Bihar News : बिहार सरकार के विभिन्न विभागों में कार्यरत भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे अधिकारियों और कर्मचारियों को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। निगरानी अन्वेषण ब्यूरो (Vigilance Investigation Bureau) ने वर्ष 2026 की अद्यतन सूची जारी कर दी है, जिसमें राज्य के 5,136 अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ दर्ज भ्रष्टाचार के मामलों का ब्यौरा शामिल है। इन सभी मामलों में न केवल प्राथमिकी (FIR) दर्ज हो चुकी है, बल्कि अदालत में चार्जशीट भी दाखिल की जा चुकी है।
इस सूची में सबसे अधिक दागी अधिकारी शिक्षा विभाग के हैं। इसके बाद राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग, पंचायती राज विभाग, बिहार पुलिस और सामान्य प्रशासन विभाग का स्थान है। निगरानी विभाग ने यह सूची सभी विभागाध्यक्षों, प्रमंडलीय आयुक्तों और राज्य के सभी 38 जिलों के जिलाधिकारियों (DM) को 30 जून 2026 तक भेज दी है।
शिक्षा विभाग में सबसे ज्यादा मामले
निगरानी विभाग के आंकड़ों के अनुसार, कुल 5,136 मामलों में सबसे अधिक 988 मामले शिक्षा विभाग से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ दर्ज हैं। शिक्षा विभाग लंबे समय से नियुक्ति, स्थानांतरण, वेतन भुगतान और अन्य प्रशासनिक कार्यों में भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर चर्चा में रहा है। अब आधिकारिक सूची सामने आने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि इस विभाग में सबसे अधिक अधिकारी जांच और न्यायिक प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं।
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग दूसरे स्थान पर
सूची के अनुसार राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग में 545 अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले दर्ज हैं। भूमि मापी, दाखिल-खारिज, जमाबंदी, रसीद और जमीन से जुड़े विवादों में रिश्वतखोरी की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं, जिसके कारण यह विभाग दूसरे स्थान पर पहुंच गया है।
पंचायती राज, पुलिस और सामान्य प्रशासन भी सूची में
निगरानी विभाग की रिपोर्ट बताती है कि पंचायती राज विभाग में 348, बिहार पुलिस में 288 तथा सामान्य प्रशासन विभाग में 251 अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज है और अदालत में चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है।इन आंकड़ों से साफ संकेत मिलता है कि भ्रष्टाचार की समस्या केवल किसी एक विभाग तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य के कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक विभाग इससे प्रभावित हैं।
अब प्रमोशन प्रक्रिया होगी आसान
इस सूची के जारी होने के बाद बिहार सरकार ने विभागीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक बदलाव भी किया है। अब विभागों को अपने अधिकारियों और कर्मचारियों की प्रोन्नति (Promotion) के लिए हर बार निगरानी विभाग से अलग से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होगी।
निगरानी विभाग पहले से ही वर्ष में दो बार जनवरी और जुलाई महीने में ऐसे अधिकारियों की अद्यतन सूची संबंधित विभागों को उपलब्ध कराता है। विभाग उसी सूची के आधार पर यह तय करेंगे कि संबंधित अधिकारी या कर्मचारी की सेवा संबंधी प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है या नहीं।
साल में दो बार जारी होती है सूची
निगरानी अन्वेषण ब्यूरो प्रत्येक वर्ष जनवरी और जुलाई में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की समीक्षा कर अद्यतन सूची जारी करता है। इसमें केवल उन्हीं अधिकारियों और कर्मचारियों के नाम शामिल किए जाते हैं जिनके खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद जांच पूरी हो चुकी हो और अदालत में चार्जशीट भी दाखिल कर दी गई हो। इस प्रक्रिया का उद्देश्य विभागों को समय पर जानकारी उपलब्ध कराना और सेवा संबंधी निर्णयों में पारदर्शिता बनाए रखना है।
भ्रष्टाचार पर निगरानी विभाग की लगातार कार्रवाई
बिहार में निगरानी विभाग समय-समय पर भ्रष्टाचार के खिलाफ विशेष अभियान चलाता है। रिश्वत लेने की शिकायत मिलने पर ट्रैप टीम जाल बिछाकर अधिकारियों और कर्मचारियों को रंगे हाथ गिरफ्तार करती है। पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा, बिजली, राजस्व, पुलिस, नगर निकाय, स्वास्थ्य, पंचायत और अन्य विभागों के कई अधिकारी रिश्वत लेते हुए पकड़े जा चुके हैं। गिरफ्तारी के बाद उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाता है और विभागीय कार्रवाई भी शुरू होती है।
पारदर्शिता और जवाबदेही पर सरकार का जोर
विशेषज्ञों का मानना है कि दागी अधिकारियों की सूची नियमित रूप से जारी करने से प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ेगी और विभागों को सेवा संबंधी निर्णय लेने में सुविधा होगी। हालांकि यह भी स्पष्ट किया गया है कि सूची में शामिल सभी मामलों का अंतिम फैसला अदालत द्वारा किया जाएगा। किसी भी अधिकारी या कर्मचारी के दोषी या निर्दोष होने का निर्णय न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही होगा।
फिलहाल निगरानी विभाग द्वारा जारी यह सूची बिहार के सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार की स्थिति का बड़ा संकेत मानी जा रही है। अब यह देखना होगा कि संबंधित विभाग इन मामलों में कितनी तेजी से विभागीय कार्रवाई करते हैं और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।




