Bihar Politics : बिहार की राजनीति में हाल ही में हुए विधान परिषद चुनाव के बाद एक पुराना राजनीतिक वादा फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और वर्तमान राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री डॉ. दिलीप जायसवाल ने उपेंद्र कुशवाहा को विधान परिषद की सीट नहीं मिलने के सवाल पर ऐसा बयान दिया है, जिसने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। दिलीप जायसवाल ने साफ कहा कि-" अभी मैं प्रदेश अध्यक्ष के पद पर नहीं हूँ। इसलिए इस संबध में विस्तृत नहीं बता सकता हूँ। केंद्रीय नेतृत्व,उपेंद्र कुशवाहा जी की पार्टी और हमारे प्रदेश नेतृत्व के बीच क्या बात हुई है मुझे मालूम नहीं है। इसलिए बेहतर होगा की वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष से इस सवाल का जवाब लें।
दरअसल, बिहार विधान परिषद की खाली हुई नौ सीटों पर हाल ही में चुनाव संपन्न हुए। इन चुनावों में भाजपा और एनडीए के अन्य घटक दलों के बीच सीटों का बंटवारा हुआ, लेकिन सबसे अधिक चर्चा इस बात की रही कि राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा को एक भी सीट नहीं मिली। जबकि विधानसभा चुनाव के दौरान सीट बंटवारे की बातचीत में उन्हें भविष्य में विधान परिषद की एक सीट दिए जाने का आश्वासन मिलने की चर्चा लंबे समय से राजनीतिक हलकों में होती रही है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इसी भरोसे के आधार पर उपेंद्र कुशवाहा ने एनडीए के साथ अपनी राजनीतिक भूमिका तय की थी। इतना ही नहीं, राज्य में सरकार गठन के समय जब मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ तो उन्होंने अपने बेटे को मंत्री बनवाने का फैसला किया। माना जा रहा था कि जल्द ही विधान परिषद की सदस्यता मिलने के बाद मंत्री पद को लेकर किसी प्रकार की संवैधानिक बाधा नहीं आएगी। लेकिन समय बीतता गया और जब विधान परिषद की नौ सीटों पर उम्मीदवारों के नाम तय हुए तो कुशवाहा के हिस्से एक भी सीट नहीं आई।
यही वजह है कि अब भाजपा के पुराने वादे को लेकर सवाल उठने लगे हैं। विपक्षी दल तो इस मुद्दे को उठा ही रहे हैं, वहीं राजनीतिक विश्लेषक भी यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर वह आश्वासन क्यों पूरा नहीं हो सका। इसी संदर्भ में जब दिलीप जायसवाल से सवाल पूछा गया तो उन्होंने बड़ी सावधानी से जवाब देते हुए जिम्मेदारी वर्तमान नेतृत्व की ओर मोड़ दी।
उन्होंने कहा कि उस समय की परिस्थितियां अलग थीं और जो भी बातचीत या आश्वासन दिया गया था, वह संगठन और केंद्रीय नेतृत्व की सहमति से दिया गया था। लेकिन वर्तमान में पार्टी का नेतृत्व अलग है और फैसले लेने की प्रक्रिया भी वर्तमान नेतृत्व के हाथ में है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि किसी को इस विषय में जानकारी चाहिए तो वर्तमान भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी से सवाल करना चाहिए।
दिलीप जायसवाल का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उन्होंने न तो पुराने वादे से पूरी तरह इनकार किया और न ही वर्तमान फैसले का बचाव किया। उनके बयान से यह संकेत जरूर मिलता है कि भाजपा संगठन के भीतर समय के साथ राजनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव हुआ है। यही कारण है कि जिस आश्वासन की चर्चा कभी एनडीए की राजनीति में होती थी, वह अब अधूरा नजर आ रहा है।
अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा इस बात की है कि क्या भाजपा भविष्य में उपेंद्र कुशवाहा को किसी अन्य राजनीतिक पद या अवसर के जरिए संतुष्ट करने की कोशिश करेगी या फिर यह मुद्दा आगामी विधानसभा चुनाव तक एनडीए के भीतर असहजता का कारण बना रहेगा। फिलहाल दिलीप जायसवाल के बयान ने इस बहस को नई ऊर्जा दे दी है और बिहार की राजनीति में एक बार फिर सीट बंटवारे तथा राजनीतिक वादों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।





