1st Bihar Published by: First Bihar Updated Mar 06, 2026, 10:51:44 AM
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Bihar News: बिहार की राजनीति एक बड़े बदलाव के दौर में प्रवेश कर रही है। राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने के साथ ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का दिल्ली की राजनीति की ओर कदम बढ़ाना लगभग तय माना जा रहा है। उनके इस फैसले के साथ ही बिहार की राजनीति में उस दौर का अंत होता दिख रहा है, जो करीब पांच दशक तक जेपी आंदोलन से निकले नेताओं के प्रभाव में रहा।
1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले जेपी आंदोलन से बिहार को कई बड़े राजनीतिक चेहरे मिले थे। इनमें प्रमुख रूप से लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान शामिल रहे। इन तीनों नेताओं ने 1980 के दशक से लेकर अब तक राज्य की राजनीति की दिशा और दशा तय करने में अहम भूमिका निभाई। लेकिन समय के साथ यह तिकड़ी अब सक्रिय राजनीति से लगभग दूर हो चुकी है।
रामविलास पासवान का पहले ही निधन हो चुका है, जबकि लालू प्रसाद यादव लंबे समय से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं और उन्होंने राजनीतिक जिम्मेदारियां काफी हद तक अपने बेटे तेजस्वी यादव को सौंप दी हैं। वहीं नीतीश कुमार, जो पिछले करीब 20 वर्षों से बिहार में मुख्यमंत्री या सत्ताधारी गठबंधन के प्रमुख चेहरे के रूप में बने रहे, अब राष्ट्रीय राजनीति की ओर रुख कर चुके हैं। इस तरह पहली बार ऐसा समय आएगा जब बिहार की राजनीति में जेपी आंदोलन से जुड़े प्रमुख नेताओं की प्रत्यक्ष भूमिका नहीं होगी।
इस दौर में एक और महत्वपूर्ण नाम सुशील कुमार मोदी का भी रहा, जो भाजपा के वरिष्ठ नेता और नीतीश कुमार के करीबी सहयोगी माने जाते थे। उन्होंने लंबे समय तक बिहार के उपमुख्यमंत्री के रूप में काम किया और राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके निधन के बाद यह पीढ़ी और तेजी से पीछे छूटती नजर आने लगी।
इन नेताओं का प्रभाव केवल बिहार तक सीमित नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी उनके समीकरण अहम माने जाते थे। कई बार दिल्ली की सत्ता के समीकरणों को प्रभावित करने में भी इनका योगदान रहा। ऐसे में अब जब नीतीश कुमार दिल्ली की ओर बढ़ रहे हैं, तो बिहार में नए राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
पिछले दो दशकों में नीतीश कुमार ने बिहार में सामाजिक संतुलन बनाने की एक खास राजनीतिक रणनीति अपनाई थी। उन्होंने अति पिछड़ा वर्ग और अति दलित समुदाय को केंद्र में रखकर एक व्यापक सामाजिक गठजोड़ तैयार किया। इस सामाजिक समीकरण ने उन्हें लंबे समय तक सत्ता में बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके कारण राष्ट्रीय जनता दल ने कई चुनावों में पूरी ताकत लगाने के बावजूद स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं किया।
नीतीश कुमार की राजनीति केवल जातीय समीकरणों तक सीमित नहीं रही। कुर्मी और कुशवाहा समुदाय के ‘लव-कुश’ समीकरण के रूप में करीब सात प्रतिशत वोट बैंक उनके साथ माना जाता रहा, लेकिन इसके अलावा भी वे कई वर्गों के बीच स्वीकार्य नेता बने रहे। उनकी छवि एक ऐसे नेता की रही, जो अलग-अलग सामाजिक समूहों को साथ लेकर चलने की क्षमता रखते थे।
अब जब राज्य की कमान भाजपा के नेतृत्व में जाने की संभावना जताई जा रही है, तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि नया नेतृत्व नीतीश कुमार की राजनीतिक और सामाजिक विरासत को किस हद तक संभाल पाता है। भाजपा के सामने चुनौती केवल सत्ता संभालने की नहीं, बल्कि बिहार के जटिल सामाजिक और जातीय समीकरणों को संतुलित करने की भी होगी।
नीतीश कुमार ने अपने लंबे राजनीतिक कार्यकाल में लालू प्रसाद यादव के शासनकाल को ‘जंगलराज’ करार देते हुए खुद को ‘सुशासन बाबू’ की छवि के साथ स्थापित किया था। कानून व्यवस्था, सड़क, शिक्षा और प्रशासनिक सुधारों को लेकर उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई। इसी वजह से उनकी छवि विकास और प्रशासनिक सुधारों से जोड़कर देखी जाती रही।