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टपकती छत... जमीन पर बैठकर पढ़ते बच्चे, न बेंच-डेस्क न शौचालय; झोपड़ी में चल रहा सरकारी स्कूल

Bihar Government School: समस्तीपुर शहर के एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में बच्चों की बदहाल स्थिति सामने आई है। झोपड़ीनुमा कमरों में कक्षा 1 से 5 तक के बच्चे जमीन पर बैठकर पढ़ रहे हैं, जबकि स्कूल में बेंच-डेस्क, पंखे और शौचालय जैसी सुविधाएं..

टपकती छत... जमीन पर बैठकर पढ़ते बच्चे, न बेंच-डेस्क न शौचालय; झोपड़ी में चल रहा सरकारी स्कूल
Ramakant kumar
7 मिनट

Bihar Government School: समस्तीपुर शहर के बीएड कॉलेज मोहल्ले में सरकारी प्राथमिक विद्यालय की बदहाल व्यवस्था सामने आई है. यहां कक्षा एक से पांच तक के बच्चे झोपड़ीनुमा कमरों में जमीन पर बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं. स्कूल में बच्चों के बैठने के लिए पर्याप्त बेंच-डेस्क नहीं हैं. पंखे की व्यवस्था भी पर्याप्त नहीं है और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा तक उपलब्ध नहीं है. बारिश के दौरान कमरे की छत से पानी टपकने लगता है, जिसके कारण पढ़ाई प्रभावित होती है. वहीं, आसपास सांप निकलने की घटनाओं से बच्चों और उनके अभिभावकों में डर बना रहता है.


यह स्कूल समस्तीपुर शहर के बीएड कॉलेज मोहल्ले में सड़क किनारे संचालित हो रहा है. स्कूल में आसपास की दलित बस्ती के बच्चे बड़ी संख्या में पढ़ते हैं. आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह स्कूल बच्चों की पढ़ाई का मुख्य सहारा है. ऐसे में स्कूल की मौजूदा स्थिति को लेकर अभिभावक लगातार चिंता जता रहे हैं.


दो कमरों में चलती हैं पांच कक्षाएं

स्कूल में कक्षा एक से पांच तक की पढ़ाई के लिए महज दो कमरे हैं. एक कमरे में कक्षा एक, दो और तीन के बच्चों को एक साथ बैठाकर पढ़ाया जाता है, जबकि दूसरे कमरे में कक्षा चार और पांच की पढ़ाई होती है.


एक ही कमरे में अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों के बैठने से पढ़ाई का माहौल भी प्रभावित होता है. शिक्षक एक साथ कई कक्षाओं के बच्चों को संभालते हुए पढ़ाने की कोशिश करते हैं. बच्चों की संख्या बढ़ने पर जमीन पर बैठने की जगह भी कम पड़ जाती है और कई बच्चे फर्श पर बैठकर ही पढ़ाई करते हैं.


बेंच-डेस्क की कमी, जमीन पर बैठते हैं बच्चे

स्कूल में बच्चों के लिए पर्याप्त बेंच और डेस्क नहीं हैं. कई बच्चे जमीन पर बैठकर कॉपी-किताब खोलकर पढ़ते हैं. प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चों के लिए बैठने की उचित व्यवस्था नहीं होने से उन्हें रोजाना परेशानी का सामना करना पड़ता है.


स्कूल में पढ़ाई के लिए जरूरी अन्य सुविधाओं की स्थिति भी बेहतर नहीं है. बच्चों और शिक्षकों के लिए गर्मी के मौसम में कमरों के अंदर बैठना मुश्किल हो जाता है.


गर्मी में किताब से हवा करते हैं बच्चे

स्कूल में पंखों की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने के कारण गर्मी के दिनों में बच्चे और शिक्षक परेशान रहते हैं. गर्मी और उमस के बीच कई बच्चे अपनी कॉपी और किताब से हवा करते नजर आते हैं.


जिस समय बच्चों को शांत और सुविधाजनक माहौल में पढ़ाई करनी चाहिए, उस समय उन्हें गर्मी और उमस के बीच कक्षा में बैठना पड़ता है. शिक्षकों के लिए भी ऐसी स्थिति में अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को पढ़ाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है.


बारिश में टपकने लगती है छत

गर्मी के बाद बरसात के मौसम में स्कूल की समस्या और बढ़ जाती है. बारिश होने पर झोपड़ीनुमा कमरों की छत से पानी टपकने लगता है. ऐसे में बच्चों को बैठाकर पढ़ाना मुश्किल हो जाता है.


