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Bihar Higher Education Reform: बिहार में उच्च शिक्षा में बड़ा बदलाव! यूनिवर्सिटी से अलग होंगे यूजी कॉलेज, प्रोफेसरों की राजनीति पर भी लगेगी रोक

बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। सरकार नया उच्च शिक्षा विधेयक लाने की तैयारी में है, जिसके तहत 481 सरकारी यूजी कॉलेज सीधे उच्च शिक्षा विभाग के अधीन होंगे। साथ ही शिक्षकों की राजनीतिक गतिविधियों पर भी रोक लगाने का प्रस्ताव

Bihar Higher Education Reform
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Tejpratap
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पटना: बिहार में उच्च शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। राज्य सरकार विश्वविद्यालयों और डिग्री कॉलेजों की वर्तमान व्यवस्था को पूरी तरह बदलने की तैयारी में है। प्रस्तावित नए उच्च शिक्षा विधेयक के तहत स्नातक (यूजी) कॉलेजों को विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक नियंत्रण से अलग कर सीधे उच्च शिक्षा विभाग के अधीन लाने की योजना बनाई गई है। सरकार इस विधेयक को विधानसभा के मौजूदा मानसून सत्र में पेश कर सकती है।


यदि यह विधेयक पारित हो जाता है तो राज्य की उच्च शिक्षा व्यवस्था में लंबे समय बाद व्यापक बदलाव देखने को मिलेगा। विश्वविद्यालयों की भूमिका मुख्य रूप से स्नातकोत्तर (पीजी) शिक्षा, शोध और अकादमिक गतिविधियों तक सीमित रह जाएगी, जबकि डिग्री कॉलेजों का संचालन, प्रशासन और शिक्षकों से जुड़े अधिकांश फैसले सीधे राज्य सरकार के अधीन होंगे।

481 सरकारी डिग्री कॉलेज होंगे सीधे उच्च शिक्षा विभाग के अधीन

प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार बिहार के करीब 481 सरकारी डिग्री कॉलेज अब संबंधित विश्वविद्यालयों के बजाय सीधे उच्च शिक्षा विभाग के नियंत्रण में कार्य करेंगे। वर्तमान में ये कॉलेज राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों से संबद्ध हैं और उनके प्रशासनिक निर्णय भी विश्वविद्यालय ही लेते हैं।

नई व्यवस्था लागू होने के बाद कॉलेजों के संचालन, वित्तीय प्रबंधन, प्रशासनिक फैसलों और अन्य व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी सीधे विभाग के पास होगी। इससे सरकार का मानना है कि कॉलेजों में प्रशासनिक प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और प्रभावी बन सकेगी।

विश्वविद्यालयों की भूमिका होगी सीमित

सरकार की योजना के अनुसार विश्वविद्यालय भविष्य में मुख्य रूप से स्नातकोत्तर (पीजी) शिक्षा, शोध कार्य, परीक्षा प्रणाली, अकादमिक गुणवत्ता और अनुसंधान पर ध्यान केंद्रित करेंगे। वहीं स्नातक स्तर की शिक्षा का संचालन अलग प्रशासनिक ढांचे के माध्यम से किया जाएगा। इस बदलाव का उद्देश्य विश्वविद्यालयों पर बढ़ रहे प्रशासनिक बोझ को कम करना और उन्हें शोध एवं उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने पर अधिक ध्यान देने का अवसर देना बताया जा रहा है।

नियुक्ति, तबादला और पदोन्नति का अधिकार विभाग के पास

प्रस्तावित विधेयक में शिक्षकों की नियुक्ति, स्थानांतरण, पदोन्नति, सेवा शर्तों और प्रशासनिक निर्णयों का अधिकार विश्वविद्यालयों से लेकर सीधे उच्च शिक्षा विभाग को सौंपने का प्रावधान किया गया है। फिलहाल इन सभी मामलों में अंतिम निर्णय संबंधित विश्वविद्यालय प्रशासन लेता है, लेकिन नए कानून के लागू होने के बाद यह अधिकार विभाग के पास चला जाएगा। इसके लिए पटना विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 और बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 में भी आवश्यक संशोधन किए जाने की तैयारी है।

