1st Bihar Published by: First Bihar Updated Mar 02, 2026, 7:35:48 AM
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Holika Dahan 2026 : माघ नक्षत्र और सुकर्मा योग के अनुसार इस वर्ष होलिका दहन का पर्व 2 मार्च सोमवार की रात विशेष शुभ मुहूर्त में मनाया जाएगा। फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा की तिथि दो दिन होने के कारण होलिका दहन के अगले दिन यानि 4 मार्च बुधवार को होली का पर्व भी मनाया जाएगा। ज्योतिषीय दृष्टि से भद्रा के पुच्छ काल में 2 मार्च की देर रात 12:50 बजे से 2:02 बजे तक होलिका दहन किया जाएगा, जिसे शास्त्र सम्मत शुभ समय माना गया है।
होलिका दहन का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। इस दिन श्रद्धालु होलिका की पूजा करते हुए अपने अंदर के राग, द्वेष, क्लेश और दुःख को इस अग्नि में समर्पित कर उन्हें समाप्त करने की प्रार्थना करते हैं। होलिका की पूजा के समय "ॐ होलिकायै नमः" मंत्र का उच्चारण करना अनिष्ट कारक दोष के नाश का उपाय माना गया है।
शास्त्रों के अनुसार होलिका दहन के लिए तीन मुख्य नियम हैं – पहला पूर्णिमा तिथि का होना, दूसरा भद्रा का होना और तीसरा रात का समय। इस वर्ष 2 मार्च की शाम 5:18 बजे के बाद पूर्णिमा तिथि प्रारंभ होगी और यह 3 मार्च की शाम 4:33 बजे तक रहेगी। वहीं भद्रा की स्थिति 2 मार्च की शाम 5:18 बजे से 3 मार्च की सुबह 4:56 बजे तक रहेगी। चूंकि भद्रा और पूर्णिमा दोनों की स्थिति रात में एक साथ हैं, इसलिए शास्त्रानुसार भद्रा के पुच्छ भाग यानी 12:50 बजे से 2:02 बजे तक का समय होलिका दहन के लिए अत्यंत शुभ माना गया है।
होलिका दहन का धार्मिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक, पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व है। आचार्य राकेश झा के अनुसार होलिका बुराई पर अच्छाई का प्रतीक है, इसलिए इसे शास्त्र सम्मत विधि से जलाना आवश्यक है। होलिका जलने से नकारात्मक ऊर्जा का ह्रास होता है और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है।
इस दिन होलिका में केवल शुद्ध और पवित्र वस्तुएं ही डालनी चाहिए। इसमें आम की लकड़ी, धूप, गुगुल, धूमन, जटामसी, कर्पूर, गोबर के उपले, तिल, चंदन की लकड़ी जैसी शुभतादायी सामग्री का उपयोग करना चाहिए। इस प्रकार की सामग्री से होलिका का प्रभाव अधिक शुभ और कल्याणकारी माना जाता है।
होलिका की पूजा विधिवत करने से घर-परिवार में सुख-शांति बढ़ती है, समृद्धि आती है और नकारात्मकता का नाश होता है। पूजा में अक्षत, गंगाजल, रोली-चंदन, मौली, हल्दी, दीपक और मिष्ठान का प्रयोग कर, पूजा के पश्चात होलिका में आटा, गुड़, कर्पूर, तिल, धूप, गुगुल, जौ, घी, आम की लकड़ी और गाय के गोबर से बने उपले डालकर सात बार परिक्रमा करना शुभ माना गया है।
होलिका के जलने के बाद उसमें चना या गेहूं की बाली सेंककर प्रसाद स्वरूप ग्रहण करना स्वास्थ्यवर्धक और आयु बढ़ाने वाला माना गया है। इसके सेवन से रोग-शोक दूर होते हैं और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
विशेष रूप से होलिका दहन की भस्म का महत्व भी अत्यधिक है। ज्योतिषी राकेश झा के अनुसार इस भस्म को पवित्र माना जाता है। होली के दिन संध्या बेला में इसका टीका लगाने से सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और आयु में वृद्धि होती है। साथ ही इस दिन ईश्वर से नई फसल की खुशहाली और समृद्धि की कामना भी की जाती है। भस्म के सेवन से शरीर में रोगों की संभावना कम होती है और घर में माता अन्नपूर्णा की कृपा बनी रहती है।
इस प्रकार होलिका दहन केवल एक पारंपरिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह आध्यात्मिक शुद्धि, सामाजिक समरसता और प्राकृतिक ऊर्जा संतुलन का प्रतीक भी है। श्रद्धालु इस दिन विधिवत पूजा और अग्नि प्रयोग करके अपने जीवन में सकारात्मकता, स्वास्थ्य और समृद्धि को आमंत्रित कर सकते हैं।