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बिहार पुलिस की ऐसी करतूत: बुखार की दवा को 'स्मैक' समझ 3 युवकों को भेजा जेल, FSL रिपोर्ट के बाद 9 महीने में हुए बरी

Bihar News: मुजफ्फरपुर में पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठे हैं। जिस पदार्थ को स्मैक बताकर तीन युवकों को एनडीपीएस एक्ट में गिरफ्तार किया गया था, उसकी एफएसएल जांच के बाद चौंकाने वाला सच सामने आया। कोर्ट के फैसले ने पूरे मामले को...

बिहार पुलिस की ऐसी करतूत: बुखार की दवा को 'स्मैक' समझ 3 युवकों को भेजा जेल, FSL रिपोर्ट के बाद 9 महीने में हुए बरी
Ramakant kumar
3 मिनट

Bihar News: मुजफ्फरपुर जिले से पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है. बेनीबाद थाना पुलिस ने जिस पदार्थ को स्मैक बताकर तीन युवकों को गिरफ्तार कर एनडीपीएस एक्ट के तहत जेल भेज दिया था, वह फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) की जांच में साधारण बुखार और दर्द की दवा निकला. इसके बाद विशेष एनडीपीएस कोर्ट-2 ने तीनों युवकों को बरी कर दिया. हालांकि कोर्ट के फैसले से उन्हें राहत मिली, लेकिन करीब नौ महीने तक जेल में रहने के कारण उनकी जिंदगी पर गहरा असर पड़ा.


मामला अक्टूबर 2025 का बताया जा रहा है. उस समय बेनीबाद थाना पुलिस ने छापेमारी के दौरान प्रेमशंकर कुमार उर्फ छोटा मेल, सुदेश कुमार और रमेश कुमार को गिरफ्तार किया था. पुलिस का दावा था कि तीनों के पास से 30 पुड़िया स्मैक बरामद हुई है. इसी आधार पर उनके खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया और उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. बाद में पुलिस ने इस मामले में चार्जशीट भी दाखिल कर दी.


गिरफ्तारी के बाद तीनों युवकों को करीब नौ महीने तक जेल में रहना पड़ा. इस दौरान उन्हें कानूनी लड़ाई के साथ-साथ मानसिक, सामाजिक और आर्थिक परेशानियों का भी सामना करना पड़ा. परिजनों का कहना है कि बिना किसी अपराध के उनके परिवार को समाज में बदनामी झेलनी पड़ी और युवकों का भविष्य भी प्रभावित हुआ.


मामले में नया मोड़ तब आया, जब अदालत ने जब्त किए गए पदार्थ की जांच के लिए उसे फॉरेंसिक साइंस लैब भेजा. एफएसएल की रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि जब्त किया गया पाउडर स्मैक या किसी अन्य प्रतिबंधित मादक पदार्थ का नहीं था. जांच में यह पैरासिटामोल और निमेसुलाइड जैसी सामान्य दवाओं का मिश्रण निकला, जिनका उपयोग बुखार और दर्द के इलाज में किया जाता है.


एफएसएल रिपोर्ट सामने आने के बाद विशेष एनडीपीएस कोर्ट-2 ने सबूतों के अभाव में तीनों आरोपितों को बाइज्जत बरी कर दिया. अदालत के फैसले के बाद पुलिस की जांच प्रक्रिया और कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं.


यह मामला कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है. बिना वैज्ञानिक जांच या प्रारंभिक पुष्टि के किसी पदार्थ को मादक पदार्थ मानकर एनडीपीएस जैसे गंभीर कानून के तहत कार्रवाई कैसे की गई. यदि एफएसएल जांच में पदार्थ सामान्य दवा निकला, तो शुरुआती जांच में इतनी बड़ी चूक कैसे हुई. इस मामले ने पुलिस की जांच प्रक्रिया, जवाबदेही और संवेदनशीलता पर बहस छेड़ दी है.