पटना: बिहार में शिक्षक नियुक्ति परीक्षा-3 (TRE-3) के तहत नियुक्त शिक्षकों के बीच शिक्षा विभाग के एक आदेश से हड़कंप मच गया है। राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (NIOS) से 18 महीने का D.El.Ed प्रशिक्षण लेने वाले शिक्षकों की नियुक्ति पर सवाल खड़ा हो गया है। विभाग ने साफ किया है कि NIOS से प्राप्त 18 महीने का D.El.Ed प्रमाणपत्र विद्यालय अध्यापक के पद पर नियुक्ति के लिए मान्य नहीं है। ऐसे में इस प्रमाणपत्र के आधार पर नियुक्त शिक्षकों की सेवा समाप्त करने की कार्रवाई की जा सकती है।
मामला सामने आने के बाद शिक्षा विभाग से लेकर शिक्षक अभ्यर्थियों तक हलचल तेज हो गई है। खास बात यह है कि पटना जिला शिक्षा पदाधिकारी कार्यालय ने 20 अगस्त को जिले के सभी प्रखंड शिक्षा पदाधिकारियों (BEO), विद्यालय अवर निरीक्षकों और चिह्नित मध्य विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों को पत्र भेजकर ऐसे शिक्षकों की जानकारी मांगी है।
18 महीने के D.El.Ed पर विभाग का बड़ा फैसला
पटना डीईओ कार्यालय के पत्र में प्राथमिक शिक्षा निदेशालय की ओर से 22 जून को जारी निर्देश का हवाला दिया गया है। निदेशालय ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि NIOS से किया गया 18 महीने का D.El.Ed प्रशिक्षण विद्यालय अध्यापक के पद पर नियुक्ति के लिए मान्य नहीं माना जाएगा।
इसी निर्देश के आधार पर अब पटना जिले में ऐसे शिक्षकों की पहचान शुरू कर दी गई है। संबंधित अधिकारियों और प्रधानाध्यापकों से निर्धारित प्रपत्र में शिक्षकों की पूरी जानकारी उपलब्ध कराने को कहा गया है। विभागीय स्तर पर सूची तैयार होने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।
पत्र में यह भी स्पष्ट संकेत दिया गया है कि जांच और जानकारी संकलित होने के बाद ऐसे शिक्षकों की सेवा समाप्त करने की कार्रवाई की जा सकती है। इस निर्देश ने उन शिक्षकों की चिंता बढ़ा दी है, जो TRE-3 के जरिए नियुक्त होकर विद्यालयों में अपनी सेवा दे रहे हैं।
नियुक्ति के बाद अब नौकरी पर तलवार
शिक्षक नियुक्ति प्रक्रिया पूरी होने और नौकरी मिलने के बाद अब योग्यता प्रमाणपत्र की वैधता को लेकर कार्रवाई की तैयारी ने पूरे मामले को गंभीर बना दिया है। प्रभावित शिक्षकों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि नियुक्ति के समय उनके प्रमाणपत्र को स्वीकार किया गया था तो अब सेवा के दौरान उसकी वैधता पर सवाल क्यों उठाया जा रहा है।
फिलहाल विभाग ने शिक्षकों का विवरण जुटाने की प्रक्रिया शुरू की है। इसके बाद संबंधित प्रमाणपत्रों और नियुक्ति से जुड़े रिकॉर्ड की जांच के आधार पर कार्रवाई आगे बढ़ने की संभावना है। विभाग के इस कदम से अन्य जिलों में भी ऐसे शिक्षकों के बीच चिंता बढ़ सकती है।
दूसरी तरफ पटना में सड़क पर उतरे PhD शोधार्थी
शिक्षा जगत से जुड़ा दूसरा बड़ा घटनाक्रम शनिवार को पटना में देखने को मिला। सहायक प्राध्यापक बहाली में UGC Regulation-2018 के Table 3-A को लागू करने समेत छह सूत्री मांगों को लेकर PhD शोधार्थी और सहायक प्राध्यापक अभ्यर्थी सड़क पर उतर आए।
अभ्यर्थियों ने वीर कुंवर सिंह पार्क से लोक भवन की ओर मार्च निकाला। हालांकि आर ब्लॉक के पास पुलिस ने बैरिकेडिंग कर मार्च को रोक दिया। प्रदर्शनकारी आगे बढ़ने की कोशिश करते रहे, जबकि पुलिस ने उन्हें आगे जाने की अनुमति नहीं दी। इस दौरान दोनों पक्षों के बीच नोकझोंक भी हुई। प्रदर्शन को देखते हुए आर ब्लॉक और आसपास के इलाकों में बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया था। अभ्यर्थियों के साथ गाड़ियां भी मार्च में शामिल थीं। छात्र-युवा संघर्ष मोर्चा ने भी आंदोलन को समर्थन दिया।
छह सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने सौंपा ज्ञापन
आर ब्लॉक पर प्रदर्शन रोके जाने के बाद छह सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल को मुख्यमंत्री सचिवालय ले जाया गया। प्रतिनिधिमंडल में राधेश्याम, आसिफ अली, कुंदन कुमार और मोनू कुमार समेत अन्य सदस्य शामिल रहे। प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री सचिवालय के संयुक्त सचिव को छह सूत्री मांगों से संबंधित ज्ञापन सौंपा। प्रतिनिधिमंडल को आश्वासन दिया गया कि उनकी मांगों को संबंधित वरीय अधिकारियों तक पहुंचाया जाएगा और आवश्यक कार्रवाई के लिए पहल की जाएगी।
प्रदर्शन में कांग्रेस नेता सुशील कुमार, एसएसएआई के लारायब अकरम, एआईएसएफ के सुधीर कुमार, आइसा सचिव दीपांकर, डीवाईएफआई के आसिफ अली, एनएसयूआई की भाग्य भारती, द ग्रेट भीम आर्मी के अमर आजाद, एआईवाईएफ के शम्भू देवा, युवा कांग्रेस के संस्कार राय, सोशल जस्टिस आर्मी के अम्बुज पटेल और दिशा के अजीत आलोक तिवारी सहित कई लोग मौजूद रहे।
बिहार में एक तरफ नियुक्त शिक्षकों की योग्यता को लेकर विभाग सख्ती दिखा रहा है, तो दूसरी तरफ सहायक प्राध्यापक अभ्यर्थी अपनी नियुक्ति और नियमों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। ऐसे में शिक्षा और नियुक्ति से जुड़े दोनों मामलों पर अब सरकार और विभाग के अगले कदम पर सबकी नजर है।





