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23-Feb-2026 12:14 PM
By First Bihar
Bihar Panchayat News : बिहार विधान परिषद में आज ग्राम पंचायतों में विकास योजनाओं के चयन और क्रियान्वयन को लेकर एक बार फिर सवाल उठ खड़े हुए हैं। सदन में यह मुद्दा तब गरमा गया जब विपक्षी पार्षद ने आरोप लगाया कि मुखिया अपने विवेक से वार्डों का चयन करते हैं, जिससे केवल उन वार्डों का विकास होता है जहां से उन्हें राजनीतिक या व्यक्तिगत लाभ होता है, जबकि अन्य वार्ड उपेक्षित रह जाते हैं।
पार्षद ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था के तहत “जी राम जी” योजना (मनरेगा ) के अंतर्गत कार्य करवाने का अधिकार पूरी तरह से मुखिया के पास है। इस योजना के तहत प्रत्येक पंचायत को लगभग 10 लाख रुपये की राशि उपलब्ध कराई जाती है, जिसका उपयोग विकास कार्यों में किया जाता है। लेकिन यह राशि किस वार्ड में और किस कार्य पर खर्च होगी, इसका निर्णय मुखिया स्वयं लेते हैं।
विपक्षी सदस्य ने सदन में स्पष्ट रूप से कहा, “मुखिया अपने मन मुताबिक वार्ड तय करते हैं। जिन वार्ड सदस्यों से उनका तालमेल अच्छा होता है या जिनसे उन्हें फायदा होता है, वहीं काम कराया जाता है। बाकी वार्डों की अनदेखी की जाती है। यह व्यवस्था लोकतांत्रिक भावना के खिलाफ है।”
उन्होंने मांग की कि वार्ड सदस्यों को भी कम से कम अपने कार्यकाल में 10 लाख रुपये तक की योजना का चयन करने का अधिकार दिया जाए। उनका तर्क था कि वार्ड सदस्य सीधे तौर पर अपने क्षेत्र की समस्याओं से जुड़े होते हैं और उन्हें अपने वार्ड की प्राथमिक जरूरतों की बेहतर जानकारी होती है। यदि उन्हें अधिकार मिलेगा तो विकास संतुलित और पारदर्शी तरीके से होगा।
पार्षद ने यह भी कहा कि वर्तमान व्यवस्था में वार्ड सदस्य सिर्फ नाम के जनप्रतिनिधि बनकर रह जाते हैं। उन्हें न तो योजना चयन में भागीदारी मिलती है और न ही खर्च के निर्णय में कोई अधिकार। इससे जनता के बीच असंतोष बढ़ता है और पंचायत स्तर पर गुटबाजी को बढ़ावा मिलता है।
सदन में इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान मंत्री श्रवण कुमार ने कहा कि -मैं सभी सदस्य ने सुझाव का स्वागत करता हूँ। मंत्री ने कहा कि यह एक महत्वपूर्ण विषय है और इस पर गंभीरता से विचार किया जाएगा। उन्होंने कहा, “अगर वार्ड सदस्यों को अधिकार देने से विकास कार्यों में पारदर्शिता और संतुलन आता है तो सरकार इस पर सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाएगी।” इसको लेकर केंद्र सरकार को पत्र लिखेगी उसके बाद उनको हक़ मिलेगा।
हालांकि, महेश्वर सिंह ने कहा कि यदि अधिकारों का अत्यधिक बंटवारा किया गया तो पंचायत स्तर पर समन्वय की समस्या उत्पन्न हो सकती है। उनका कहना था कि विकास कार्यों के लिए एक केंद्रीय नेतृत्व आवश्यक होता है, ताकि योजनाओं का क्रियान्वयन सुचारू रूप से हो सके।
फिलहाल, मौजूदा व्यवस्था में “जी राम जी” योजना के तहत पंचायत स्तर पर काम कराने का अधिकार मुखिया के पास ही है और वही 10 लाख रुपये की राशि का उपयोग तय करते हैं। लेकिन विपक्ष की ओर से उठाई गई मांग ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पंचायत व्यवस्था में अधिकारों के विकेंद्रीकरण की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
अब देखना यह होगा कि सरकार इस सुझाव पर क्या निर्णय लेती है। यदि वार्ड सदस्यों को भी योजना चयन का अधिकार मिलता है तो पंचायत स्तर पर विकास की दिशा और गति दोनों में बदलाव देखने को मिल सकता है। यह कदम न केवल लोकतांत्रिक भागीदारी को मजबूत करेगा, बल्कि गांवों में संतुलित विकास का मार्ग भी प्रशस्त कर सकता है।