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उपेंद्र को कुशवाहा नेता ही दिखा रहे हैसियत ! पहले वाले ने बताया 'पंचर गाड़ी का सवारी' तो दुसरे वाले ने इस तरह दिखाया आईना, अब कैसे जीतेंगे विरासत की लड़ाई

बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की विरासत को लेकर घमासान तेज है। उपेंद्र कुशवाहा के दावे पर JDU नेताओं ने तीखा हमला बोला। भगवान सिंह कुशवाहा ने कहा कि नीतीश कुमार के उत्तराधिकारी सम्राट चौधरी हैं और इस पर कोई विवाद नहीं है।

उपेंद्र को कुशवाहा नेता ही दिखा रहे हैसियत ! पहले वाले ने बताया 'पंचर गाड़ी का सवारी' तो दुसरे वाले ने इस तरह दिखाया आईना, अब कैसे जीतेंगे विरासत की लड़ाई
Tejpratap
Tejpratap
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पटना : बिहार की राजनीति में इन दिनों एक अजीब सी सियासी दौड़ चल रही है। कुछ नेता विरासत संभालने की बात कर रहे हैं, कुछ विरासत के असली हकदार होने का दावा कर रहे हैं और कुछ यह समझाने में जुटे हैं कि आखिर विरासत है किसकी और किसे मिलेगी। लेकिन इस पूरी बहस में सबसे बड़ा सवाल शायद यही है कि जिस पद पर दावा किया जा रहा है, क्या वह पद खाली भी है?


राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा इन दिनों लगातार नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत का सवाल उठा रहे हैं। राजगीर से उन्होंने यह संदेश दिया कि नीतीश कुमार अब फुर्सत ले चुके हैं और बिहार की जिम्मेदारी संभालने के लिए उनकी पार्टी तैयार है। यानी इशारा साफ था—नीतीश कुमार के बाद राजनीतिक मैदान में उनकी विरासत को आगे बढ़ाने वालों की सूची में उपेंद्र कुशवाहा खुद को सबसे आगे देखना चाहते हैं। लेकिन इस दावे के बाद जेडीयू ने ऐसा पलटवार किया कि विरासत की पूरी बहस ही पलट गई।


पहले जेडीयू के प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा ने बिना नाम लिए उपेंद्र कुशवाहा को राजनीतिक हैसियत का आईना दिखाया। संदेश यह था कि चादर जितनी हो, पांव उतना ही फैलाना चाहिए। इतना ही नहीं, तंज की भाषा और तीखी हुई तो राजनीतिक गाड़ी को ‘पंचर’ बताकर संतुलन संभालने की सलाह भी दे दी गई।


अब इसी बहस में जेडीयू के वरिष्ठ नेता और बिहार सरकार के मंत्री भगवान सिंह कुशवाहा की एंट्री ने उपेंद्र कुशवाहा के लिए सवाल और मुश्किल कर दिए हैं। भगवान सिंह कुशवाहा ने साफ कर दिया कि नीतीश कुमार अपने उत्तराधिकारी के रूप में सम्राट चौधरी को आगे कर चुके हैं और इस मुद्दे पर कोई विवाद नहीं है। अब सवाल यह है कि जब उत्तराधिकारी का नाम तय बताया जा रहा है, मुख्यमंत्री की कुर्सी पर सम्राट चौधरी बैठ चुके हैं और बिहार सरकार की कमान उनके हाथ में है, तब उपेंद्र कुशवाहा आखिर किस खाली मैदान में दावेदारी ठोक रहे हैं? यही वह सवाल है, जो अब जेडीयू उपेंद्र कुशवाहा के सामने खड़ा कर रही है।


15 अप्रैल 2026 को सम्राट चौधरी ने बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी और वर्तमान में वही राज्य के मुख्यमंत्री हैं। इससे पहले एनडीए विधायक दल की बैठक में उनके नाम पर नेतृत्व का फैसला हुआ। अब भगवान सिंह कुशवाहा का बयान इस बहस में केवल एक और बयान नहीं है। इसके राजनीतिक मायने भी हैं। क्योंकि उपेंद्र कुशवाहा जिस सामाजिक समीकरण और कुशवाहा समाज की राजनीति के जरिए अपनी दावेदारी मजबूत करने की कोशिश कर रहे थे, उसी समाज से आने वाले जेडीयू नेता अब उन्हें जवाब दे रहे हैं।


यानी बात केवल जेडीयू बनाम उपेंद्र कुशवाहा की नहीं रह गई है बल्कि कुशवाहा राजनीति के भीतर ही उपेंद्र कुशवाहा की दावेदारी को चुनौती मिलने लगी है। उपेंद्र कुशवाहा कह रहे हैं कि नीतीश कुमार की विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उनकी पार्टी उठा सकती है। लेकिन जेडीयू का पलटवार है—पहले अपनी राजनीतिक ताकत का हिसाब देखिए, फिर किसी और की विरासत का दावा कीजिए।


