BIHAR TEACHER NEWS : बिहार के विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के अंतर-विश्वविद्यालय स्थानांतरण को लेकर लंबे समय से चल रही असमंजस की स्थिति अब खत्म होने वाली है। राज्यपाल एवं कुलाधिपति सैयद अता हसनैन के निर्देश पर राज्य के 13 विश्वविद्यालयों में सहायक प्रोफेसर से लेकर प्रोफेसर स्तर तक के शिक्षकों के ट्रांसफर के लिए नई नीति जल्द लागू की जाएगी। इस दिशा में पहल करते हुए राज्यपाल सचिवालय ने चार सदस्यीय कमेटी का गठन कर दिया है, जो स्थानांतरण से जुड़े विभिन्न पहलुओं का अध्ययन कर अपनी अनुशंसा देगी।
गठित कमेटी की अध्यक्षता प्रमेंद्र कुमार वाजपेयी करेंगे, जो जय प्रकाश विश्वविद्यालय के कुलपति हैं। वहीं, कमेटी में उच्च शिक्षा निदेशक एन.के. अग्रवाल को सदस्य बनाया गया है। पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के कुलसचिव अबू बकर को सदस्य सचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसके अलावा बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग के अध्यक्ष गिरिश कुमार चौधरी को आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल किया गया है।
राज्यपाल के सचिव गोपाल मीणा द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, यह कमेटी स्थानांतरण प्रक्रिया को पारदर्शी, निष्पक्ष और व्यवस्थित बनाने के लिए ठोस सुझाव देगी। विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया गया है कि नई नीति लागू होने के बाद विश्वविद्यालयों के बीच शिक्षकों के स्थानांतरण में आरक्षण रोस्टर का किसी भी स्थिति में उल्लंघन नहीं होगा। इससे सामाजिक न्याय और संवैधानिक प्रावधानों का पालन सुनिश्चित किया जा सकेगा।
बताया गया है कि बिहार लोक भवन के विश्वविद्यालय शाखा ने इस कमेटी को विभिन्न पहलुओं पर अध्ययन कर एक माह के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। रिपोर्ट मिलने के बाद कुलाधिपति द्वारा अंतिम निर्णय लिया जाएगा और उसी आधार पर नई स्थानांतरण नीति को लागू किया जाएगा।
हालांकि, राज्य के सभी विश्वविद्यालय इस नीति के दायरे में नहीं आएंगे। पटना विश्वविद्यालय, आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय, बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय और बिहार कृषि विश्वविद्यालय को इस नीति से बाहर रखा गया है। दरअसल, इन विश्वविद्यालयों के अपने अलग अधिनियम हैं, जो राज्य विधानमंडल द्वारा पारित किए गए हैं, इसलिए उन पर इस नई नीति का सीधा प्रभाव नहीं पड़ेगा।
नई नीति के लागू होने से विश्वविद्यालयों के बीच शिक्षकों के स्थानांतरण को लेकर बनी कई विसंगतियों के दूर होने की उम्मीद जताई जा रही है। अभी तक स्पष्ट नियमों के अभाव में कई बार शिक्षकों को स्थानांतरण में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था, वहीं कुछ मामलों में पारदर्शिता को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम उच्च शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में अहम साबित होगा। इससे न केवल शिक्षकों के बीच संतुलित वितरण सुनिश्चित होगा, बल्कि विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक गुणवत्ता में भी सुधार आएगा। अब सबकी निगाहें कमेटी की अनुशंसाओं पर टिकी हैं, जो आने वाले समय में बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था की दिशा तय करेंगी।






