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नाले की खुदाई में कहां मिला करोड़ों का खजाना? सोने के बिस्किट और सिक्के देख फटी रह गई आंखें

बेल्जियम के सिंट-गिलिस-डेंडरमोंडे में नाले की खुदाई के दौरान मजदूरों को करोड़ों रुपये का खजाना मिला। इसमें सोने के सिक्के, छड़ें और कीमती सिल्लियां शामिल हैं।

gold treasure found
© Google
Mukesh Srivastava
4 मिनट

क्या आपने कभी सोचा है कि नाले की खुदाई के दौरान अचानक करोड़ों रुपये का खजाना मिल जाए? बेल्जियम के सिंट-गिलिस-डेंडरमोंडे शहर में कुछ ऐसा ही हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहां सीवर पाइपलाइन बिछाने के लिए खुदाई कर रहे मजदूरों को जमीन के भीतर छिपा हुआ बेशकीमती खजाना मिला।



खुदाई के दौरान मिले इस खजाने में बड़ी संख्या में सोने के सिक्के, सोने की छड़ें और कीमती सिल्लियां शामिल हैं। शुरुआती अनुमान के मुताबिक, खजाने की कुल कीमत करीब 9 मिलियन यूरो यानी भारतीय मुद्रा में लगभग 80 से 85 करोड़ रुपये बताई जा रही है। यह मामला तब सामने आया जब 18 वर्षीय एक छात्र गर्मियों की छुट्टियों के दौरान वहां मजदूरी कर रहा था। उसे एक पुरानी बीयर फैक्ट्री के पास नाली की खुदाई के काम में लगाया गया था।



कुदाल चलाते समय उसे मिट्टी और तहखाने की पुरानी दीवार के पीछे किसी धातु जैसी वस्तु के टकराने की आवाज सुनाई दी। छात्र और उसके साथी कामगारों ने जब वहां से मिट्टी हटाई तो शुरुआत में उन्हें कुछ पुराने सिक्के दिखाई दिए। हालांकि, आगे खुदाई करने पर चमकदार सोने की छड़ें और पुरानी सिल्लियां मिलने लगीं।



खजाना मिलने की खबर तेजी से इलाके में फैल गई। इसके बाद बड़ी संख्या में लोग मौके पर पहुंचने लगे और अपने स्तर पर जमीन में छिपे खजाने की तलाश करने की कोशिश करने लगे। स्थिति को देखते हुए स्थानीय पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की और सुरक्षा के लिए पूरे क्षेत्र को सील कर दिया। बरामद खजाने को सुरक्षित सरकारी तिजोरी में जमा करा दिया गया है।



इतिहासकारों और विशेषज्ञों का मानना है कि यह खजाना 19वीं सदी का हो सकता है। इसका संबंध उस दौर की एक प्रसिद्ध बीयर फैक्ट्री के मालिक थियोफिलस वान एशे से जोड़ा जा रहा है। अनुमान है कि उस समय की राजनीतिक अस्थिरता या आर्थिक असुरक्षा के कारण उन्होंने अपनी जीवनभर की कमाई को तहखाने की दीवार के पीछे छिपा दिया होगा। दशकों तक दीवार के पीछे दबे रहने के कारण यह खजाना लोगों की नजरों से दूर रहा।



बेल्जियम के कानून के तहत किसी ऐतिहासिक खजाने के मिलने के बाद उसके वास्तविक मालिक या कानूनी वारिसों की पहचान के लिए प्रक्रिया शुरू की जाती है। बताया जा रहा है कि संभावित मालिक या उनके वंशजों को खजाने पर अपना दावा साबित करने के लिए पांच साल का समय दिया जाएगा।



अगर इस अवधि में कोई वैध वारिस सामने नहीं आता है, तो लागू संपत्ति कानून के तहत खजाने को जमीन के मालिक और इसे खोजने वाले मजदूरों के बीच बांटे जाने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। नाले की खुदाई के दौरान मिला यह खजाना अब स्थानीय लोगों के साथ-साथ इतिहासकारों के लिए भी चर्चा का विषय बन गया है। विशेषज्ञों के लिए यह खोज न केवल आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि अतीत के एक अनसुलझे रहस्य से पर्दा उठाने वाली भी मानी जा रही है। 

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FIRST BIHAR

FirstBihar संवाददाता