BIHAR NEWS : नीतीश सरकार का सख्त फैसला: रिटायर्ड BDO की पेंशन जब्त, 4.52 करोड़ रुपये की अवैध निकासी पर कार्रवाई

बिहार सरकार ने सेवानिवृत्त BDO चंद्रशेखर झा की शत-प्रतिशत पेंशन कटौती बरकरार रखी। सृजन घोटाला में 4.52 करोड़ रुपये की अवैध निकासी के आरोप, CBI जांच और अभियोजन स्वीकृति जारी। पढ़ें पूरी खबर।

1st Bihar Published by: First Bihar Updated Thu, 26 Feb 2026 02:16:23 PM IST

BIHAR NEWS : नीतीश सरकार का सख्त फैसला: रिटायर्ड BDO की पेंशन जब्त, 4.52 करोड़ रुपये की अवैध निकासी पर कार्रवाई

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BIHAR NEWS : बिहार सरकार ने सृजन घोटाला मामले में एक बड़ा प्रशासनिक फैसला लेते हुए सेवानिवृत्त पीरपैंती बीडीओ चंद्रशेखर झा की शत-प्रतिशत पेंशन कटौती को बरकरार रखा है। यह कार्रवाई बिहार पेंशन नियमावली, 1950 के नियम-139 के तहत की गई है। झा पर 4.52 करोड़ 88 हजार 246 रुपये की सरकारी राशि की अवैध निकासी के आरोप हैं। इस मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की जांच चल रही है और उनके खिलाफ अभियोजन स्वीकृति भी मिल चुकी है।


सूत्रों के अनुसार, झा के कार्यकाल में कार्यालय के विभिन्न मदों के बैंक खातों से भारी राशि की अवैध निकासी हुई। आरोप है कि उन्होंने न केवल इस अनियमितता को रोका नहीं, बल्कि नियमानुसार कार्रवाई भी नहीं की, जो लापरवाही और कदाचार का स्पष्ट संकेत है। इस संबंध में सीबीआई कांड संख्या आरसी 023 2018 50015 (16.08.2018) दर्ज है। जांच में यह भी सामने आया कि सरकारी राशि को षड्यंत्र और जालसाजी के तहत एक निजी समिति के खाते में स्थानांतरित किया गया।


विभागीय स्तर पर झा से स्पष्टीकरण मांगा गया था। उन्होंने तर्क दिया कि नियम-43(बी) के बिना नियम-139 के तहत सीधे दंड नहीं लगाया जा सकता और आरोप चार वर्ष से अधिक पुराने हैं। हालांकि, विभागीय समीक्षा में पाया गया कि नियमावली में ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। नियम-139(ग) के तहत राज्य सरकार को अधिकार है कि यदि कार्यरत अवधि में घोर कदाचार या पूर्ण असंतोषजनक सेवा के पर्याप्त साक्ष्य हों, तो पेंशन स्वीकृति का पुनरीक्षण किया जा सकता है। इस प्रक्रिया में पेंशनर को सुनवाई का अवसर भी दिया गया, जो झा को प्रदान किया गया।


सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि झा के खिलाफ पूर्व में भी दंड लगाया जा चुका है। राज्य खाद्य निगम, रोहतास में पदस्थापन के दौरान वर्ष 2014-15 से जुड़े मामलों में उन्हें निंदन और कालमान वेतन में निम्नतर अवनति का दंड दिया गया था। सरकार का मानना है कि ये सभी तथ्य मिलकर उनकी सेवा अवधि में घोर कदाचार को दर्शाते हैं।


झा ने पुनर्विलोकन अभ्यावेदन में कहा कि अभियोजन स्वीकृति के आधार पर पेंशन रोकना उचित नहीं है, क्योंकि मामला न्यायालय में विचाराधीन है और दोष सिद्धि नहीं हुई है। इस पर सरकार ने स्पष्ट किया कि अभियोजन स्वीकृति प्रथम दृष्टया दोष के संकेत पर दी जाती है और सीबीआई की जांच रिपोर्ट, साक्ष्य तथा गवाहों के बयान इस मामले में गंभीरता स्थापित करते हैं।


अंततः, किसी नए तथ्य या साक्ष्य के प्रस्तुत न होने के कारण पुनर्विलोकन अभ्यावेदन अस्वीकार कर दिया गया। बिहार राज्यपाल के आदेश से जारी संकल्प में यह स्पष्ट किया गया कि झा पर लगाए गए शत प्रतिशत पेंशन कटौती के दंड को पूर्ववत रखा जाएगा। इस आदेश का प्रकाशन बिहार राजपत्र में किया जाएगा।


इस फैसले से स्पष्ट संदेश गया है कि सरकारी धन के दुरुपयोग और घोर कदाचार पर राज्य सरकार किसी भी स्तर पर समझौता नहीं करेगी। अधिकारी चाहे वर्तमान में हों या सेवानिवृत्त, उनके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य और जांच के आधार पर कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। यह मामला प्रशासनिक और वित्तीय अनुशासन के महत्व को भी रेखांकित करता है और भविष्य में सरकारी पदाधिकारियों को सतर्क रहने की चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।