Bihar CAG Report : कहां खर्च हुए 92,133 करोड़? कैग रिपोर्ट ने खोला चौंकाने वाला राज; कागज़ों में नहीं मिला सबूत

कैग रिपोर्ट में खुलासा, बिहार में 92,133 करोड़ रुपये के 62,632 उपयोगिता प्रमाणपत्र लंबित। वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल।

1st Bihar Published by: First Bihar Updated Feb 27, 2026, 10:24:47 AM

Bihar CAG Report : कहां खर्च हुए 92,133 करोड़? कैग रिपोर्ट ने खोला चौंकाने वाला राज; कागज़ों में नहीं मिला सबूत

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Bihar CAG Report : Comptroller and Auditor General of India (कैग) की ताजा रिपोर्ट ने बिहार की वित्तीय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 31 मार्च 2025 तक राज्य में 92,133 करोड़ रुपये की राशि से जुड़े कुल 62,632 उपयोगिता प्रमाणपत्र (यूसी) लंबित या अनुपलब्ध पाए गए हैं। यह खुलासा उस समय हुआ जब कैग ने राज्य सरकार को राज्य वित्त से संबंधित अपना लेखा प्रतिवेदन सौंपा।


कैग की राज्य वित्त पर आधारित रिपोर्ट के अनुसार, 31 मार्च 2024 तक 70,878 करोड़ रुपये की राशि के 49,469 उपयोगिता प्रमाणपत्र लंबित थे। यानी एक वर्ष के भीतर लंबित यूसी की संख्या और राशि दोनों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। यह स्थिति राज्य की वित्तीय जवाबदेही और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।


दरअसल, उपयोगिता प्रमाणपत्र वे अनिवार्य दस्तावेज होते हैं जिन्हें अनुदान प्राप्त करने वाली संस्थाओं या विभागों को यह प्रमाणित करने के लिए जमा करना होता है कि उन्हें दी गई सरकारी राशि का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के लिए ही किया गया है। सामान्य वित्तीय नियमों के तहत यह सुनिश्चित करना संबंधित विभागीय अधिकारियों की जिम्मेदारी होती है कि अनुदान की राशि खर्च होने के बाद समय पर यूसी प्राप्त कर लिया जाए।


कैग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि बड़ी संख्या में लंबित यूसी इस बात का संकेत है कि भारी-भरकम सरकारी धनराशि के वास्तविक उपयोग का प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इससे गबन, धन विचलन या वित्तीय अनियमितताओं का जोखिम बढ़ जाता है। वित्तीय अनुशासन के लिहाज से यह स्थिति चिंताजनक मानी जा रही है।


रिपोर्ट के मुताबिक, यूसी जमा नहीं किया जाना बिहार कोषागार संहिता के नियम 271(ई) का उल्लंघन है। इस नियम के तहत जिस वित्तीय वर्ष में अनुदान जारी किया गया हो, उसकी समाप्ति के 18 महीने के भीतर संबंधित उपयोगिता प्रमाणपत्र जमा करना अनिवार्य है। यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो इसे वित्तीय शुचिता और जवाबदेही के मानकों का गंभीर उल्लंघन माना जाता है।


बिहार के प्रधान महालेखाकार कार्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम नहीं प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि राज्य सरकार को वित्तीय लेखे सौंप दिए गए हैं ताकि उसकी वास्तविक स्थिति और कमियों को रेखांकित किया जा सके। उन्होंने कहा कि कैग इन लेखों का विस्तृत लेखा परीक्षण करेगा और वर्ष के अंत तक अपना ‘लेखा परीक्षण प्रतिवेदन’ प्रस्तुत करेगा, जिसमें विभिन्न विभागों की वित्तीय कार्यप्रणाली का विस्तृत आकलन किया जाएगा।


गौरतलब है कि जुलाई 2025 में जारी कैग की लेखा परीक्षण रिपोर्ट के आधार पर विपक्ष ने लगभग 70,000 करोड़ रुपये के कथित घोटाले का आरोप लगाया था। विधानसभा चुनाव से पहले इस मुद्दे को लेकर राज्य की राजनीति भी गरमा गई थी और सरकार की वित्तीय पारदर्शिता पर सवाल उठाए गए थे।


इसको लेकर जानकारों का मानना है कि लंबित उपयोगिता प्रमाणपत्रों की बढ़ती संख्या न केवल प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि अनुदान प्रबंधन प्रणाली में सुधार की तत्काल आवश्यकता है। समय पर यूसी जमा करना न सिर्फ वित्तीय अनुशासन का हिस्सा है, बल्कि इससे यह भी सुनिश्चित होता है कि सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुंच रहा है।


अब सबकी नजर इस बात पर है कि राज्य सरकार लंबित 92,133 करोड़ रुपये के उपयोगिता प्रमाणपत्रों को लेकर क्या ठोस कदम उठाती है और वित्तीय पारदर्शिता बहाल करने के लिए कौन-सी सुधारात्मक पहल करती है।