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अब नया कहर: ब्लैक फंगस से कई गुणा खतरनाक व्हाइट फंगस फैलने लगा है, 4 मरीजों की पहचान हुई

PATNA : कोरोना की भीषण महामारी के बीच नयी आफत सामने आ गयी है. ब्लैक फंगस के बाद अब व्हाइट फंगस के मरीज मिलने लगे हैं. ये व्हाइट फंगस ब्लैक फंगस की तुलना में कई गुणा ज्यादा खतरनाक ह

अब नया कहर: ब्लैक फंगस से कई गुणा खतरनाक व्हाइट फंगस फैलने लगा है, 4 मरीजों की पहचान हुई
Santosh Singh
3 मिनट

PATNA : कोरोना की भीषण महामारी के बीच नयी आफत सामने आ गयी है. ब्लैक फंगस के बाद अब व्हाइट फंगस के मरीज मिलने लगे हैं. ये व्हाइट फंगस ब्लैक फंगस की तुलना में कई गुणा ज्यादा खतरनाक है. पटना में  इसके चार मरीज पाये जा चुके हैं. 

क्या है व्हाइट फंगस

व्हाइट फंगस को मेडिकल टर्म में कैंडिडोसिस भी कहते हैं. ये बेहद खतरनाक है. व्हाइट फंगस फेफडों के संक्रमण का मुख्य कारण है. इसका असर सिर्फ फेफडों पर ही नहीं पड़ता. ये बीमारी फेफड़ों के साथ साथ त्वचा, मुंह के अंदर के भाग, किडनी, आंत, ब्रेन, प्राइवेट पार्ट्स और नाखून को भी संक्रमित कर दे सकता है. इलाज में देर हुई तो फिर मरीजों की जान पर गंभीर संकट खडा हो जाता है. 

कोरोना जैसे लक्षण लक्षण पर टेस्ट निगेटिव

पीएमसीएच के माइक्रोब़ायोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ एस एन सिंह ने बताया कि उनके संस्थान में ऐसे चार मरीज मिल चुके हैं जो व्हाइट फंगस के शिकार थे. उनमें कोरोना जैसे लक्षण थे लेकिन वे कोरोना पॉजिटिव नहीं थे. इन मरीजों का रैपिड एंटीजेन टेस्ट, RT-PCR और एंटीबॉडी टेस्ट किया गया तो वे कोरोना निगेटिव पाये गये. लेकिन फेफडा संक्रमित था. जांच पड़ताल के बाद उन्हें जब एंटी फंगल दवा दी गयी तो वे ठीक हो गये. 

व्हाइट फंगल का शिकार बनने वालों में पटना के बड़े सर्जन भी शामिल हैं. उन्हें कोरोना जैसे लक्षण के बाद एक निजी अस्पताल के कोविड वार्ड में भर्ती कराया गया था. उनका ऑक्सीजन लेवल कम हो गया था. लेकिन जब जांच हुई औऱ उन्हें एंटी फंगल दवा दी गयी तो ऑक्सीजन लेवल सुधर कर 95 हो गया. 

व्हाइट फंगस से बचने के लिए क्या करें

अस्पतालों में भर्ती होने वाले जिन मरीजों के कोरोना टेस्ट निगेटिव हों लेकिन फेफड़ों में इंफेक्शन हो यानि HRCT में कोरोना जैसे लक्षण मिले उनकी सही से जांच की जानी चाहिये. उनके बलगम का फंगस कल्चर होना चाहिये. ताकि शरीर में फंगस का पता चल पाये. ऐसी हालत वाले मरीज अगर ऑक्सीजन या वेंटीलेटर सपोर्ट पर हैं तो उनके ऑक्सीजन या वेंटीलेटर मशीन को जीवाणु मुक्त होना चाहिये. आक्सीजन सिलेंडर ह्मूडिफायर में स्ट्रेलाइज वाटर का उपयोग करना चाहिये. मरीजों को जो ऑक्सीजन सिलेंडर लगाया जाये वह जीवाणु मुक्त हो.

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