शिक्षकों की राजनीतिक गतिविधियों पर लगेगी रोक

प्रस्तावित उच्च शिक्षा विधेयक का सबसे चर्चित प्रावधान शिक्षकों की राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ा है। नए नियम लागू होने के बाद सरकारी डिग्री कॉलेजों में कार्यरत शिक्षक किसी भी प्रकार की राजनीतिक गतिविधि में भाग नहीं ले सकेंगे।

इसके अलावा किसी राजनीतिक दल या विचारधारा का सार्वजनिक समर्थन, प्रचार-प्रसार या उसके पक्ष में लेखन करने पर भी रोक लगाने का प्रस्ताव है। सरकार का उद्देश्य शैक्षणिक संस्थानों को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रखते हुए शिक्षण व्यवस्था को अधिक पेशेवर बनाना बताया जा रहा है।

सहायक प्राध्यापक बनने के नियम भी बदलेंगे

नई व्यवस्था के तहत सरकारी डिग्री कॉलेजों में सहायक प्राध्यापक (Assistant Professor) की नियुक्ति के लिए न्यूनतम योग्यता में भी बदलाव प्रस्तावित है। प्रस्ताव के अनुसार अभ्यर्थी के पास स्नातकोत्तर (पीजी) डिग्री और नेट (NET) योग्यता होना अनिवार्य होगा। वहीं पीएचडी को अनिवार्य योग्यता की सूची से हटाने का प्रस्ताव भी शामिल किया गया है। इससे भविष्य की नियुक्तियों की प्रक्रिया में बदलाव देखने को मिल सकता है।

विश्वविद्यालय प्रोफेसर बनने का अवसर समाप्त होगा

प्रस्तावित कानून लागू होने के बाद सरकारी डिग्री कॉलेजों में कार्यरत शिक्षकों के लिए विश्वविद्यालय स्तर पर प्रोफेसर बनने का रास्ता लगभग बंद हो जाएगा। अब तक कॉलेज शिक्षक अनुभव, योग्यता और पदोन्नति के आधार पर विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर बनने का अवसर प्राप्त कर सकते थे, लेकिन नई व्यवस्था लागू होने पर दोनों सेवाओं को अलग-अलग कर दिया जाएगा। इससे कॉलेज और विश्वविद्यालय के शिक्षकों की सेवा संरचना भी अलग हो जाएगी।

हर जिले में नियुक्त होगा उच्च शिक्षा पदाधिकारी

सरकार स्कूल शिक्षा विभाग की तर्ज पर प्रत्येक जिले में उच्च शिक्षा पदाधिकारी नियुक्त करने की भी तैयारी कर रही है। यह अधिकारी जिले के सभी सरकारी डिग्री कॉलेजों की शैक्षणिक गुणवत्ता, प्रशासनिक कार्यों, शिक्षकों की उपस्थिति और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी करेगा। सरकार का मानना है कि जिला स्तर पर निगरानी व्यवस्था बनने से कॉलेजों की जवाबदेही बढ़ेगी और शिक्षा व्यवस्था में सुधार होगा।

उच्च शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव

यदि प्रस्तावित उच्च शिक्षा विधेयक विधानसभा से पारित हो जाता है तो बिहार की विश्वविद्यालय प्रणाली में यह सबसे बड़े प्रशासनिक सुधारों में से एक माना जाएगा। इससे एक ओर विश्वविद्यालय शोध और उच्च शिक्षा पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकेंगे, वहीं दूसरी ओर सरकारी डिग्री कॉलेजों का संचालन सीधे राज्य सरकार के नियंत्रण में आ जाएगा। अब सभी की नजर मानसून सत्र में पेश होने वाले इस विधेयक और उस पर होने वाली चर्चा पर टिकी हुई है।