बिहार की राजनीति में चुनाव खत्म होते ही नई सियासी कहानी शुरू हो गई है। इस बार मामला विधानसभा चुनाव का नहीं, बल्कि विधान परिषद यानी MLC चुनाव का है। चुनाव में JDU को तीन सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। लेकिन पार्टी की परेशानी सिर्फ हार तक सीमित नहीं है। असली चर्चा तब शुरू हुई, जब JDU उम्मीदवारों को हराने वाले दो निर्दलीय MLC चुनाव परिणाम आने के बाद BJP के नेताओं के साथ नजर आए। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मुलाकात हुई, BJP के कार्यक्रम में स्वागत हुआ और फिर दोनों ने NDA सरकार को समर्थन देने का ऐलान कर दिया।
अब सवाल उठ रहा है कि क्या NDA के भीतर सबकुछ ठीक चल रहा है? क्या चुनाव के दौरान JDU को उसके सहयोगी दलों का अपेक्षित साथ नहीं मिला? और क्या चुनाव जीतने के बाद BJP के करीब पहुंचे निर्दलीय MLC ने गठबंधन की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है? इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए बिहार की मौजूदा सियासत को 2020 के विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखना जरूरी हो गया है।
तीन सीटों पर हार, JDU के लिए क्यों बढ़ी मुश्किल?
सबसे पहले चुनावी गणित समझिए। बिहार विधान परिषद की आठ सीटों के लिए हुए चुनाव में NDA के भीतर BJP और JDU के बीच चार-चार सीटों का बंटवारा हुआ था। यानी दोनों दलों को अपने-अपने हिस्से की चार सीटों पर उम्मीदवार उतारने थे। लेकिन नतीजे आए तो JDU को सिर्फ एक सीट पर जीत मिली, जबकि तीन सीटों पर पार्टी के उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा।
इनमें दो सीटों के नतीजे सबसे ज्यादा चर्चा में रहे। सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में निर्दलीय उम्मीदवार राहुल राज ने JDU के आनंद पुष्कर को 1,815 वोटों से हरा दिया। वहीं तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में निर्दलीय बंशीधर ब्रजवासी ने JDU के अभिषेक झा को 9,147 वोटों के बड़े अंतर से शिकस्त दी। ब्रजवासी ने लगातार दूसरी बार इस सीट पर जीत दर्ज की।
अब जरा इस राजनीतिक घटनाक्रम पर गौर कीजिए। एक तरफ JDU के आधिकारिक उम्मीदवार चुनाव हार रहे थे, दूसरी तरफ NDA के ही एक घटक दल BJP से जुड़े रहे नेता निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत हासिल कर रहे थे। चुनाव के बाद यही दोनों नेता BJP के कार्यक्रम में पहुंच गए। ऐसे में JDU के भीतर सवाल उठना स्वाभाविक था कि आखिर गठबंधन के चुनावी तालमेल में कमी कहां रह गई?
जिसने JDU को हराया, वह BJP के मंच पर कैसे पहुंचा?
इस पूरे मामले में राहुल राज की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी महत्वपूर्ण है। राहुल राज पहले BJP से जुड़े हुए थे। लेकिन जब सारण शिक्षक सीट NDA के सीट बंटवारे में JDU के खाते में चली गई तो उन्हें गठबंधन का आधिकारिक टिकट नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने का फैसला किया। पार्टी के फैसले के खिलाफ चुनाव लड़ने के कारण BJP ने उन्हें छह साल के लिए निष्कासित कर दिया था।
दूसरी तरफ बंशीधर ब्रजवासी पहले भी तिरहुत स्नातक सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत चुके थे। इस बार भी उन्होंने JDU के अभिषेक झा को हराकर अपनी सीट बरकरार रखी। चुनाव परिणाम आने के बाद 31 अक्टूबर को दोनों नेता BJP के कार्यक्रम में पहुंचे। यहां मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, BJP प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से उनकी मुलाकात हुई। BJP विधायक दल की बैठक में भी दोनों की मौजूदगी रही। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू हो गई कि राहुल राज और बंशीधर ब्रजवासी BJP में शामिल हो गए हैं।
हालांकि, 1 नवंबर को दोनों नेताओं ने औपचारिक सदस्यता लेने की बात से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि उन्होंने BJP की सदस्यता नहीं ली है, बल्कि NDA सरकार को अपना समर्थन दिया है। BJP प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने भी इसी बात की पुष्टि की। यानी दोनों निर्दलीय MLC का BJP में औपचारिक प्रवेश नहीं हुआ, लेकिन उनका NDA सरकार के समर्थन में आना अपने आप में राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है।
JDU की नाराजगी की असली वजह क्या है?
अब सवाल है कि JDU के नेताओं को परेशानी किस बात से है? क्या सिर्फ इस बात से कि दो निर्दलीय MLC BJP के करीब पहुंच गए या फिर चुनाव के दौरान भी गठबंधन के भीतर कुछ ऐसा हुआ, जिससे पार्टी के उम्मीदवारों को नुकसान उठाना पड़ा?
