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Land For Jobs : सुप्रीम कोर्ट से लालू यादव को बड़ी राहत ! अब ‘लैंड फॉर जॉब्स’ केस ट्रायल में मिली अहम छूट; पढ़िए पूरी खबर

सुप्रीम कोर्ट ने लालू यादव को ‘लैंड फॉर जॉब्स’ मामले में राहत देते हुए ट्रायल के दौरान धारा 17A की वैधता पर सवाल उठाने की अनुमति दी है। साथ ही उन्हें व्यक्तिगत पेशी से भी छूट मिल गई है।

Land For Jobs : सुप्रीम कोर्ट से लालू यादव को बड़ी राहत ! अब ‘लैंड फॉर जॉब्स’ केस ट्रायल में मिली अहम छूट; पढ़िए पूरी खबर
Tejpratap
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Land For Jobs : सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव को ‘लैंड-फॉर-जॉब’ केस में बड़ी राहत दी है। अदालत ने उन्हें ट्रायल के दौरान भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act) की धारा 17A के लागू होने पर सवाल उठाने की अनुमति दे दी है। इसके साथ ही उन्हें ट्रायल कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होने से भी छूट मिल गई है।


यह फैसला जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने सुनाया। कोर्ट ने साफ कहा कि वह अभी इस बात पर कोई राय नहीं दे रही है कि धारा 17A इस मामले में लागू होती है या नहीं और क्या इसका इस्तेमाल पुराने मामलों पर हो सकता है। यानी कोर्ट ने इस मुद्दे को खुला छोड़ दिया है।


सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि लालू यादव ट्रायल कोर्ट में इस कानूनी सवाल को पूरी तरह से उठा सकते हैं और अपनी दलील रख सकते हैं। साथ ही कोर्ट ने यह भी साफ किया कि पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज की थी, लेकिन वह आदेश ट्रायल कोर्ट में इस मुद्दे को उठाने में रुकावट नहीं बनेगा।


इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि 2004 से 2009 के बीच की है, जब लालू यादव रेल मंत्री थे। सीबीआई का आरोप है कि उस दौरान रेलवे में ग्रुप-डी की भर्तियों के बदले उम्मीदवारों या उनके परिवार वालों से जमीन ली गई थी। यह जमीन बाद में लालू यादव के परिवार या उनसे जुड़ी एक कंपनी के नाम पर ट्रांसफर की गई।


सीबीआई का कहना है कि ये भर्तियां रेलवे के नियमों के हिसाब से नहीं की गई थीं और इसमें बड़े स्तर पर गड़बड़ी हुई। इस केस में 10 अक्टूबर 2022 को चार्जशीट दाखिल की गई थी, जिसमें लालू यादव के साथ उनकी पत्नी राबड़ी देवी, बेटी मीसा भारती समेत कुल 16 लोगों को आरोपी बनाया गया है।


सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने दलील दी कि धारा 17A सिर्फ उन मामलों में लागू होती है, जहां कोई अधिकारी सीधे तौर पर फैसला लेने या सिफारिश करने की स्थिति में हो। उनका कहना था कि लालू यादव उस समय सीधे निर्णय लेने वाले अधिकारी नहीं थे, इसलिए उनके मामले में पहले से अनुमति लेने की जरूरत नहीं थी।


उन्होंने यह भी कहा कि इस केस में 30 से ज्यादा अधिकारियों के खिलाफ पहले ही मंजूरी ली जा चुकी है, इसलिए अगर लालू यादव के लिए भी जरूरी होती तो वह भी ली जाती। लेकिन कोर्ट ने इस तर्क पर सवाल भी उठाए। जस्टिस सुंदरेश ने पूछा कि अगर यह माना जाए कि मंत्री ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया, तो फिर यह कैसे तय होगा कि वह फैसले में शामिल थे या नहीं। कोर्ट ने यह संकेत दिया कि सिर्फ पद देखकर मामला पूरी तरह तय नहीं किया जा सकता।


वहीं लालू यादव की तरफ से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि हाई कोर्ट ने जो फैसला दिया था, वह इस मामले से अलग था। उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट ने धारा 17A को भविष्य में लागू होने वाला माना था, इसलिए 2004-2009 के पुराने मामलों पर यह लागू नहीं हो सकता।


सिब्बल ने यह भी कहा कि आरोप खुद बताते हैं कि अगर कोई प्रभाव डाला गया था, तो वह उनके आधिकारिक काम से जुड़ा था, इसलिए जांच से पहले अनुमति जरूरी थी। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अंतिम चार्जशीट 2025 में दाखिल होने के बाद ही यह मुद्दा क्यों उठाया गया।


हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी दलीलों के गुण-दोष पर अभी कोई फैसला नहीं दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि इन सभी सवालों की गहराई से जांच अब ट्रायल कोर्ट करेगा।अब इस आदेश के बाद मामला ट्रायल कोर्ट में आगे बढ़ेगा, जहां यह तय होगा कि धारा 17A इस केस में लागू होती है या नहीं और इसका असर पूरे मुकदमे पर क्या पड़ेगा। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को लालू यादव के लिए एक बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है।