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Bihar Politics : बिहार विधान परिषद पहुंचे सभापति, 2 निर्दलीय MLC की बढ़ेंगी मुश्किलें! सबूत लेकर विपक्ष करेगा शिकायत

बिहार में दो निर्दलीय MLC बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। भाजपा में शामिल होने की तस्वीरों के बाद विपक्ष दल-बदल कानून के तहत सभापति से सदस्यता रद्द करने की मांग करेगा। अब सबकी नजर सभापति के फैसले पर है।

 Bihar Politics : बिहार विधान परिषद पहुंचे सभापति, 2 निर्दलीय MLC की बढ़ेंगी मुश्किलें! सबूत लेकर विपक्ष करेगा शिकायत
Tejpratap
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Bihar News : बिहार की राजनीति में दो निर्दलीय विधान पार्षदों को लेकर घमासान तेज हो गया है। तिरहुत स्नातक सीट से निर्वाचित बंशीधर ब्रजवासी और सारण शिक्षक सीट से जीतने वाले राहुल राज की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। दोनों नेताओं के भाजपा कार्यालय पहुंचने, पार्टी का पट्टा पहनने और सदस्यता पर्ची के साथ तस्वीरें सामने आने के बाद अब मामला दल-बदल कानून तक पहुंच गया है। विपक्ष ने दोनों की विधान परिषद सदस्यता रद्द कराने की तैयारी शुरू कर दी है। इस बीच विधान परिषद के सभापति का भी इस मामले में रुख अहम हो गया है। विपक्ष अब पूरे घटनाक्रम से जुड़े सबूत लेकर सभापति के सामने अपनी शिकायत रखने की तैयारी में है।


दरअसल, बिहार विधान परिषद की आठ सीटों पर 23 अक्टूबर को मतदान हुआ था और 27 अक्टूबर को चुनाव परिणाम घोषित किए गए थे। नतीजों में बंशीधर ब्रजवासी ने तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की, जबकि राहुल राज सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित हुए। दोनों ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था। चुनाव के दौरान राहुल राज को एनडीए के भीतर असंतुष्ट खेमे का चेहरा माना जा रहा था, क्योंकि सारण शिक्षक सीट एनडीए में जेडीयू के खाते में गई थी।


चुनाव परिणाम आने के बाद 31 अक्टूबर को दोनों नेताओं के भाजपा कार्यालय पहुंचने से राजनीतिक हलचल तेज हो गई। यहां उन्होंने भाजपा के प्रति समर्थन जताया। इस दौरान दोनों नेताओं की सदस्यता पर्ची और भाजपा का पट्टा पहने तस्वीरें भी सामने आईं। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी समेत पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में दोनों भाजपा विधानमंडल दल की बैठक में भी शामिल हुए। इसके बाद उनके भाजपा में शामिल होने की चर्चा तेजी से फैल गई।


हालांकि, विवाद बढ़ते ही भाजपा और दोनों निर्दलीय एमएलसी ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि उन्होंने पार्टी की औपचारिक सदस्यता नहीं ली है। एक नवंबर को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने भी कहा कि दोनों नेताओं ने भाजपा को समर्थन दिया है, न कि पार्टी की सदस्यता ग्रहण की है। उनका कहना है कि दोनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और जेडीयू अध्यक्ष नीतीश कुमार के नेतृत्व में विश्वास जताते हुए सरकार के साथ खड़े हुए हैं।


लेकिन विपक्ष इस सफाई को आसानी से स्वीकार करने के मूड में नहीं है। राजद और जन सुराज ने इस पूरे घटनाक्रम को संविधान की दसवीं अनुसूची के उल्लंघन से जोड़ दिया है। विपक्ष का तर्क है कि दोनों नेताओं ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीतने के बाद भाजपा की सदस्यता लेने की घोषणा की थी। ऐसे में बाद में इसे केवल समर्थन बताना कई सवाल खड़े करता है।


संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा 2(2) के मुताबिक, यदि कोई निर्दलीय निर्वाचित सदस्य चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण करता है तो उसे सदन की सदस्यता से अयोग्य ठहराया जा सकता है। हालांकि, किसी राजनीतिक दल या सरकार को बाहर से समर्थन देना अपने आप में दल-बदल नहीं माना जाता। यही कानूनी अंतर अब इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा आधार बन गया है।


राजद नेता तेजस्वी यादव पहले ही दोनों विधान पार्षदों की सदस्यता रद्द करने की मांग उठा चुके हैं। राजद की ओर से विधान परिषद के सभापति के समक्ष मामला उठाने की तैयारी है। वहीं जन सुराज ने भी इस घटनाक्रम को सभापति, चुनाव आयोग और न्यायालय तक ले जाने की बात कही है। विपक्ष का कहना है कि भाजपा कार्यालय में हुई कथित ज्वाइनिंग से जुड़े फोटो, वीडियो और अन्य दस्तावेज शिकायत के साथ पेश किए जाएंगे, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि दोनों नेताओं ने वास्तव में पार्टी की सदस्यता ली थी या केवल समर्थन देने की बात कही थी।


अब सबकी नजर विधान परिषद के सभापति पर है। विपक्ष की शिकायत मिलने के बाद सभापति को उपलब्ध तथ्यों, दस्तावेजों और दोनों नेताओं के पक्ष को देखते हुए संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर फैसला करना होगा। केवल तस्वीरों के आधार पर सदस्यता समाप्त होना तय नहीं है, बल्कि यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या दोनों ने औपचारिक रूप से भाजपा की सदस्यता स्वीकार की थी।


फिलहाल भाजपा इसे सरकार के समर्थन का मामला बता रही है, जबकि विपक्ष इसे निर्दलीय जनादेश के साथ खिलवाड़ और संभावित दल-बदल करार दे रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में विधान परिषद के भीतर और बाहर सियासी टकराव बढ़ना तय माना जा रहा है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विपक्ष के सबूत दोनों निर्दलीय एमएलसी की मुश्किलें बढ़ा पाएंगे या समर्थन की दलील देकर भाजपा इस कानूनी संकट से निकल जाएगी?