लखीसराय : बिहार के मंदिरों में आस्था का सैलाब उमड़ता है, लेकिन जब यही भीड़ बेकाबू होती है तो सवाल सिर्फ भगदड़ का नहीं रहता, सवाल व्यवस्था का होता है। सवाल यह भी होता है कि आखिर हर बड़े हादसे के बाद जांच के आदेश क्यों दिए जाते हैं, कमेटियां क्यों बनती हैं और फिर उनकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं होती? क्या प्रशासन हादसा होने का इंतजार करता है या उससे पहले भीड़ प्रबंधन की तैयारी की कोई ठोस व्यवस्था है?
लखीसराय के प्रसिद्ध अशोकधाम मंदिर में सावन की तीसरी सोमवारी पर हुआ हादसा भी इसी लंबे सिलसिले की एक और कड़ी बन गया है। बताया जा रहा है कि मंदिर परिसर में अचानक एक अफवाह फैली और देखते ही देखते भगदड़ मच गई। इस हादसे में सात लोगों की मौत की खबर सामने आई है। कई लोग घायल हुए हैं। घटना के बाद मातम है, प्रशासनिक हलचल है और जांच की बात भी हो रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस बार भी कहानी यहीं तक रहेगी? क्या जांच होगी, कमेटी बनेगी, कुछ अधिकारियों से जवाब मांगा जाएगा और कुछ दिनों बाद यह मामला सरकारी फाइलों में दब जाएगा? या फिर इस बार उन सवालों का भी जवाब मिलेगा जो हर मंदिर हादसे के बाद उठते हैं?
जब जहानाबाद के बराबर पहाड़ी पर गई थी सात लोगों की जान
अशोकधाम की घटना को समझने के लिए दो साल पीछे जाना होगा। साल 2024 में सावन के चौथे सोमवार को जहानाबाद की बराबर पहाड़ी स्थित बाबा सिद्धेश्वर नाथ मंदिर में भगदड़ मची थी। इस हादसे में सात श्रद्धालुओं की मौत हुई थी और कई लोग घायल हुए थे।उस समय भी सवाल भीड़ प्रबंधन और प्रशासनिक व्यवस्था पर उठे थे। स्थानीय दुकानदारों और श्रद्धालुओं के बीच विवाद के बाद भगदड़ की स्थिति बनने की बात सामने आई थी।
हादसे के बाद प्रशासन ने कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की। तत्कालीन अनुमंडल पदाधिकारी विकास कुमार के खिलाफ भी विभागीय कार्रवाई हुई। उन पर बिना अनापत्ति प्रमाण पत्र के झूला लगाने की अनुमति देने और मेला परिसर की विधि-व्यवस्था के संपूर्ण प्रभार के बावजूद प्रतिनियुक्ति स्थल से अनुपस्थित रहने जैसे आरोप लगाए गए थे।
जिलाधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर विभागीय कार्यवाही शुरू हुई। जांच में कई आरोप प्रमाणित नहीं हुए, जबकि एक आरोप आंशिक रूप से प्रमाणित पाया गया। इसके बाद तत्कालीन एसडीओ को निंदन की सजा दी गई।यहां सवाल किसी एक अधिकारी को कठघरे में खड़ा करने का नहीं, बल्कि व्यवस्था से पूछने का है—अगर किसी धार्मिक आयोजन में लाखों की भीड़ जुटने की संभावना है, तो सुरक्षा व्यवस्था में छोटी-सी चूक भी क्या किसी की जिंदगी से बड़ी हो सकती है? और अगर एक हादसे के बाद जिम्मेदारी तय होती है, तो क्या उससे अगली घटना रुकती है?
नालंदा में भी भीड़ बनी जानलेवा
सिर्फ जहानाबाद ही नहीं, नालंदा में भी मंदिर परिसर में भगदड़ की घटना ने प्रशासनिक तैयारियों पर सवाल खड़े किए थे। शीतला माता मंदिर में चैत्र के आखिरी मंगलवार को हुई भगदड़ में आठ महिलाओं की मौत हुई थी। घटना के बाद सामने आया कि मंदिर में अचानक भारी भीड़ उमड़ी थी। पुलिस की ओर से बताया गया था कि वहां चौकीदार तैनात थे, लेकिन इतनी बड़ी भीड़ जुटने की पूर्व सूचना नहीं थी। मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित की गई और एफएसएल की टीम ने मौके पर पहुंचकर सीसीटीवी फुटेज की जांच की।यानी फिर वही कहानी—हादसा, मौत, जांच, एसआईटी और सवाल।लेकिन असली सवाल है कि क्या किसी धार्मिक स्थल की सुरक्षा व्यवस्था सिर्फ भीड़ आने की सूचना मिलने पर निर्भर रहनी चाहिए?क्या प्रशासन को पहले से पता नहीं होता कि सावन, सोमवारी, चैत्र नवरात्र, महाशिवरात्रि या किसी बड़े पर्व पर मंदिरों में श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ सकती है?