दरअसल, राजनीति में विरासत केवल भाषण देने से नहीं मिलती। विरासत के लिए संगठन चाहिए, जनाधार चाहिए, चुनावी ताकत चाहिए और सबसे बढ़कर सत्ता की जमीन पर अपनी उपयोगिता साबित करनी पड़ती है। यहां उपेंद्र कुशवाहा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपनी राजनीतिक दावेदारी को जमीन पर कितना बड़ा साबित कर पाते हैं। यही वजह है कि जेडीयू उनके दावे को गंभीर राजनीतिक चुनौती कम और राजनीतिक महत्वाकांक्षा ज्यादा बता रही है।


तंज की राजनीति यहीं खत्म नहीं होती। उपेंद्र कुशवाहा पर हमला करने वाले जेडीयू नेताओं का कहना है कि दूसरों के घर की विरासत पर नजर डालने से पहले अपने राजनीतिक घर की स्थिति देख लेनी चाहिए। जिस पार्टी को खुद लगातार अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता, संगठन और जनाधार साबित करना हो, वह बिहार की सबसे लंबी राजनीतिक विरासतों में से एक पर अपना नाम कैसे लिख देगी? और अब कहानी में नया मोड़ भी आ गया है। जेडीयू की तरफ से तीखा जवाब मिलने के बाद उपेंद्र कुशवाहा के तेवर और भाषा में बदलाव दिखाई दिया। अब वह लोहिया और कर्पूरी ठाकुर की समाजवादी विरासत को आगे बढ़ाने की बात कर रहे हैं। 


यह बात अलग है कि सोशल मीडिया पर इसके बाद भी सवाल उठने लगे कि आखिर उपेंद्र कुशवाहा किस समाजवाद की बात कर रहे हैं? आलोचकों का सवाल है कि जो नेता खुद परिवारवाद को लेकर सवालों से घिरे रहे हों, वे समाजवाद की सबसे बड़ी विरासत के नए झंडाबरदार कैसे बन गए? हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों में उनके बेटे दीपक प्रकाश की भूमिका और सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर भी विपक्षी तथा आलोचक सवाल उठाते रहे हैं।यानी पहले दावा नीतीश कुमार की विरासत का था। जेडीयू ने जवाब दिया तो बात राजनीतिक हैसियत तक पहुंच गई। वहां तंज पड़ा तो चर्चा समाजवाद तक पहुंच गई। राजनीति में इसे यूं भी समझा जा सकता है कि जिस मैदान में बल्ला लेकर उतरे थे, वहां विकेट नहीं मिला तो अब नया पिच तलाशा जा रहा है।


सबसे दिलचस्प बात यह है कि उपेंद्र कुशवाहा जिस नीतीश कुमार की विरासत को लेकर दावेदारी कर रहे हैं, उसी जेडीयू की तरफ से लगातार यह संदेश दिया जा रहा है कि विरासत का सवाल कोई खुली नीलामी नहीं है। पार्टी के भीतर निशांत कुमार की राजनीतिक भूमिका पर भी चर्चा तेज है, जबकि सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री के रूप में सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं। हाल के दिनों में नीतीश की विरासत, निशांत की भूमिका और उपेंद्र कुशवाहा के दावे को लेकर सियासी बहस लगातार तेज हुई है।


अब ऐसे में उपेंद्र कुशवाहा के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि आखिर वह किस विरासत की बात कर रहे हैं—सत्ता की, संगठन की, समाजवाद की या केवल राजनीतिक पहचान की?जेडीयू का जवाब फिलहाल बहुत साफ है—उत्तराधिकारी के सवाल पर भ्रम मत फैलाइए, सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री हैं और राजनीतिक वास्तविकता सबके सामने है। भगवान सिंह कुशवाहा के बयान ने इस संदेश को और धार दे दी है। खासकर इसलिए क्योंकि जवाब देने वाला चेहरा उसी सामाजिक पृष्ठभूमि से आता है, जिसके सहारे उपेंद्र कुशवाहा अपनी राजनीति को मजबूत करने की कोशिश करते रहे हैं।


अब उपेंद्र कुशवाहा के लिए मुश्किल यह है कि जेडीयू ने उनके दावे का जवाब केवल शब्दों से नहीं दिया, बल्कि सवाल उनकी राजनीतिक हैसियत पर खड़ा कर दिया है।और राजनीति में सवाल अगर आपकी महत्वाकांक्षा पर नहीं, बल्कि आपकी हैसियत पर खड़ा हो जाए, तो जवाब देना आसान नहीं होता। नीतीश की विरासत पर दावा करने से पहले शायद उपेंद्र कुशवाहा को अब यह भी तय करना होगा कि वह विरासत के वारिस हैं, दावेदार हैं या फिर सिर्फ उस दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं, जिस पर पहले से किसी और का नाम लिखा जा चुका है।