्ण शोध उनके गुरु वाल्टर हाउजर ने किया था, जिन्होंने 1950 के दशक में संबंधित दस्तावेज खोजे। ये दस्तावेज बाद में अमेरिका चले गए थे, लेकिन अब पटना लौट आए हैं। उन्होंने कहा कि स्वामी सहजानंद स्वयं लेखक थे और उनके संस्मरण 1952 में मरणोपरांत प्रकाशित हुए, जिनसे किसान आंदोलन के कई तथ्य सामने आए। उन्होंने यह भी प्रश्न उठाया कि 1941-42 में लिखी गई स्वामी जी की पुस्तकें उनके जीवनकाल में क्यों प्रकाशित नहीं हो सकीं।
प्रो. पिंच ने कहा कि 1939 के बाद स्वामी सहजानंद वामपंथ की ओर आकृष्ट हुए। उसी दौर में कार्यानंद शर्मा के नेतृत्व में किसान आंदोलन की जमीन पर कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई, जिसमें बी.बी. मिश्रा की भूमिका भी महत्वपूर्ण थी। 1941 में हिटलर के सोवियत संघ पर हमले के बाद पार्टी ने ‘पीपुल्स वार’ की नीति अपनाई। जेल में स्वामी सहजानंद और राहुल सांकृत्यायन दोनों ने आत्मकथा लेखन का कार्य किया। स्वामी जी ने ‘गीता हृदय’ का प्रारूप भी वहीं तैयार किया, जिसे गीता की मार्क्सवादी व्याख्या माना जाता है।
अमवारी की घटना का उल्लेख करते हुए पिंच ने बताया कि राहुल सांकृत्यायन पर हमले और गिरफ्तारी को लेकर उस समय व्यापक बहस हुई थी। बी.बी. मिश्रा ने इस दुर्व्यवहार के खिलाफ लिखा, जिसकी चर्चा अंतरराष्ट्रीय स्तर तक हुई। नागार्जुन ने 1943 में लिखे एक पत्र में स्वामी सहजानंद को अपना राजनीतिक गुरु बताया था, जबकि राहुल को वे आध्यात्मिक प्रेरणा मानते थे। नागार्जुन ने आत्मकथा लिखने से परहेज किया और कहा करते थे—“मेरा काव्य पढ़ो।”
स्वागत वक्तव्य में श्री सीताराम आश्रम ट्रस्ट के सचिव डॉ. सत्यजीत सिंह ने कहा कि स्वामी सहजानंद ने ‘जो जोतेगा, वही खाएगा’ का नारा देकर समाज को मुक्ति का रास्ता दिखाया। डॉ. (कर्नल) ए.के. सिंह ने सेवा-भाव को अपने परिवार की परंपरा बताते हुए सामाजिक कार्यों में समर्पण की बात कही।
पटना कॉलेज के पूर्व प्राचार्य प्रो. तरुण कुमार ने प्रेमचंद, निराला और मैथिलीशरण गुप्त के उदाहरण देते हुए कहा कि किसान आंदोलन को साहित्यकारों ने वैचारिक ताकत दी। उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन दरअसल ग्रामीण भारत की पीड़ा और प्रतिरोध की अभिव्यक्ति है। प्रख्यात कवि आलोकधन्वा ने कहा कि बिहार को बनाने में दिनकर, राहुल और नागार्जुन जैसे रचनाकारों की बड़ी भूमिका रही है।
कार्यक्रम में कैलाश चंद्र झा ने बताया कि किसान आंदोलन से जुड़े कई महत्वपूर्ण दस्तावेज बिहार स्टेट आर्काइव द्वारा डिजिटाइज किए जा रहे हैं, जो जल्द ही सार्वजनिक होंगे। धन्यवाद ज्ञापन प्रो. रंजीत सिंह ने किया। समारोह में बड़ी संख्या में साहित्यकार, इतिहासकार और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे।