Siwan Police Firing: नीट पेपर लीक के विरोध में बुलाए गए बिहार बंद के दौरान सीवान में जो कुछ हुआ, उसने सिर्फ कानून-व्यवस्था ही नहीं बल्कि पुलिस की कार्रवाई और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शांतिपूर्ण विरोध के रूप में शुरू हुआ प्रदर्शन देखते ही देखते हिंसक झड़प में बदल गया। ईंट-पत्थर चले, आंसू गैस के गोले छोड़े गए और फिर फायरिंग की खबर ने पूरे बिहार की राजनीति को गरमा दिया। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर छात्रों को गोली किसने मारी? क्या पुलिस ने फायरिंग की या फिर गोली किसी और की थी? अभी तक इस सवाल का स्पष्ट जवाब किसी के पास नहीं है, लेकिन राजनीतिक बयानबाजी जरूर तेज हो गई है।
पुलिस का कहना है कि हालात उस समय बेकाबू हो गए जब कुछ उपद्रवी तत्वों ने सुरक्षाबलों पर पथराव शुरू कर दिया। पुलिस के मुताबिक भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पहले हल्का बल प्रयोग किया गया और उसके बाद आंसू गैस के गोले छोड़े गए। पुलिस का दावा है कि सबसे पहले फायरिंग उपद्रवी तत्वों की ओर से हुई, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी।
इस हिंसा में तीन युवा प्रदर्शनकारी घायल हुए हैं। घायलों की पहचान सीवान के आरिफ, बुलेट कुमार गोंड और उत्तर प्रदेश के रायबरेली निवासी आकाश कुमार के रूप में हुई है। तीनों की हालत को देखते हुए उन्हें बेहतर इलाज के लिए पटना रेफर किया गया है। दूसरी ओर, पुलिस का कहना है कि इस झड़प में सीवान के एसपी पूरन कुमार झा, दो डीएसपी समेत करीब 25 पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं। घटना के बाद पुलिस ने हिंसा और उपद्रव के आरोप में 65 लोगों को हिरासत में लिया है। कई इलाकों में लगातार छापेमारी की जा रही है और सीसीटीवी फुटेज व वीडियो के आधार पर अन्य आरोपियों की पहचान की जा रही है।
हालांकि मामला अब सिर्फ कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गया है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया कि पुलिस ने छात्रों पर एके-47 से गोलियां चलाईं। आरजेडी के मुख्य प्रवक्ता शक्ति सिंह यादव ने भी आरोप लगाया कि आंसू गैस छोड़ने के बाद छात्रों की भीड़ पर दस से अधिक राउंड फायरिंग की गई। लेकिन यहां एक अहम सवाल खड़ा होता है। यदि विपक्ष का दावा है कि पुलिस ने एके-47 से फायरिंग की, तो उसके समर्थन में अब तक कौन से आधिकारिक साक्ष्य सामने आए हैं? क्या किसी जांच एजेंसी ने इसकी पुष्टि की है? या फिर यह केवल राजनीतिक आरोप है? इन सवालों के जवाब अभी सामने नहीं आए हैं।
दूसरी ओर, पुलिस भी पूरी तरह स्पष्ट स्थिति नहीं बता रही है। सीवान के एसपी पूरन कुमार झा का कहना है कि तीनों युवक किसकी गोली से घायल हुए, यह अभी तय नहीं हुआ है और इसकी जांच कराई जा रही है। यदि पुलिस खुद यह कह रही है कि गोली के स्रोत की पुष्टि नहीं हुई है, तो फिर घटना की पूरी सच्चाई सामने आने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना कितना उचित होगा?
अगर जांच में यह सामने आता है कि पुलिस ने वास्तव में घातक हथियारों का इस्तेमाल किया, तो यह भी स्पष्ट करना होगा कि किन परिस्थितियों में ऐसी कार्रवाई आवश्यक समझी गई। वहीं यदि गोली किसी अन्य स्रोत से चली, तो उस व्यक्ति या समूह की पहचान कर उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई करना भी उतना ही जरूरी होगा।
फिलहाल एक बात निर्विवाद है कि इस हिंसा में प्रदर्शनकारी भी घायल हुए हैं और पुलिसकर्मी भी। ऐसे में किसी भी पक्ष के दावे को अंतिम सत्य मानने से पहले निष्पक्ष और वैज्ञानिक जांच सबसे जरूरी है। बैलिस्टिक रिपोर्ट, फोरेंसिक जांच, वीडियो फुटेज और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान ही यह तय करेंगे कि गोली किसने चलाई और हिंसा की वास्तविक जिम्मेदारी किस पर है।
सीवान की यह घटना केवल एक कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विरोध, पुलिस कार्रवाई और राजनीतिक जवाबदेही की भी बड़ी परीक्षा बन चुकी है। अब पूरे बिहार की नजर जांच रिपोर्ट पर टिकी है, क्योंकि वही तय करेगी कि सच क्या है और जिम्मेदार कौन।





