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‘सिर्फ कागजात नहीं बल्कि हिंदू विवाह में रीति-रिवाजों का प्रमाण भी जरूरी’, पटना हाईकोर्ट का अहम फैसला

पटना हाईकोर्ट ने कहा कि केवल वोटर लिस्ट में पत्नी का नाम दर्ज होना या भरण-पोषण का आदेश मिलना हिंदू विवाह की वैधता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। हिंदू विवाह को वैध साबित करने के लिए आवश्यक रीति-रिवाज और रस्मों के संपन्न होने का प्रमाण जरूरी है।

Patna High Court
© File
Mukesh Srivastava
5 मिनट

Patna High Court: पटना हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह की वैधता को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल वोटर लिस्ट में पति-पत्नी के रूप में नाम दर्ज होना या भरण-पोषण का आदेश मिल जाना वैध हिंदू विवाह का निर्णायक प्रमाण नहीं है। विवाह हिंदू रीति-रिवाज और आवश्यक धार्मिक रस्मों के अनुसार संपन्न हुआ हो, इसका पर्याप्त प्रमाण देना जरूरी है। 



जहां विवाह में सप्तपदी जैसी रस्म आवश्यक हो, वहां उसके संपन्न होने का प्रमाण भी महत्वपूर्ण माना जाएगा। यह फैसला न्यायाधीश बिबेक चौधरी और न्यायाधीश राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने दुरगावती देवी की ओर से दायर अपील को खारिज करते हुए सुनाया। अदालत ने सिवान फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें दुरगावती देवी को सचिता चौधरी की कानूनी पत्नी मानने से इनकार किया गया था।



दरअसल, दुरगावती देवी की शादी 22 मई 1990 को सुरेश चौधरी से हुई थी। सुरेश चौधरी की 1997 में मौत हो गई। महिला का दावा था कि इसके बाद परिवार की सहमति और दबाव में उन्होंने सुरेश के छोटे भाई सचिता चौधरी से दूसरी शादी कर ली और दोनों पति-पत्नी के रूप में रहने लगे।



बाद में दुरगावती देवी ने सचिता चौधरी से भरण-पोषण की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया। इस मामले में उन्हें हर महीने एक हजार रुपये भरण-पोषण देने का आदेश दिया गया था। हालांकि, सचिता चौधरी ने दूसरी शादी होने से पूरी तरह इनकार किया। सीवान फैमिली कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा के बाद 26 फरवरी 2020 को दुरगावती देवी को सचिता चौधरी की कानूनी पत्नी मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद महिला ने इस फैसले को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी।



विवाह की रस्मों का नहीं मिला पर्याप्त प्रमाण

हाईकोर्ट ने मामले में पेश किए गए साक्ष्यों की विस्तृत समीक्षा की। अदालत ने पाया कि दुरगावती देवी अपने कथित दूसरे विवाह की तारीख, स्थान और विवाह के दौरान संपन्न हुई धार्मिक रस्मों का स्पष्ट विवरण नहीं दे सकीं।



महिला की ओर से पेश किए गए गवाह भी यह स्पष्ट रूप से नहीं बता सके कि कथित विवाह कब और कहां हुआ था तथा उसमें कौन-कौन सी धार्मिक रस्में निभाई गई थीं। किसी गवाह ने सप्तपदी या सिंदूरदान जैसी महत्वपूर्ण रस्मों का भी स्पष्ट उल्लेख नहीं किया।



अदालत ने यह भी पाया कि कथित विवाह में शामिल पुरोहित के नाम को लेकर गवाहों के बयानों में विरोधाभास था। इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माना कि कथित दूसरे विवाह के विधिवत संपन्न होने का पर्याप्त प्रमाण पेश नहीं किया गया।



वोटर लिस्ट में पत्नी का नाम होना पर्याप्त नहीं

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वोटर लिस्ट में किसी महिला का किसी व्यक्ति की पत्नी के रूप में दर्ज होना अपने आप में वैध विवाह का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। मामले में 2004 की वोटर लिस्ट में दुरगावती देवी का नाम सचिता चौधरी की पत्नी के रूप में दर्ज था। वहीं, 2009 की दूसरी वोटर लिस्ट में उन्हें उनके पहले पति सुरेश चौधरी की पत्नी बताया गया था। अदालत ने इन विरोधाभासी दस्तावेजों को वैध विवाह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना।



भरण-पोषण का आदेश भी विवाह की वैधता का अंतिम प्रमाण नहीं

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भरण-पोषण के मामले में दिया गया आदेश विवाह की वैधता को अंतिम रूप से तय नहीं करता। पीठ के अनुसार, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत कार्यवाही का मुख्य उद्देश्य जरूरतमंद व्यक्ति को भरण-पोषण उपलब्ध कराना होता है, न कि विवाह की वैधता का अंतिम निर्धारण करना। इसलिए पहले किसी मामले में भरण-पोषण मंजूर किए जाने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि संबंधित विवाह कानूनी रूप से वैध था।



हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 का दिया हवाला

हाईकोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 के तहत हिंदू विवाह को संबंधित पक्षों के समुदाय में प्रचलित रीति-रिवाज और आवश्यक रस्मों के अनुसार संपन्न होना चाहिए। जहां सप्तपदी विवाह की आवश्यक रस्म है, वहां उसके संपन्न होने का प्रमाण भी जरूरी होगा।



अदालत ने यह भी कहा कि केवल विवाह का पंजीकरण ऐसी मूल कमी को दूर नहीं कर सकता। विवाह को वैध साबित करने के लिए पहले यह स्थापित करना जरूरी है कि वह आवश्यक धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार विधिवत संपन्न हुआ था। अंततः पटना हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं पाया और दुरगावती देवी की अपील खारिज कर दी।

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FIRST BIHAR

FirstBihar संवाददाता