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अक्षय तृतीया पर जन्मे थे परशुराम, जानें कैसे ‘राम’ बने भगवान विष्णु के छठे अवतार और क्यों गूंजती है उनकी जयंती की महिमा

Akshaya Tritiya 2026: अक्षय तृतीया हिंदू धर्म में अत्यंत पावन और शुभ मानी जाती है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम का जन्म हुआ था, जिसके कारण इसे परशुराम जयंती के रूप में भी श्रद्धा...

अक्षय तृतीया पर जन्मे थे परशुराम, जानें कैसे ‘राम’ बने भगवान विष्णु के छठे अवतार और क्यों गूंजती है उनकी जयंती की महिमा
Ramakant kumar
4 मिनट

Akshaya Tritiya 2026: हिंदू धर्म में अक्षय तृतीया का दिन सिर्फ शुभ कार्यों के लिए ही नहीं, बल्कि एक दिव्य अवतार की स्मृति के लिए भी बेहद खास माना जाता है। मान्यता है कि इसी पावन तिथि पर भगवान परशुराम का जन्म हुआ था, जिन्हें भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। यही वजह है कि हर साल इस दिन पूरे देश में परशुराम जयंती बड़े श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है।


साल 2026 में अक्षय तृतीया 20 अप्रैल को मनाई जाएगी। ‘अक्षय’ का अर्थ होता है जो कभी खत्म न हो। यानी इस दिन किया गया हर शुभ कार्य अनंत फल देने वाला माना जाता है। इसी दिव्यता के कारण यह तिथि परशुराम जयंती के रूप में और भी खास बन जाती है।


कैसे हुआ परशुराम का जन्म?

पौराणिक कथा के अनुसार, भृगुवंशी ऋषि ऋषि जमदग्नि और उनकी पत्नी माता रेणुका ने पुत्र प्राप्ति के लिए कठोर तप और यज्ञ किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवराज इंद्र ने उन्हें एक तेजस्वी पुत्र का वरदान दिया।


इसके बाद वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया, यानी अक्षय तृतीया के दिन एक दिव्य बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम ‘राम’ रखा गया। यह बालक आगे चलकर अपने अद्भुत पराक्रम और धर्म रक्षा के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हुआ।


‘राम’ से ‘परशुराम’ बनने की कहानी

बाल्यकाल से ही राम असाधारण प्रतिभा और साहस के धनी थे। उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और दिव्य अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान दिया।


विद्या पूर्ण होने पर शिवजी ने उन्हें अपना प्रिय अस्त्र ‘परशु’ (फरसा) भेंट किया। इसी परशु को धारण करने के कारण उनका नाम ‘परशुराम’ पड़ गया। यह नाम ही उनकी पहचान बन गया एक ऐसे योद्धा की, जो धर्म की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता था।


अत्याचार के खिलाफ उठाया फरसा

उस समय हैहय वंश का राजा कार्तवीर्य अर्जुन अपने अहंकार में चूर होकर ऋषियों और आम लोगों पर अत्याचार करने लगा था। उसने ऋषि जमदग्नि के आश्रम को नष्ट कर दिया और उनकी कामधेनु का अपमान किया।


जब परशुराम को यह पता चला, तो उनका क्रोध भड़क उठा। उन्होंने सहस्रार्जुन का वध कर दिया। लेकिन बदले की आग यहीं नहीं बुझी। सहस्रार्जुन के पुत्रों ने छल से ऋषि जमदग्नि की हत्या कर दी।


पिता की हत्या और माता के दुख ने परशुराम को अंदर तक झकझोर दिया। तब उन्होंने संकल्प लिया कि वे पृथ्वी को अत्याचारियों से मुक्त करेंगे। कहा जाता है कि उन्होंने अधर्मी क्षत्रियों का 21 बार संहार किया।


क्यों माने जाते हैं चिरंजीवी?

धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान परशुराम उन चुनिंदा ‘चिरंजीवियों’ में से एक हैं, जो आज भी जीवित हैं। माना जाता है कि वे कलियुग के अंत तक पृथ्वी पर रहेंगे। इतना ही नहीं, जब भगवान विष्णु का अंतिम अवतार ‘कल्कि’ प्रकट होगा, तब परशुराम ही उन्हें अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देंगे और धर्म की स्थापना में उनका मार्गदर्शन करेंगे।


आज भी क्यों खास है परशुराम जयंती?

परशुराम जयंती सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि साहस, धर्म और अन्याय के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा भी है। यह दिन हमें सिखाता है कि जब अत्याचार बढ़ जाए, तो उसके खिलाफ आवाज उठाना ही सच्चा धर्म है।


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रिपोर्टर / लेखक

Ramakant kumar

FirstBihar न्यूज़ डेस्क

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