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Bihar MLC Election 2026 : स्कूलों से MLC चुनाव की सियासी पाठशाला! विद्यालय प्रबंधन समितियों पर टिकी नेताओं की नजर, विधायकों को मिला खास टास्क

बिहार में 23 अक्टूबर को होने वाले MLC चुनाव से पहले NDA ने नई रणनीति तैयार की है। सम्राट चौधरी के निर्देश पर विधायक विद्यालय प्रबंधन समितियों और स्कूलों के जरिए शिक्षक व स्नातक मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने की तैयारी में जुट गए हैं।

Bihar MLC Election 2026
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Tejpratap
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पटना: बिहार में शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों से विधान परिषद पहुंचने की तैयारी कर रहे नेताओं की नजर अब सिर्फ मतदाताओं की सूची पर नहीं, बल्कि स्कूलों तक पहुंच बनाने पर भी टिक गई है। 23 अक्टूबर को होने वाले मतदान से पहले एनडीए ने शिक्षक और स्नातक मतदाताओं के बीच संपर्क मजबूत करने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। इसके लिए विद्यालय प्रबंधन समितियों को भी स्थानीय स्तर पर संवाद के एक अहम माध्यम के तौर पर देखा जा रहा है।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के निर्देश के बाद एनडीए विधायकों को अपने-अपने क्षेत्रों में स्कूलों और शिक्षकों से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय होने का टास्क दिया गया है। विधायकों से कहा गया है कि वे क्षेत्र में मौजूद रहें, शिक्षकों और विद्यालयों से जुड़े लोगों से संवाद बढ़ाएं और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाएं।

स्कूलों के जरिए मतदाताओं तक पहुंचने की तैयारी

शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव में मतदाताओं की संख्या भले ही सामान्य विधानसभा चुनाव की तुलना में कम हो, लेकिन यहां हर मतदाता का महत्व काफी ज्यादा होता है। यही वजह है कि चुनाव से पहले राजनीतिक दल और उम्मीदवार एक-एक मतदाता तक पहुंच बनाने की कोशिश में जुटे हैं।

एनडीए की रणनीति में स्थानीय विधायक महत्वपूर्ण कड़ी बन सकते हैं। अपने क्षेत्र के विद्यालयों से जुड़े लोगों के साथ बैठक, स्कूलों की समस्याओं पर चर्चा और शिक्षकों से संवाद के जरिए विधायक उन मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिनका असर विधान परिषद चुनाव के परिणाम पर पड़ सकता है।

बताया जा रहा है कि स्नातक मतदाताओं के प्रभाव वाले इलाकों में औसतन 250 से 275 विद्यालयों तक एक विधायक का प्रभाव क्षेत्र हो सकता है। ऐसे में विद्यालय प्रबंधन समितियों और स्कूलों से जुड़े स्थानीय नेटवर्क को नजरअंदाज करना किसी भी चुनावी रणनीति के लिए आसान नहीं है।

स्कूल की समस्या, चुनावी संपर्क का जरिया

विद्यालयों में आधारभूत सुविधाओं की कमी, भवन निर्माण, शिक्षकों की उपलब्धता, विद्यार्थियों की उपस्थिति और पढ़ाई की गुणवत्ता जैसे मुद्दे अब चुनावी संवाद का हिस्सा बनते दिख रहे हैं।विधायक इन मुद्दों के जरिए शिक्षकों और विद्यालयों से जुड़े लोगों से संपर्क बढ़ा रहे हैं। कोशिश यह है कि स्थानीय समस्याओं को सुना जाए, सरकार की उपलब्धियों को बताया जाए और जहां संभव हो, समाधान का भरोसा भी दिया जाए। यानी स्कूल की समस्या से शुरू होने वाली बातचीत धीरे-धीरे चुनावी संपर्क तक पहुंच रही है।

शिक्षक सीटों पर व्यक्तिगत पकड़ सबसे बड़ा फैक्टर

शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव सामान्य राजनीतिक चुनावों से काफी अलग माना जाता है। यहां सिर्फ पार्टी का समर्थन उम्मीदवार की जीत तय नहीं करता। शिक्षकों के बीच उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, लगातार संपर्क, उनकी समस्याओं को लेकर सक्रियता और संगठनात्मक पकड़ भी बड़ा फैक्टर बनती है।यही कारण है कि चुनावी मैदान में उतरने वाले संभावित उम्मीदवार और जनप्रतिनिधि शिक्षकों के बीच अपनी पहुंच मजबूत करने में जुटे हैं।पिछले उपचुनावों में भी स्नातक और शिक्षक मतदाताओं के बीच संपर्क की अहमियत सामने आ चुकी है। ऐसे में 23 अक्टूबर के मतदान से पहले राजनीतिक दल किसी भी स्तर पर संपर्क का मौका गंवाना नहीं चाहते।

विधायकों के लिए भी अग्निपरीक्षा

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की ओर से विधायकों से क्षेत्र में रहने और मतदाताओं के साथ संपर्क बढ़ाने की अपील के बाद अब विधायकों की सक्रियता भी चुनावी नजरिए से महत्वपूर्ण हो गई है।एक तरफ उन्हें अपने क्षेत्र में सरकार के काम और उपलब्धियों को बताना है, तो दूसरी तरफ शिक्षकों और विद्यालयों की स्थानीय समस्याओं को सुनकर उनके बीच भरोसा कायम करना है। ऐसे में विद्यालय प्रबंधन समितियां आने वाले दिनों में सिर्फ स्कूल की व्यवस्था संभालने वाली संस्था नहीं, बल्कि स्थानीय संवाद का महत्वपूर्ण मंच भी बन सकती हैं।

हालांकि, चुनावी सरगर्मी के बीच यह भी जरूरी होगा कि विद्यालय प्रबंधन समितियां अपने मूल शैक्षणिक दायित्वों पर ही केंद्रित रहें और स्कूलों से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक गतिविधियों से अलग रखते हुए विद्यार्थियों और शिक्षा व्यवस्था के हित में काम करें।

फिलहाल 23 अक्टूबर के मतदान से पहले बिहार की शिक्षक और स्नातक सीटों पर मुकाबला तेज हो रहा है और स्कूलों से लेकर शिक्षकों तक पहुंच बनाने की यह रणनीति चुनावी नतीजों में कितना असर डालती है, इस पर सबकी नजर रहेगी।