सरकार ने मंदिरों के ऑडिट की बात कही थी, फिर अशोकधाम में क्या हुआ?
पिछली घटनाओं के बाद राज्य में मंदिरों की सुरक्षा व्यवस्था और ऑडिट की बात सामने आई थी। खास मौकों पर भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा को लेकर विशेष सतर्कता की जरूरत भी बताई गई। लेकिन अब अशोकधाम की घटना सामने है।तो सवाल सीधा है—मंदिरों का ऑडिट हुआ तो उसकी रिपोर्ट कहां है? किस मंदिर में कितनी क्षमता है? किस मंदिर में एक समय में कितने श्रद्धालुओं को प्रवेश दिया जा सकता है? कहां इमरजेंसी एग्जिट है? कहां बैरिकेडिंग की जरूरत है?
कहां मेडिकल टीम तैनात होनी चाहिए? कहां सीसीटीवी और पब्लिक अनाउंसमेंट सिस्टम पर्याप्त नहीं हैं? इन सवालों के जवाब सिर्फ फाइलों में नहीं, जनता के सामने भी होने चाहिए।
अफवाह से भगदड़, लेकिन अफवाह रोकने की व्यवस्था कहां?
अशोकधाम हादसे में सबसे बड़ा सवाल अफवाह को लेकर है। अगर सिर्फ एक अफवाह से हजारों की भीड़ एक साथ भागने लगे तो यह केवल भीड़ की गलती नहीं मानी जा सकती। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन के पास माइक्रोफोन, पब्लिक अनाउंसमेंट, प्रशिक्षित सुरक्षाकर्मी, अलग-अलग प्रवेश और निकास मार्ग तथा त्वरित प्रतिक्रिया टीम जैसी व्यवस्थाएं होनी चाहिए।अगर किसी को करंट लगने, तार गिरने या किसी दूसरे खतरे की अफवाह सुनाई देती है और उसी अफवाह से भगदड़ मच जाती है, तो सवाल यह है कि प्रशासनिक सूचना तंत्र उस अफवाह से तेज क्यों नहीं था? क्यों कुछ सेकंड की अफवाह कई जिंदगियों पर भारी पड़ गई?
हर बार मौत का आंकड़ा, हर बार जांच का ऐलान
जहानाबाद में सात मौतें हुईं। नालंदा में आठ महिलाओं की जान गई। अब लखीसराय के अशोकधाम में सात लोगों की मौत की खबर सामने आई है। हर हादसे के बाद संवेदनाएं आती हैं। मुआवजे की घोषणा होती है। जांच के आदेश होते हैं। कमेटियां बनती हैं। जिम्मेदारी तय करने की बात होती है। लेकिन जनता का सवाल इससे आगे का है—जांच की अंतिम रिपोर्ट क्या कहती है? किसकी गलती थी? किस स्तर पर चूक हुई?किस अधिकारी या एजेंसी की जिम्मेदारी तय हुई?किस व्यवस्था को बदला गया? और सबसे बड़ा सवाल—क्या उन बदलावों के बाद सच में किसी मंदिर की व्यवस्था सुधरी? अगर जवाब सार्वजनिक नहीं होंगे, तो हर अगला हादसा पिछले हादसे की याद दिलाता रहेगा।
अब सवाल सिर्फ अशोकधाम का नहीं
अशोकधाम की घटना को केवल एक दुर्घटना कहकर आगे बढ़ जाना आसान है। लेकिन अगर हादसों का पैटर्न बार-बार सामने आ रहा है, तो इसे व्यवस्था की समस्या मानकर देखना होगा। आस्था को रोका नहीं जा सकता, लेकिन भीड़ को व्यवस्थित किया जा सकता है। श्रद्धालुओं की संख्या कम नहीं की जा सकती, लेकिन प्रवेश-निकास के रास्ते बनाए जा सकते हैं। अफवाहों को पूरी तरह खत्म करना मुश्किल है, लेकिन सही सूचना कुछ ही सेकंड में हजारों लोगों तक पहुंचाई जा सकती है।अब वक्त सिर्फ यह कहने का नहीं कि “जांच होगी।”वक्त यह पूछने का है कि जांच कब पूरी होगी, रिपोर्ट कब सार्वजनिक होगी और उससे पहले क्या बदलेगा?क्योंकि मंदिर में श्रद्धालु भगवान के दर्शन के लिए जाता है, अपनी जान गंवाने के लिए नहीं।और अगर हर साल सावन में भीड़ बढ़नी तय है, तो हादसे के बाद तैयारी करने की बजाय हादसे से पहले तैयारी क्यों नहीं? अशोकधाम की सात मौतें सिर्फ एक घटना नहीं, बिहार की मंदिर सुरक्षा व्यवस्था के सामने खड़ा एक बड़ा सवाल हैं—क्या हम पिछली भगदड़ों से सच में कुछ सीख रहे हैं, या अगली भगदड़ का इंतजार कर रहे हैं?





