पटना: बिहार में सरकारी योजनाओं को जमीन तक पहुंचाने और अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों की समस्याओं पर काम करने वाले अधिकारियों की स्थिति जानकर सवाल उठना लाजिमी है। जिन अधिकारियों के कंधों पर समाज के वंचित तबके के कल्याण की जिम्मेदारी है, उनके पास खुद बैठने के लिए अपना एक अदद कमरा तक नहीं है। सवाल यह है कि आखिर 19 साल में प्रखंड कल्याण पदाधिकारियों को एक स्थायी कार्यालय, कुर्सी और जरूरी संसाधन तक क्यों नहीं मिल सके?
साल 2007 में कल्याण विभाग का विभाजन हुआ और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (एससी-एसटी) कल्याण विभाग का अलग गठन किया गया। मकसद था कि एससी-एसटी समुदाय से जुड़ी योजनाओं और समस्याओं पर ज्यादा प्रभावी तरीके से काम हो। विभाग अलग हुए करीब दो दशक बीतने को हैं, लेकिन प्रखंड स्तर पर काम करने वाले कल्याण पदाधिकारी आज भी दफ्तर की तलाश में हैं।
534 प्रखंड, लेकिन अपना ठिकाना कहीं नहीं
राज्य में कुल 517 प्रखंड कल्याण पदाधिकारी के पद स्वीकृत हैं। इनमें 138 पदाधिकारी दो वर्षीय प्रशिक्षण में शामिल हैं, जबकि 17 पद रिक्त हैं। बाकी 362 पदाधिकारी कार्यरत हैं और अपने-अपने क्षेत्र में विभागीय जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन अधिकारियों को काम करने के लिए मिला क्या?
प्रखंड कार्यालय में बीडीओ, प्रखंड पंचायती राज पदाधिकारी और दूसरे अधिकारियों-कर्मचारियों के लिए अलग-अलग कमरे हैं। मगर कल्याण पदाधिकारियों के लिए स्थायी कार्यालय की व्यवस्था नहीं होने से उन्हें दूसरे अधिकारियों के कमरों में बैठकर काम चलाना पड़ता है। यानी जिम्मेदारी अपनी, पद अपना और काम अपना... लेकिन कमरा किसी और का!
दूसरे के कमरे में बैठकर कैसे होगा गंभीर काम?
किशनगंज में तैनात कल्याण पदाधिकारी नमिता के मुताबिक, महिला अधिकारियों के लिए स्थिति और भी असहज हो जाती है। कई बार बीडीओ के कार्यालय में बैठक चल रही होती है और उसी दौरान उन्हें वॉशरूम का इस्तेमाल करना पड़ता है। ऐसे में सवाल है कि एक महिला अधिकारी आखिर किस तरह की कार्य परिस्थितियों में काम करे?
क्या सरकारी व्यवस्था में एक अधिकारी के लिए बैठने की जगह भी बहुत बड़ी मांग है? जब अधिकारी को हर दिन यह देखना पड़े कि आज किसके कमरे में बैठना है और कितनी देर बैठना है, तो उससे यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह बिना किसी बाधा के फील्ड और कार्यालय दोनों की जिम्मेदारी निभाए?
दलित बस्ती में जाना हो या विकास मित्र की जांच, साधन नहीं
प्रखंड कल्याण पदाधिकारियों की जिम्मेदारी सिर्फ फाइलों तक सीमित नहीं है। उन्हें एससी-एसटी कल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन देखना होता है। एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत मुआवजा भुगतान में पीड़ितों की मदद करनी होती है। इसके अलावा विकास मित्रों के काम का नियंत्रण और मूल्यांकन भी इनके जिम्मे है। राज्य के बाहर के कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों की छात्रवृत्ति से जुड़े मामलों की जांच भी करनी होती है।
अब जरा सोचिए—दलित बस्ती में किसी योजना की हकीकत देखने जाना हो, विकास मित्र के काम का निरीक्षण करना हो या किसी पीड़ित की मदद करनी हो, तो अधिकारी के पास अपना कार्यालय तक नहीं और फील्ड में जाने के लिए अतिरिक्त साधन भी नहीं। ऐसे में व्यवस्था से सवाल पूछना जरूरी है कि सरकार ने जिम्मेदारी तो पूरी दे दी, लेकिन जिम्मेदारी निभाने के लिए जरूरी संसाधन कब देगी?
388 अधिकारियों पर कार्रवाई, लेकिन व्यवस्था पर सवाल कौन उठाए?
मामला सिर्फ सुविधाओं की कमी तक सीमित नहीं है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक 388 कल्याण पदाधिकारियों पर विभिन्न मामलों में कार्रवाई संचालित है, जिनमें सक्षम प्राधिकार की मंजूरी से जुड़ा सवाल भी सामने आया है। वहीं, बिना कार्रवाई पूरी किए 20 जिला कल्याण अधिकारियों को पदावनत कर प्रखंड कल्याण पदाधिकारी बनाया गया। यह स्थिति विभागीय व्यवस्था की दूसरी तस्वीर सामने रखती है।
एक तरफ अधिकारियों से योजनाओं को जमीन पर उतारने की उम्मीद है, दूसरी तरफ उनके काम करने की बुनियादी व्यवस्था ही अधूरी है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सिर्फ अधिकारियों पर कार्रवाई से व्यवस्था सुधरेगी या सिस्टम की कमियों की भी जिम्मेदारी तय होगी?
BPSC से चयन, फिर भी बुनियादी सुविधा नदारद
प्रखंड कल्याण पदाधिकारी का चयन बिहार लोक सेवा आयोग की परीक्षा के जरिए होता है। यानी ये अधिकारी किसी अस्थायी व्यवस्था का हिस्सा नहीं, बल्कि बाकायदा प्रतियोगी परीक्षा के जरिए चयनित सरकारी अधिकारी हैं। बिहार अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कल्याण सेवा संवर्ग में कुल 632 पद स्वीकृत हैं, जबकि करीब 450 पदों पर अधिकारी कार्यरत हैं।इसके बावजूद अगर प्रखंड स्तर के अधिकारी को अपना कार्यालय नहीं मिलता, तो सवाल सिर्फ एक कमरे का नहीं है। यह सवाल सरकारी व्यवस्था की प्राथमिकताओं का है।
मंत्री बोले- समस्याओं से अवगत हूं, जल्द होगा समाधान
कल्याण मंत्री लखेंद्र कुमार रौशन ने कहा है कि एससी-एसटी कल्याण सेवा संवर्ग के पदाधिकारियों की कठिनाइयों से वे अवगत हैं। विकास मित्र और प्रखंड कल्याण पदाधिकारियों ने जमीनी स्तर पर योजनाओं के क्रियान्वयन से जुड़ी समस्याओं से उन्हें अवगत कराया है। मंत्री ने इन समस्याओं के जल्द समाधान की बात कही है।
अब देखना यह है कि यह समाधान सिर्फ आश्वासन की फाइल तक सीमित रहता है या 19 साल से इंतजार कर रहे प्रखंड कल्याण पदाधिकारियों को आखिरकार अपना स्थायी कार्यालय मिलता है। क्योंकि सवाल सीधा है—जो अधिकारी दूसरों के कल्याण की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, क्या सरकार उनके लिए एक कमरा तक उपलब्ध नहीं करा सकती?