बारिश का पानी कमरे के अंदर आने से बच्चों की किताब-कॉपी भीगने का खतरा बना रहता है. कई बार ऐसी स्थिति में पढ़ाई रोकनी पड़ती है. स्कूल भवन की खराब स्थिति के कारण बरसात के मौसम में बच्चों और शिक्षकों दोनों को परेशानी उठानी पड़ती है.


शौचालय की सुविधा भी नहीं

स्कूल में बच्चों के लिए शौचालय की व्यवस्था भी नहीं है. प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने वाले छोटे बच्चों के लिए शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा जरूरी है, लेकिन इस स्कूल में यह सुविधा उपलब्ध नहीं है.


स्कूल परिसर की मौजूदा स्थिति को लेकर अभिभावक भी लगातार चिंता जता रहे हैं. उनका कहना है कि बच्चों को सुरक्षित और बेहतर माहौल में पढ़ाई की सुविधा मिलनी चाहिए.


सांप निकलने से बच्चों में डर

स्कूल की बदहाल संरचना के बीच आसपास सांप निकलने की घटनाएं भी बच्चों और अभिभावकों की चिंता बढ़ा रही हैं. स्थानीय लोगों के अनुसार, स्कूल के आसपास कई बार सांप देखे गए हैं.


झोपड़ीनुमा कमरों और खुले वातावरण के कारण बच्चों की सुरक्षा को लेकर अभिभावक चिंतित रहते हैं. छोटे बच्चों को स्कूल भेजते समय परिवारों को डर बना रहता है कि कहीं कोई अप्रिय घटना न हो जाए.


प्रधानाध्यापक बोले- अधिकारियों से कई बार की बात

स्कूल के प्रधानाध्यापक विश्वजीत झा ने बताया कि स्कूल की स्थिति को लेकर शिक्षा विभाग के अधिकारियों से कई बार बातचीत की गई है. उनके अनुसार, अधिकारियों की ओर से स्कूल को किसी दूसरे विद्यालय में विलय करने की बात भी कही गई है.


हालांकि, अभिभावक स्कूल को दूसरे स्थान पर मर्ज करने के पक्ष में नहीं हैं. प्रधानाध्यापक के मुताबिक, स्कूल में आसपास की दलित बस्ती के बच्चे बड़ी संख्या में पढ़ते हैं और उनके अभिभावक बच्चों को करीब दो किलोमीटर दूर दूसरे स्कूल में भेजने के लिए तैयार नहीं हैं.


अभिभावकों की मांग- इसी जगह बने पक्का स्कूल

अभिभावकों का कहना है कि वे अपने छोटे बच्चों को दूर स्थित स्कूल में रोजाना भेजने की स्थिति में नहीं हैं. परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हैं और बच्चों को करीब दो किलोमीटर दूर स्कूल भेजना उनके लिए परेशानी का कारण बनेगा.


अभिभावक चाहते हैं कि इसी स्थान पर स्कूल का पक्का भवन बनाया जाए और बच्चों के लिए बेंच-डेस्क, पंखा, शौचालय समेत अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं.


पूर्व डीएम ने जमीन देकर भवन निर्माण का दिया था निर्देश

प्रधानाध्यापक विश्वजीत झा के अनुसार, पूर्व जिलाधिकारी नवीन चंद्र झा ने स्कूल के लिए जमीन उपलब्ध कराकर भवन निर्माण कराने का निर्देश दिया था. लेकिन उनके मुताबिक, निर्देश के बावजूद स्कूल भवन का निर्माण नहीं हो सका.


प्रधानाध्यापक का कहना है कि कई अधिकारी आए और चले गए, लेकिन स्कूल के लिए जमीन और भवन की समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पाया. मौजूदा समय में भी बच्चे झोपड़ीनुमा कमरों में जमीन पर बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं.


शिक्षक बोले- परेशानियों के बावजूद पढ़ाई जारी रखने की कोशिश

स्कूल के शिक्षकों का कहना है कि सीमित संसाधनों के बावजूद बच्चों की पढ़ाई जारी रखने की कोशिश की जा रही है. अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को एक साथ पढ़ाना आसान नहीं है, लेकिन शिक्षक उपलब्ध संसाधनों के आधार पर बच्चों को पढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं.


शिक्षकों के अनुसार, स्कूल भवन और मूलभूत सुविधाओं की कमी के कारण बच्चों के साथ-साथ शिक्षकों को भी रोजाना कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है.