दरअसल, JDU नेताओं की नाराजगी का एक बड़ा कारण चुनाव प्रचार के दौरान कथित तौर पर अपेक्षित सहयोग नहीं मिलना है। पार्टी के नेताओं का आरोप है कि NDA की बैठकों में साझा प्रचार, मतदाताओं तक पहुंच और उम्मीदवारों के पक्ष में BJP नेताओं की सक्रियता को लेकर रणनीति बनी थी। लेकिन जमीनी स्तर पर उस रणनीति का पूरी तरह पालन नहीं हुआ।
सारण शिक्षक सीट से चुनाव हारे आनंद पुष्कर ने भी सार्वजनिक रूप से गठबंधन धर्म का सवाल उठाया था। उन्होंने कुछ BJP नेताओं की भूमिका पर सवाल खड़े किए और आरोप लगाया कि चुनाव के दौरान जो भरोसा दिया गया था, उसे पूरा नहीं किया गया। पुष्कर के मुताबिक, मौजूदा MLC को चुनाव नहीं लड़ने के लिए मनाने की बात कही गई थी। साथ ही NDA की बैठक में साझा प्रचार की रणनीति भी बनी थी। लेकिन चुनाव के दौरान उन्हें वैसा सहयोग नहीं मिला, जिसकी उम्मीद की गई थी।
हालांकि, ये आरोप JDU नेताओं की ओर से लगाए गए हैं। BJP की ओर से इन आरोपों पर अलग-अलग राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं। ऐसे में पूरे मामले को गठबंधन के भीतर उठे सवालों के तौर पर देखना ज्यादा उचित होगा।
क्या 2020 की कहानी फिर दोहराई जा रही है?
बिहार की राजनीति में जब भी JDU और BJP के बीच चुनावी तालमेल पर सवाल उठते हैं, तो 2020 का विधानसभा चुनाव याद आ जाता है। उस समय चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) NDA से अलग होकर चुनाव मैदान में उतरी थी। हालांकि, चिराग पासवान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति अपना समर्थन जताया था, लेकिन नीतीश कुमार और JDU के खिलाफ उम्मीदवार उतारे थे। दिलचस्प बात यह थी कि BJP के कई बागी नेता भी LJP के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे।
उस चुनाव में JDU नेताओं ने आरोप लगाया था कि LJP और BJP के बागी उम्मीदवारों की वजह से उनकी पार्टी को नुकसान हुआ। चुनाव परिणाम में BJP को 74 सीटें मिली थीं, जबकि JDU सिर्फ 43 सीटों पर सिमट गई थी।इसके बाद NDA के भीतर राजनीतिक शक्ति संतुलन को लेकर चर्चाएं तेज हो गई थीं। JDU के नेताओं की नाराजगी भी सामने आई थी। अब 2026 के MLC चुनाव के बाद एक बार फिर सहयोगियों की भूमिका चर्चा में है। फर्क सिर्फ इतना है कि 2020 में LJP NDA से बाहर रहकर चुनाव लड़ रही थी, जबकि इस बार BJP और JDU दोनों NDA सरकार में सहयोगी हैं। इसलिए दोनों घटनाओं को पूरी तरह एक जैसा नहीं कहा जा सकता। फिर भी चुनावी तालमेल और आपसी भरोसे का सवाल दोनों परिस्थितियों में मौजूद है।
BJP को फायदा, JDU के सामने संगठन संभालने की चुनौती?
राजनीतिक नजरिए से देखें तो दो निर्दलीय MLC का NDA सरकार को समर्थन देना BJP के लिए परिषद में संख्यात्मक रूप से मददगार हो सकता है। लेकिन JDU के लिए यह घटनाक्रम कई सवाल छोड़ गया है। आखिर जिन सीटों पर गठबंधन के आधिकारिक उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे थे, वहां निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत कैसे हासिल की? क्या स्थानीय स्तर पर NDA के कार्यकर्ता एकजुट होकर प्रचार नहीं कर पाए? क्या उम्मीदवारों के चयन में कोई कमी रह गई थी? या फिर मतदाताओं के बीच निर्दलीय उम्मीदवारों की अपनी मजबूत पकड़ ने चुनावी समीकरण बदल दिया?
इन सवालों पर दोनों दलों को मंथन करना पड़ सकता है। क्योंकि MLC चुनाव भले ही विधानसभा चुनाव जैसा बड़ा राजनीतिक मुकाबला नहीं होता, लेकिन इसके नतीजे दलों के संगठन और गठबंधन के आपसी तालमेल की तस्वीर जरूर दिखाते हैं।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल निगाहें BJP और JDU के शीर्ष नेतृत्व पर टिकी हैं। क्या JDU इस मुद्दे को NDA की बैठक में उठाएगी? क्या BJP नेतृत्व अपने सहयोगी दल की नाराजगी दूर करने के लिए कोई पहल करेगा? क्या दोनों निर्दलीय MLC भविष्य में BJP के साथ औपचारिक रूप से जुड़ेंगे या उनका समर्थन सिर्फ NDA सरकार तक सीमित रहेगा?इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति की दिशा को समझने में अहम हो सकते हैं।
फिलहाल इतना साफ है कि MLC चुनाव के नतीजों ने NDA के भीतर चुनावी तालमेल, सहयोगियों की भूमिका और आपसी भरोसे पर नई बहस शुरू कर दी है। 2020 में भी JDU ने सहयोगियों और बागी उम्मीदवारों की भूमिका पर सवाल उठाए थे और अब 2026 में MLC चुनाव के बाद फिर वैसी ही चर्चाएं सुनाई दे रही हैं।
बड़ा सवाल यही है कि क्या NDA इस घटनाक्रम को सिर्फ एक चुनावी विवाद मानकर आगे बढ़ जाएगा या फिर गठबंधन के भीतर सहयोग और भरोसे की शर्तों पर नए सिरे से बातचीत होगी? बिहार की सियासत में फिलहाल इस सवाल का जवाब बाकी है।





